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🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
दिखावे की इस दुनिया में, सादगी
           का गुमान रखते हैं,

हम वो हैं, जो टूटे हुए दिलों में भी
             जान रखते हैं,

तल्खियाँ ज़माने की हमें, मोड़ न
              सकीं कभी,

लहजे में शहद और सीने में चट्टान
                  रखते हैं,

माना कि मंज़िलें अभी कुछ फासले
                पर हैं मगर,

हम थक हार कर भी कदमों में उड़ान
                   रखते हैं,

गिला नहीं उनसे जो सफ़र में साथ
                 छोड़ गए,

हम तो बिछड़ने वालों का भी पूरा
           एहतराम करते हैं,

महफिलों की चकाचौंध हमें लुभाती
                नहीं ज़ख्मी,

हम  अपनी  तन्हाइयों  में ही एक
आलीशान जहान रखते हैं…🔥
╭─❀💔༻ 
╨──────────━❥
 ♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
 #LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

મને ખબર છે,
જવાબ મળતા નથી,
તોય પ્રયત્ન કરતી રહું છું.

નિષ્ફળતા મળી છે,
પણ અટકતી નથી.

એક નવું ડગ ભરીશ,
પોતાનું જગ બદલીશ.

બસ,
આજ વિશ્વાસે
હું રોજ આગળ વધું છું.

DHAMAK

heenagopiyani.493689

સવારના પહેલા કિરણમાં જે અહેસાસ છે, એ તું છે,
મારી અધૂરી રહેતી દરેક વાતનો જે વિશ્વાસ છે, એ તું છે.

નથી જોઈતું મારે આખું આભ કે ચાંદ તારા,
મારા ખાલી પડેલા આંગણમાં જે ઉજાસ છે, એ તું છે.

દુનિયાની ભીડમાં તો લાખો ચહેરાઓ મળે છે,
પણ એકાંતમાં જે દિલની સાવ ખાસ છે, એ તું છે.

વરસી જાય છે વાદળ બનીને તારી યાદો ક્યારેક,
ભીંજાઈ જઉં હું જેમાં, એ મીઠો વરસાદ તું છે.

નથી ખબર કે ક્યાં જઈને અટકશે આ સફર,
પણ મારી મંઝિલનો અંતિમ પડાવ તું જ છે.

શબ્દોમાં લખું તો તું મારી એક કવિતા છે,
અને મૌનમાં સાંભળું તો તું મારો શ્વાસ છે.

palewaleawantikagmail.com200557

Goodnight friends sweet dreams

kattupayas.101947

मैंने चाहा था घर-सा रिश्ता, महल की ख्वाहिश नहीं थी,
जो रूखा-सूखा दे दे कोई, उस पर भी कोई फरमाइश नहीं थी।
हालात उसके अपने जैसे, मैंने अपने मान लिए थे,
उसकी रोटी मेरी रोटी, उसके आँसू अपने जान लिए थे।
पर दिल तो उसका कहीं और था, ये बात छुपाई उसने,
और इल्ज़ाम वफ़ा पर आया, हर कमी गिनाई उसने।
पूछा मुझसे – “तुमने दिया ही क्या?” बड़ी आसानी से,
उसने देखा ही नहीं, मैंने खुद को दे दिया ख़ामोशी से।
जिसका दिल किसी और के पास हो, वो क़दर क्या जाने,
सच्चे प्यार की कीमत अक्सर, झूठे लोग नहीं पहचानें।

archanalekhikha

જ્યારે તને મેં શોધ્યો માધવ
  ત્યારે તું ક્યાં મળે છે  માધવ.
મારી એકલતામાં તારો જ એક સથવારો,
મારી મહેફીલોમાં પણ તુંજ સમાણો.
આવને મળવા એક ક્ષણ તો ,
ક્યાં પુરી જિંદગી માગી છે તારી .
પાગલ મીરા તો નથી કે નથી નરસૈયો હું,
મારે તો બસ સુભદ્રા જેવો નાતો .
રાખડી સાથે દુઆઓ હજાર કરૂ છું .
ભેટ ક્યાં માંગી છે કોઈ મે તુજથી ?
બસ મારી અનમોલ ભેટ  તુજ છે.
જ્યારે તને મેં શોધ્યો માધવ,
ત્યારે તું ક્યાં મળે છે માધવ .
                        કપિલા પઢીયાર ( કલ્પી)

pinkypadhiyar206609

Netram Eye Foundation successfully conducted an eye check-up camp at Vridha Mitra Kendra, Madanpur Khadar, focusing on promoting eye health and regular vision care among senior citizens.

