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New bites

खड़े हो यूँ हाथों में गुलदस्ता लिए तुम,
अभी तो रगों में ज़हर उतरना बाकी है,
जलकर ख़ाक होना है अभी, ठहर जाओ तुम,
अभी तो उनका दुल्हन बनते देखना बाकी है।

nileshrajput842gmail.com162713

You're Not Alone
You're Just Disconnected

ziddiceo

Everyone Dreams

ziddiceo

दोस्तो मेरी पहली रचना प्रकाशित हुए हैं l आप सभी मेरी रचना पढ़िए और Comment,rating करे l
उम्मीद है आपको अच्छी लगेगी l

apki Abantika 🌸✨️🦋

leoleo315756

​थॉमस एडिसन का अंधेरा: हजार असफलताओं की रौशनी

​यह 1870 के दशक की बात है, जब न्यूयॉर्क की सड़कों पर गैस लैंपों की मद्धिम रौशनी ही रात का सहारा थी। इसी शहर की एक छोटी-सी प्रयोगशाला में थॉमस एडिसन नाम का एक व्यक्ति दिन-रात एक धुन में लगा रहता था। उसका सपना था, बिजली से जलने वाला ऐसा बल्ब बनाना जो हर घर को रोशन कर दे।

​एक दिन शाम को, एडिसन अपनी प्रयोगशाला में तार और कांच के बल्बों के ढेर के बीच बैठा था। उसके सहायक, जेम्स, ने झुँझलाहट भरे स्वर में कहा, "थॉमस, हमने फिर कोशिश की, यह फिलामेंट भी टूट गया! यह हजारवीं बार है जब हम फेल हुए हैं।"

​एडिसन ने मुस्कुराते हुए जेम्स की तरफ देखा। उसकी दाढ़ी पर कार्बन के निशान थे और आँखें नींद से लाल थीं, लेकिन चेहरे पर हार का कोई भाव नहीं था। "जेम्स," एडिसन ने कहा, "हम फेल नहीं हुए हैं। हमें बस यह पता चला है कि 999 ऐसे तरीके हैं जिनसे बल्ब नहीं जलता।"

​जेम्स ने गहरी सांस ली, "लेकिन हम कब तक ऐसे ही प्रयोग करते रहेंगे? बाजार में लोग हमारा मजाक उड़ा रहे हैं। वे कहते हैं, 'यह सनकी आदमी अंधेरे में रौशनी ढूंढ रहा है!'"

​एडिसन उठ खड़ा हुआ। उसने एक पुराना टूटा हुआ फिलामेंट उठाया और उसे अपनी उंगलियों के बीच घुमाया। "जेम्स, इतिहास में कोई भी महान आविष्कार आसानी से नहीं हुआ है। क्या तुम्हें लगता है ग्राहम बेल ने एक बार में टेलीफोन बना दिया होगा? या राइट बंधुओं ने पहली उड़ान में ही सफलता पा ली होगी?"

​"पर हमें आगे क्या करना चाहिए?" जेम्स ने पूछा।

​"हमें सिर्फ एक बार सही तरीका खोजना है," एडिसन ने दृढ़ता से कहा, "एक बार। और जब हम उसे ढूंढ लेंगे, तो पूरी दुनिया रोशनी से जगमगा उठेगी।"

​अगले कुछ हफ्तों तक, एडिसन ने हर संभव सामग्री पर प्रयोग किया। प्लैटिनम, लकड़ी के रेशे, धातु के तार—वह कुछ भी छोड़ने को तैयार नहीं था। उसकी टीम थक चुकी थी, लेकिन एडिसन का जुनून कम नहीं हुआ था।

​एक रात, जब सब सो रहे थे, एडिसन को एक विचार आया। उसने बांस के बारीक रेशों को कार्बन से उपचारित किया। उसने अपनी धड़कनें रोके हुए उस फिलामेंट को बल्ब में लगाया और स्विच ऑन किया।

​एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, एक हल्की पीली रौशनी पूरे कमरे में फैल गई। वह रौशनी लगातार जलती रही—एक घंटे, दो घंटे, चार घंटे... चालीस घंटे तक!
​जेम्स और बाकी सहायक दौड़ते हुए आए। उनकी आँखों में अविश्वास और खुशी के आँसू थे।
​"हमने कर दिखाया!" जेम्स चिल्लाया।

