Hindi Quote in Poem by aakanksha

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मिथिला की पावन धरती पर,
ज्ञान-सुधा की धारा थी,
जनक, गार्गी, याज्ञवल्क्य की,
जिससे जग में कारा थी।

उसी धरा के गौरव गायक,
दिनकर जग में नाम हुए,
ओज, तेज, राष्ट्रभाव लिए,
जन-जन के अभिराम हुए।

हिन्दी का वह सूर्य प्रखर था,
जिसने युग को राह दी,
रश्मिरथी की ज्योति जलाकर,
जन-मन को परवाह दी।

कुरुक्षेत्र की वाणी बनकर,
अन्यायों से लड़ा सदा,
परशुराम की प्रतीक्षा में,
जागा उसका स्वाभिमान बड़ा।

किन्तु पूछो उस दिनकर से,
जिस पर सारा देश मुग्ध था,
कौन कवि था उसके मन में,
जिसका काव्य अनिर्वचनीय सुधा था?

उत्तर मिलता है विद्यापति,
मिथिला के मधुर गायक थे,
जिनके गीतों में प्रेम-सरसता,
भक्ति-सुधा के सायक थे।

शब्दों में संगीत बसा था,
भावों में मधुमास खिला,
उनकी वाणी सुनकर जैसे,
मन में प्रेम-वृन्दावन मिला।

दिनकर बोले—"गीत तुम्हारे,
हृदय-तल को छू जाते हैं,
ओज जहाँ मेरा पथ है तो,
तुम माधुर्य सिखाते हो।"

एक ओर था वीर गर्जन,
दूजी ओर मधुरिम तान,
एक सूर्य था राष्ट्रभाव का,
एक चन्द्र था रस की खान।

मैथिली की गौरव-गाथा को,
दिनकर ने सम्मान दिया,
उसकी प्राचीन परम्पराओं को,
भारत का अभिमान कहा।

विद्यापति ने भाषा को दी,
काव्य-गगन की ऊँचाई,
दिनकर ने हिन्दी को देकर,
राष्ट्र-जागरण की तरुणाई।

दो युग, दो स्वर, दो व्यक्तित्व,
फिर भी एक प्रवाह रहे,
मिथिला की सांस्कृतिक धारा के,
दो उज्ज्वल इतिहास रहे।

महान वही जो पूर्वज कवियों,
का सम्मान निभाता है,
दिनकर की विनम्रता में भी,
उनका गौरव झलकाता है।

आज भी जब दिनकर गूँजें,
स्मरण विद्यापति आते हैं,
साहित्यिक ज्योति की लौ बन,
पीढ़ी-पीढ़ी जगमगाते हैं।

हिन्दी में यदि दिनकर सूर्य हैं,
राष्ट्र-चेतना के महान,
तो मैथिली के चन्द्र विद्यापति,
माधुर्य-संगीत की पहचान।

दोनों की यह संयुक्त धरोहर,
भारत का अनुपम धन है,
जब तक जीवित भाषा-संस्कृति,
तब तक उनका वंदन है।

Hindi Poem by aakanksha : 112027400
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