The camp aimed to provide timely eye consultations, raise awareness about age-related eye conditions, and emphasize the importance of regular eye check-ups for maintaining good vision and quality of life. Our team interacted with the participants and offered guidance on preventive eye care and timely treatment.

Initiatives like these reflect our continued commitment to community welfare and accessible eye care for all. We sincerely thank everyone who supported and participated in making this camp successful.
#NetramEyeFoundation #EyeCheckupCamp #SeniorCitizenCare #CommunityHealthcare #VisionCare #EyeHealth #PreventiveCare #HealthcareOutreach

netrameyecentre

vah Kaun Hai jisne mujhe awaaz to nahin Di per main thahar ja Gaya hu

lalitmishra7728

मेरा भारत महान ' मेरी संस्कृति मेरी धरोहर । क्या अब भी नियन्त्रण चल रहा है। मेरे ख्याल से नहीं। शॉपिंग के लिए जाओ। कपड़े खरीदने जाओ और "मै ' साडी मे सादा सिम्पल सरल स्वभाव तो बाहर से ही शोरूम मे जाने से पहले गार्ड कह देता है। मेम यहाँ वेस्टन कपड़े मिलते है। घुमते - घूममे बहुत देर हो गयी तेज बारिश होने लगी। "तो मन आया पास मे रेस्टोरेंट मे कुछ खा लेते हैं। वहां हम चेयर पर बैठे ही थे। वेटर बोला चाइनीज फूड ही मिलेगा । हम यू ही आ गये। ऐसा नही लग रहा था । हम अपनी देशी धरोहर में ही है। आते - आते रात हो गयी । काफी देर होने के बाद खाने का टाइम हो गया होटल मे खाने की टेवल पर बैठे । मैनयू कार्ड देखा सब कार्डी मांसाहारी व्यंजनों से भरा हुआ था। फिर तो वहाँ होटल मे पानी भी गले से नही उतरा । जो कि हमारे घर में प्याज लहसुन तक नही खाया जाता । वहाँ अण्डा , मांस तो एक हत्या पाप के बराबर है। ( कहाँ गया हमारा धर्म) ? जब बच्चो के स्कूल मे पेरेन्ट्स मिटिंग में जाती हूं। क्यास टीचर का व्यवहार जिस बच्चे की मम्मी स्टाइलिस्ट लुक दो चार वर्ल्ड इंगलिश में बोल दिया या फिर नौकरी पेशा वाली गाडी खुद ड्राइविंग कर के आयी तो उसकी बातो को ध्यानपूर्वक सुन कर मुस्कुरा कर जबाब दिया जा रहा था। और मैं सीधे स्वाभाव से पूछा मेरा बच्चा क्लास मे व्यवहार - पढाई ने कैसा चल रहा है ? तो मेरे बच्चे मे चार कमी निकाल कर जबाब दिया जाता है। जब कि हमारे हिसाब से हमारा बच्चा सही है। क्या व्यक्ति की पहचान दिखावे से होने लगी है। मन की सरलता अपनी पहचान सादगी से नही सोचो अभी ही हाल है। हिन्दू शासन मे साधे का परिणाम कितना घातक होगा।