​एडिसन ने उस जलते हुए बल्ब को देखा, उसकी आँखों में गहरी संतुष्टि थी। "हाँ, जेम्स। हमने कर दिखाया। और इस बार हमें यह भी नहीं पता चला कि कितने और तरीके थे जिनसे यह काम नहीं करता।"
​थॉमस एडिसन की इस जीत ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। यह सिर्फ एक बल्ब का आविष्कार नहीं था, यह इस बात का प्रमाण था कि 'असफलता' सिर्फ एक कदम है सफलता की सीढ़ी पर, बशर्ते आप हार न मानें। उसका अंधेरा अब दुनिया की रौशनी बन चुका था

a9560

उसने बड़े आसानी से कह दिया –
कल मरो तो आज मर जाओ,
और अच्छा है… जल्दी मर जाओ।
आज मेरी आख़िरी उम्मीद भी टूट गई,
अब मन नहीं करता कुछ लिखने का…
क्योंकि अब भीतर कुछ बचा ही नहीं।
जिसे अपना सब कुछ माना था,
उसी के आख़िरी शब्द ज़हर बन गए।
अब क्या रखूँ उम्मीद…
जब सांसों की कीमत
उसी की नज़रों में शून्य हो गई।

archanalekhikha

स्वामी विवेकानंद : शिकागो की गर्जना

सन् 1893, शिकागो का विशाल कोलंबस हॉल। चारों तरफ विद्वानों, पादरियों और दार्शनिकों की भीड़ थी। गेरुए वस्त्र पहने एक भारतीय युवक कोने में शांत बैठा था। उसके मन में उथल-पुथल थी, पर चेहरा स्थिर।

आयोजक ने आवाज दी, "अब भारत से स्वामी विवेकानंद अपना वक्तव्य रखेंगे।"

विवेकानंद मंच पर आए। हजारों आँखें उन्हें संदेह और कौतूहल से देख रही थीं। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!"

इतना सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दो मिनट तक तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।

भाषण के बाद, जब विवेकानंद बाहर निकले, तो प्रोफेसर राइट ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, आपने संबोधन में 'भाइयों और बहनों' ही क्यों चुना? यहाँ तो सब लेडीज एंड जेंटलमैन कह रहे थे।"

विवेकानंद मुस्कुराए, "प्रोफेसर, बाकी दुनिया के लिए संबंध औपचारिक हो सकते हैं, लेकिन मेरे भारत के लिए पूरा विश्व एक परिवार है। मैंने सिर्फ सत्य को पुकारा था।"

तभी एक अहंकारी विदेशी विद्वान पास आया और व्यंग्य से बोला, "साधु जी, आपके देश में तो इतनी गरीबी है, आप यहाँ धर्म की बात करने आए हैं? क्या धर्म पेट भर सकता है?"

विवेकानंद की आँखों में एक चमक उभरी, "महोदय, भूखे पेट धर्म नहीं किया जाता, यह सच है। लेकिन जिस संस्कृति के पास हजारों वर्षों का आध्यात्मिक धन हो, वह दरिद्र कैसे हो सकती है? हम रोटी मांगने नहीं, दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाने आए हैं।"

उस रात विवेकानंद को एक अमीर परिवार में ठहराया गया। मखमली बिस्तर और ऐशो-आराम देखकर उनकी आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने खुद से कहा, "मेरे देश के लोग घास फूस की झोपड़ियों में सो रहे हैं और मैं यहाँ इस विलासिता में? हे माँ, क्या इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ?"

अगले दिन, एक पत्रकार ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, भारत को बदलने के लिए सबसे जरूरी क्या है?"
विवेकानंद ने दृढ़ता से जवाब दिया, "आत्मविश्वास। भारत को अपनी शक्ति पहचाननी होगी। उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"

शिकागो की उस सभा ने दुनिया को बता दिया कि भारत का गौरव उसकी मिट्टी में नहीं, उसके विचारों में है। स्वामी जी ने न केवल हिंदुत्व का मान बढ़ाया, बल्कि मानवता को एक सूत्र में पिरोने का मंत्र दिया। उनके उस भाषण ने गुलाम भारत के सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया, जिसकी गूँज आज भी इतिहास के पन्नों में जीवंत है।

a9560

अभी के दौर में ऐसा है कि अपने धर्म को माननेवाले लोग 'अपने धर्म को ही श्रेष्ठ' मानते हैं।