nandiniagarwal835328

तस्वीर

घर में ' दीवाली कीथा सफाई करते - करते एक पुरानी तस्वीर हाथ लग गयी। वो तस्वीर में मुस्कुराती ' आँखो में सपने लिय कोई राजकुमार ' सालीनता , चहकता चेहरा कितनी खूबसूरत व सादगी भरा ' उस तस्वीर मे मैं जैसे खो सी गयी। क्या' दौर हुआ करता था। कितनी मधुरता हुआ करती थी ' रिश्तों में । कोई' भेद-भाव तुलनात्मक जीवन नहीं था। जो जैसा है। वैसा सही है। आस -पास
जात - पात ऊँच - नीच काम-काज में कोई भी नजरिया अलग नहीं था। उसी पर व्यक्ति धेर्य बांध कर जीता था।
डिप्रेशन नाम की कोई चीज नहीं थी। जिस लड़के के साथ विवाह कर दिया । उसी को अपना फर्ज अपना कर निभा लिया करती थी। (करते थे) दो समय की रोटी,
दो जोड़ी कपड़े ' सर के नीचे छत पर खुश रहता था।
ताजी हवा पानी का तो क्या कहना, रगो मे मिट्टी की खुशब कही भी बैठ जाओ। धरती माँ का एहसास होता । बस यू कहां जाये प्रकृति से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति जो एक हिन्दूतानी होने पर गर्व महसूस करता था। तभी शकुनतला " की कोहनी से आईना नीचे गिर टूट गया।
शकुनतला की चेतना जागी ' मैं भी कहां खो गयी। आईने के टुकड़ों मे अपने आप को देखा , जितने आईने के  टुकड़े हर एक टुकड़ा कुछ कहता था। जीवन मे तरह -तरह के रिश्ते निभाये ' तस्वीर से आईने मे झांका और देखा वही लड़की । जिसका चेहरा झाइयों से घिर गया। हर एक झाई में जीवन का तर्जुवा था। परिवार को पचास पचपन साल दिये । अन्त में वही आ गयी जहाँ से शुरू किया। मैं और मेरे पति महोदय । सालो साल हो जाते है। बेटे-बहू पोते पोती के मुँह देखे बिना विदेश मे नौकरी करने से ' लोगो की मानसिक सोच है। कामयाबी '
बेटी मेरी सोन चिड़ियां पंक्षी की तरह उड़ गयी। अपनी गृहस्थी से जब समय होता है। तब आना ' सारा घर काटने को दौड़ता है। अरे भाग्यवान आओ साथ मे खाना खाते हैं। मैने आलू पराठा बना लिया और साथ मे दही
जब तक श्वांस है तब तक तो साथ है। पति - शकुनतला अब थोड़ा मुस्कुरा दो, जिस मुस्कान पर मैं फिद हूं।

nandiniagarwal835328

(સાધારણ બોલો છો તે શું છે)
હું ....સમજાવું 😊.

સાધારણ થી સુંદર બીજું કાંઈ નથી,
નાનું ફૂલ પણ એ જ કહી જાય છે.

(એટલે સાધારણ હોવું કાંઈ ખોટું નથી)😀
(ઢમક) DHAMAK

heenagopiyani.493689

હવામાં ઊંચે ઉડતો પતંગ એક જ વાત શીખવે છે કે જેમ પવનનો સાથ મળતાં એ ઊંચે ઉડે છે અને સમય પૂર્ણ થતાં નાશ પામે છે એમ જ આપણે પણ જિંદગીમાં મળતી તક યોગ્ય રીતે વાપરી ઉચ્ચ પદે પહોંચવું. સાથે સાથે ધ્યાન રાખવું કે આ સ્થાન ચિરંજીવ નથી. સમય બદલાતાં ફરીથી નીચે આવવું જ પડે છે. આથી જ્યાં સુધી ઉચ્ચ પદ પર છીએ ત્યાં સુધી જે તમારી નીચેનાં વ્યક્તિઓ છે એમની કદર કરી લેવી. શું ખબર કાલ ઊઠીને આપણાં બંનેની પરિસ્થિતિ એકદમ વિરૂદ્ધ હોય? ત્યારે આપણાં કર્મો એ વ્યક્તિ આપણને યાદ અપાવે તો તકલીફ થાય એવી સ્થિતિ ઊભી ન થવી જોઈએ. બાકી જીવનનો અંત તો ગમે ત્યારે થવાનો જ છે. આ અંત પછી પણ જીવતાં રહેવું હોય તો લોકોની સારી યાદોમાં સ્થાન પામવા પ્રયત્ન કરવા.

s13jyahoo.co.uk3258

वो फटी- तूटी पतंगें,
जर्मी पर 'बिखरकर' गिरी पड़ी थी,
या कोई जगह लटकी हुई थी।

जिंदगी में 'किसी की खुशी के लिए',
खुद का बलिदान देना पड़े तो कैसे देना,

वह कितना सरल और सहज,
तरीके से 'समझाकर' चली गई।

parmarmayur6557

Dreams run in my blood becoming the fifth doctor in my family

manishakumari419144

शाम के छः बजकर बीस मिनट।
घर में सन्नाटा।
केवल फ्रिज की हल्की-सी गुनगुनाहट और दूर कहीं पड़ोस के बच्चे का साइकिल का घंटा।