यह मानना भी चाहिए
कोई ग़लत बात नहीं है।

किन्तु मेरा 'धर्म ही श्रेष्ठ' है, यह साबित करने में 'अधर्म करना' सबसे बुरी बात है।

अपने धर्म के प्रति प्रेम रखना और मानना चाहिए ।
ऐसे ही अन्य धर्मों के प्रति आदर भाव भी व्यक्त करना चाहिए।

हमारी जो यह सोच है तो एक अच्छे धर्म को माननेवाले अच्छे व्यक्ति में हमारी गणना सत्य के साथ संपादित होगी।

मानवता ही सभी धर्मों का मुख्य सार है।

बस इतना जान लेने वाला इंसान किसी भी धर्म का हो उसका धर्म अपने-आप श्रेष्ठ हो जाता है।

parmarmayur6557

मौनी अमावस्या: मौन, आस्था और आत्मचिंतन का पर्व

भारतीय पंचांग में मौनी अमावस्या का विशेष स्थान है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में उतरने का अवसर है। माघ मास की अमावस्या को मनाई जाने वाली यह तिथि मौन—अर्थात् चुप्पी—के महत्व को रेखांकित करती है। जहाँ दुनिया शोर में उलझी रहती है, वहीं मौनी अमावस्या हमें भीतर की आवाज़ सुनने के लिए आमंत्रित करती है।

मौन का अर्थ और महत्व

‘मौनी’ शब्द मौन से बना है। इस दिन मौन व्रत रखने की परंपरा है—कुछ लोग पूरे दिन, कुछ निश्चित समय तक। मौन का उद्देश्य केवल बोलना बंद करना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म—तीनों को संयमित करना है। माना जाता है कि मौन से मानसिक चंचलता शांत होती है, आत्मसंयम बढ़ता है और विचारों की स्पष्टता आती है। यह दिन आत्मचिंतन, प्रायश्चित और संकल्प का होता है।

पवित्र स्नान और दान

मौनी अमावस्या पर पवित्र नदियों—विशेषकर गंगा, यमुना, सरस्वती (त्रिवेणी संगम)—में स्नान का विशेष महत्व है। प्रयागराज में इस दिन विशाल स्नान पर्व होता है, जहाँ श्रद्धालु तड़के से ही संगम की ओर बढ़ते हैं। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
स्नान के बाद दान का विधान भी है—अन्न, वस्त्र, तिल, कंबल, या सामर्थ्य अनुसार धन। दान का भाव करुणा और सेवा से जुड़ा होता है, जो समाज और आत्मा—दोनों को समृद्ध करता है।

आध्यात्मिक साधना और व्रत

मौनी अमावस्या साधकों के लिए विशेष दिन है। जप, ध्यान, योग और स्वाध्याय से इस दिन की साधना और फलदायी मानी जाती है। कुछ लोग फलाहार या उपवास रखते हैं। व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन की शुद्धि है।

आधुनिक जीवन में मौनी अमावस्या

आज के तेज़-रफ़्तार जीवन में मौन दुर्लभ हो गया है। मौनी अमावस्या हमें डिजिटल शोर से विराम लेने, अनावश्यक बातचीत से दूरी बनाने और अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्ची शांति बाहर नहीं, भीतर मिलती है।

निष्कर्ष

मौनी अमावस्या आस्था, अनुशासन और आत्मचिंतन का पर्व है। यह हमें मौन की शक्ति से परिचित कराता है—जो शब्दों से परे जाकर मन को स्थिर करता है। यदि इस दिन हम थोड़ी देर के लिए ही सही, मौन अपनाएँ, सेवा करें और भीतर की ओर देखें, तो यह पर्व अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है।
मौन में ही अक्सर सबसे स्पष्ट उत्तर मिलते हैं।

a9560

Mr CEO HusbandMy CEO Husband

Part 1: The Man Everyone Feared

The conference room on the forty-second floor of Armaan Industries was wrapped in a tense silence.

A long Italian marble table stretched across the room, surrounded by some of the most powerful men in the business world. Board members, senior executives, foreign investors—everyone was present. Files lay untouched. Coffee had gone cold. No one dared to speak too loudly.

They were waiting.

Waiting for the man who owned not just the company, but the fear inside their hearts.

“He’s late,” one of the foreign delegates whispered, checking his expensive watch for the third time.

No one answered.

Being late was something only one man in this building was allowed to do.

Suddenly, the glass doors slid open.

The entire room stood up at once.

“There,” someone murmured, barely audible. “Mr. Armaan is here.”

Tall. Broad-shouldered. Dressed in a perfectly tailored black suit. Black leather gloves in one hand. And dark sunglasses covering eyes that were said to be colder than steel.

Armaan Malhotra walked in like he owned the air itself.

He didn’t greet anyone.

Didn’t smile.

Didn’t acknowledge the respect rising around him.

He simply took his seat at the head of the table, removed his sunglasses slowly, and placed them beside his watch.

Sharp grey eyes scanned the room.

“Sit,” he said.

That single word carried the authority of a command.

Everyone obeyed instantly.

“Why is this meeting delayed?” Armaan asked, his voice calm but lethal.

One of the directors cleared his throat nervously. “S–Sir, we were waiting for you.”

Armaan leaned back, fingers tapping lightly on the table. “Next time, don’t.”

Silence fell again.

This was Armaan Malhotra.

The youngest CEO in the country. A self-made billionaire. A man who never mixed emotions with business. A man whose personal life was as closed as a locked vault.

And a man who hated distractions.

Yet, at that very moment, a distraction was slowly entering his life.


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Across the city, in a small, modest house far away from glass buildings and power suits, Aarohi sat quietly on the edge of her bed.

Her hands trembled.

A letter lay open in her lap.

Not just any letter.

A marriage proposal.

No—an arrangement.

Her mother stood near the window, wiping her tears repeatedly. Her father sat on a wooden chair, his shoulders slumped as if the weight of the world rested on him.

“Aarohi,” her father said softly, “we don’t have any other option.”

She looked up, eyes filled with disbelief and pain. “You want me to marry a man I’ve never met… just to save this family?”

Her mother rushed to her side. “Beta, he is a very big man. Very powerful. He can solve everything.”

Aarohi laughed bitterly. “By buying me?”

No one answered.

The truth hurt too much to deny.

Armaan Malhotra needed a wife.

Not for love.

Not for companionship.

But for a business reason that would decide the future of his empire.

And Aarohi—simple, educated, middle-class Aarohi—was the chosen sacrifice.


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Back in the conference room, Armaan closed the final file with a sharp thud.

“The deal will go through,” he said. “Prepare the documents.”

One board member hesitated. “Sir… there is one personal matter that needs your approval.”

Armaan’s eyes darkened. “I don’t do personal.”

“It’s about… the marriage announcement,” the man said carefully.

A muscle in Armaan’s jaw tightened.

“Fix the date,” he replied coldly. “I don’t care about anything else.”

The room froze.

For Armaan, marriage was nothing but another contract.

For Aarohi, it was the beginning of a storm she wasn’t ready for.


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That night, Aarohi stood on the terrace, staring at the city lights.

Somewhere in that shining jungle of buildings lived the man she was going to marry.

A stranger.

A CEO.

A man rumored to be ruthless.

She hugged her arms around herself.

“Who are you, Mr. Malhotra?” she whispered to the wind. “And what will you do to my life?”

Far away, in a penthouse glowing above the city, Armaan poured himself a glass of whiskey.

Marriage, for him, was a means to an end. But fate had plans that neither of them could foresee.


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To be continued

rajukumarchaudhary502010

ख़ुद पर नही ख़ुद से भी ज्यादा
हैं हमको तुमपर ऐतबार
तुम मानो या ना मानो इसका
तुमको पूरा हैं इख़्तियार

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
अपनी कामयाबी की सीढ़ियाँ, इतनी
मज़बूत बनाओ कि,

किसी के हक़ के कंधों पर, पैर रखने
की ज़रूरत न पड़े…🤞🔥

#𝐉𝐀𝐈_𝐒𝐇𝐑𝐄𝐄_𝐑𝐀𝐌 ..🚩
#𝗴𝕠𝕠𝗱_𝕄𝗼𝗥𝗻𝕚𝗡𝕘_ ..🌸
╭─❀💔༻ 
╨──────────━❥
#motivatforself 😊°  
⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪
╨────✥}}{{✥───━❥

loveguruaashiq.661810

Awaiting for Sunday

kattupayas.101947

sleep mode on Sunday

kattupayas.101947

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
🌹 आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865