मैं किचन से निकली।
ड्रॉइंग रूम की मेज पर नज़र पड़ी।
वही आधा गिलास।
पानी का।
ठंडा।
ऊपर से बर्फ का एक छोटा-सा टुकड़ा अभी भी पिघल रहा था।
किनारे पर हल्का-सा पानी का दाग।

कल रात उसने रखा था।
रात के ग्यारह बजकर कुछ मिनट।
टीवी बंद करके उठा था।
गिलास भरा।
दो घूँट पीए।
बाकी छोड़ दिया।
फिर बोला—"सोने चलते हैं।"

मैंने कहा—"गिलास तो उठा लो।"
उसने कहा—"सुबह कर लेंगे।"

सुबह हुआ।
गिलास वहीँ।
दोपहर हुई।
गिलास वहीँ।
अब शाम हो गई।
गिलास अभी भी वहीँ।

मैंने सोचा—उठा लूँ।
धो दूँ।
पर हाथ नहीं बढ़ा।
क्योंकि ये सिर्फ़ गिलास नहीं था।
ये एक छोटा-सा समझौता था।
एक छोटी-सी जंग।
जो हम दोनों लड़ रहे थे—बिना बोले।

अगर मैं उठाती, तो मानो मैं हार मान रही हूँ।
अगर वो उठाता, तो मानो वो झुक गया।
और हम दोनों को ही ये लग रहा था कि जो पहले झुकेगा, वो हारा हुआ होगा।

तो गिलास वहीं रहा।
पानी अब गुनगुना हो गया।
बर्फ गायब।
और ऊपर हल्की-सी धूल जम गई।

मैं कुर्सी पर बैठ गई।
गिलास को घूरती रही।
फिर धीरे से बोली—
"अब तो बस करो।
एक गिलास पानी ही तो है।"

पर जवाब किसी ने नहीं दिया।
न गिलास ने।
न घर की खामोशी ने।
न उसने—जो अभी तक ऑफिस से लौटा नहीं था।

मैंने हाथ बढ़ाया।
गिलास उठाया।
एक घूँट पीया।
ठंडक अब नहीं थी।
स्वाद भी नहीं।
बस एक पुरानी आदत।

फिर गिलास सिंक में रख दिया।
पानी बहाया।
साफ़ किया।
सुखाकर रख दिया।

पर मन में कुछ टूटा नहीं।
न कुछ जीता।
बस एक आधा गिलास खत्म हुआ।
जैसे हमारा एक छोटा-सा हिस्सा भी खत्म हो गया हो।

अब मेज पर कुछ नहीं।
खाली।
साफ़।
और बहुत शांत।

शायद यही चाहिए था।
न गिलास।
न पानी।
न लड़ाई।
बस खाली मेज।
और थोड़ा सा सुकून।

कल सुबह फिर से कोई गिलास रखेगा।
शायद पूरा।
शायद आधा।
पर आज के लिए—बस इतना ही।

a9560

मुझे नहीं पता क्या हुआ था उस रात,
तू दूर चली गई मुझसे छुड़ा कर अपना हाथ,
आज इतने दिनों बाद दिखे तो सोचा पूछ लूँ,
क्या तुम खुश हो गैरों के साथ।

jaiprakash413885

🌹आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865

" પીંજરું નીકળતું નથી "

શીખ આપવાની રીત ન્યારી જિંદગીની,
એ શીખવે જે, એ કોઈ શીખવતું નથી.

એ દોસ્ત, મને ન યાદ કરાવીશ તું એને,
બાદમાં, દિલ એને કેમેય વીસરતું નથી.

પ્રણયમાં મતલબની દોસ્તી ન મિલાવ,
પાષાણ દિલ કદી પણ પીગળતું નથી.

પંખી તો પાજરેથી નીકળી ગયું, પણ!
એ પંખીમાંથી પાંજરું નીકળતું નથી.