माँ सरस्वती की कथा ( ज्ञान की देवी का अवतरण )🌼 माँ सरस्वती की कथा – ज्ञान की देवी का अवतरण 🌼
प्राचीन काल की बात है। जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तब चारों ओर अंधकार, मौन और शून्यता थी। न शब्द थे, न स्वर, न ज्ञान का प्रकाश। ब्रह्मांड नीरव था। तब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, परंतु उन्हें लगा कि संसार में कुछ कमी है—
मनुष्य थे, पर सोच नहीं थी,
नेत्र थे, पर समझ नहीं थी,
कान थे, पर सुनने का अर्थ नहीं था।
तब भगवान ब्रह्मा ने गहन तपस्या की।
उनकी तपस्या से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। उसी प्रकाश से माँ सरस्वती का अवतरण हुआ। वे श्वेत वस्त्रों में, कमल पर विराजमान थीं। उनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और कमंडल था।
माँ सरस्वती ने जब वीणा के तार छेड़े, तो— 🎵 ध्वनि पैदा हुई,
📖 ज्ञान जन्मा,
📝 भाषा बनी,
🎨 कला और संगीत का उदय हुआ।
जहाँ मौन था, वहाँ शब्द आए।
जहाँ अज्ञान था, वहाँ बुद्धि का प्रकाश फैला।
माँ सरस्वती ने मनुष्य को विवेक, संयम, ज्ञान और सृजनशीलता प्रदान की। उन्होंने सिखाया कि—
“ज्ञान बिना अहंकार के हो,
विद्या बिना लोभ के हो,
और बुद्धि सत्य के मार्ग पर चले।”
एक बार एक अहंकारी राजा ने कहा—
“मेरे राज्य में सबसे बड़ा बल धन और शक्ति है।”
माँ सरस्वती एक साधारण स्त्री के रूप में वहाँ पहुँचीं और एक छोटे बालक को पढ़ाने लगीं। वही बालक आगे चलकर महान विद्वान बना, और उसी विद्या से राज्य को सही मार्ग दिखाया।
तब राजा को समझ आया कि—
बल से बड़ा ज्ञान होता है, और ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं।
तब से माँ सरस्वती को विद्या, बुद्धि और कला की देवी माना जाने लगा।
आज भी जब विद्यार्थी पढ़ाई शुरू करते हैं, कलाकार रचना करते हैं, लेखक कलम उठाते हैं—
तो सबसे पहले कहते हैं—
🙏 “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” 🙏
क्योंकि जहाँ माँ सरस्वती का आशीर्वाद होता है,
वहाँ अज्ञान का अंधकार टिक नहीं पाता।

rajukumarchaudhary502010

એકાએક કવિતા સાંભળવાની જીદ સાથે તું મારી સામે બેસી જાય છે ત્યારે,
વિખેરાયેલી પંક્તિઓને કવિતામાં સમેટવાનો અમસ્તો પ્રયાસ હું કરતો નથી..
એ ક્ષણે બસ તું જ મારા હોઠે હોય છે!

મારી એકાક્ષરી કવિતા એટલે "તું"...

-નીલકંઠ

neelkanthvyas3915

recently I purchased this book in Chennai book fair. I recommend this book. All men and women are different from every angle. it's for adults.

kattupayas.101947

Goodnight friends.. sweet dreams

kattupayas.101947

कोई भी लड़की यहां अकेली नजर नहीं आती
यहां हर एक खजाने पे साफ़ बैठा है

anisroshan324329

ज़िक्र होगा जब मुहब्बत का
, प्यार की जब भी बात निकलेगी,
चर्चा होगा अगर इनायत का,
और हिफ़ाज़त की बात निकलेगी,
बात निकलेगी जब ज़माने में,
किसकी बेलौस मुहब्बत है यहाँ,
हर दफ़ा लफ़्ज़ 'माँ' ही गूंजेगा,

हर दफ़ा 'माँ की बात निकलेगी......

anisroshan324329

अरज करु छू
अबे जल्दी बोल सुबह पनवेल निकलना है

ha Ha ha ha

तुम चले गये और मेरी कविताएँ... बिन ब्याही विधवा हो गईं

ये क्या था
ये क्या हुई

anisroshan324329

मुस्कुराना तो लडकियों की अदा है
और उसको जो मोहब्बत समझे वही तो गधा है


बोलो कैसी रही

anisroshan324329