નિર્મળ તો લાગણીથી ભીંજાઈ જાય,
નિષ્ઠુરને "વ્યોમ" પણ ભીંજવતું નથી.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી ), મુ. રાપર

omjay818

सुबह सात बजकर बीस मिनट हुए थे।
आज भी वही रूटीन।
बाथरूम का दरवाज़ा खुला।
दर्पण के सामने खड़ी हुई।
लाइट जलाई।
ट्यूबलाइट की ठंडी सफ़ेद रोशनी चेहरे पर पड़ी।

मैंने दाँत ब्रश किया।
मुँह धोया।
फिर हाथों से चेहरा पोंछा।
और फिर... वही काम।
जो पिछले तीन साल से हर सुबह करती हूँ।
मुस्कुराई।
दर्पण में देखकर।
बस एक बार।
हल्की-सी।
जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।

आज भी मुस्कुराई।
पर कुछ अजीब लगा।
मुस्कान टिकी नहीं।
होंठ उठे तो थे, पर आँखों तक नहीं पहुँची।
जैसे होंठों ने धोखा दे दिया हो।
या शायद आँखों ने मना कर दिया हो।

मैंने फिर कोशिश की।
इस बार ज़ोर से।
दाँत दिखाकर।
वो मुस्कान जो ऑफिस में सबको दिखाती हूँ।
"गुड मॉर्निंग सर", "हाँ जी बिल्कुल", "नो प्रॉब्लम" वाली।
पर दर्पण ने कह दिया—नहीं।
ये भी झूठी लग रही है।

अब थोड़ा गुस्सा आया।
मैंने आईने से नज़रें मिलाईं।
और बोली—
"क्या प्रॉब्लम है तुझे?
बस एक मुस्कान ही तो चाहिए।
कितना मुश्किल है?"

आईना चुप रहा।
बस मेरी आँखें मुझे घूरती रहीं।
थकी हुई।
थोड़ी सूजी हुई।
और बहुत पुरानी।

मुझे याद आया—
पिछली बार कब सचमुच मुस्कुराई थी मैं?
नहीं, वो हँसी नहीं जो फ़ोन पर आती है।
नहीं, वो मुस्कान नहीं जो पड़ोसन को देखकर देनी पड़ती है।
वो मुस्कान जो अंदर से आती है।
जो छाती में गुदगुदी करती है।
वो कब आई थी आखिरी बार?

शायद उसी शाम जब राहुल ने कहा था—
"तू ऐसे ही मुस्कुराती रहे, बस।
बाकी सब मैं संभाल लूँगा।"

उसके बाद कभी नहीं आई।
न उसकी बात आई।
न वो शाम।
न वो मुस्कान।

मैंने हाथ बढ़ाया।
आईने पर उँगली रखी।
अपने होंठ छुए।
ठंडे थे।
जैसे किसी और के होंठ हों।

फिर धीरे से बोली—
"ठीक है।
न सही।
आज नहीं तो कल।
पर एक दिन फिर आएगी।
मुझे पता है।"

आईने ने जवाब नहीं दिया।
पर इस बार उसकी चुप्पी में कुछ अलग था।
जैसे वो कह रहा हो—
"मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।
तू बस मत छोड़ना कोशिश।"

मैंने लाइट बंद की।
बाथरूम से निकली।
आज भी ऑफिस जाना था।
आज भी वही "गुड मॉर्निंग" वाली मुस्कान लगानी थी।

पर जाते हुए एक बार फिर मुड़ी।
अँधेरे में भी दर्पण पर हल्की-सी चमक थी।
शायद मेरी आँखों की।
या शायद उस मुस्कान की जो अभी आने वाली है।

बस इतना ही।
एक दिन।
एक कोशिश।
और थोड़ा सा भरोसा।

a9560

मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌹🌹🙏🌹🌹

drbhattdamayntih1903

15 जनवरी— सेना-दिवस पर विशेष
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सैनिक! तुझको शत-शत प्रणाम।

संघर्ष कठिन सामने देख,
पग पीछे नहीं किये तुमने;
जनहित में, होकर महादेव-
विष के भी घूँट पिये तुमने।

बस, डटे रहे निज घाव लिये,
अनथक बिन विचलन, बिन विराम।

तेरी दृढ़ता के आगे नत,
जीवन के झंझावात रहे;
पथ से तू डिगा नहीं किंचित् ,
निष्प्रभ सारे आघात रहे।

हारे हैं तुझसे दण्ड-भेद,
हारे हैं तुझसे साम-दाम।

वीरता तुम्हारी रही बोल,
हैं वार तुम्हारे सीने पर;
माँ देख-देख व्रणहीन पृष्ठ,
गर्वित है तेरे जीने पर।

जन-जन आशीष रहा सन्मन,
ज्योतिर्मय युग-युग रहे नाम।

-- घनश्याम अवस्थी
गोंडा, उत्तरप्रदेश
सम्पर्क-- 9451607772

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ghanshyamawasthi.678074