ऋगुवेद सूक्ति-- (65) की व्याख्या"उत्सं दुहन्ति"ऋगुवेद --9/112/1भावार्थ --अन्दर से उत्साह उत्पन्न करो।उत्सं दुहन्ति” (ऋग्वेद 9.112.1)इसका अर्थ समझने के लिए ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (64)की व्याख्या"विश्वासं धेहि"ऋगुवेद --10/48/5भावार्थ --मन में विश्वास स्थापित करो।ऋग्वेद 10/48/5 — पूरा मंत्रमंत्र (संस्कृत):विश्वासं धेहि मे मनो ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (63)की व्याख्या"धियं धारय"ऋगुवेद --8/1/5भावार्थ -- मन को स्थिर रखो।मंत्र:“धियं धारय” — ऋग्वेद 8.1.5शब्दार्थ--धियं (धियः) = बुद्धि, मन, ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (62) की व्याख्या"न मृष्यसे"ऋगुवेद --1/116/2हार मत मानो। सामना करो।“न मृष्यसे” (ऋग्वेद 1/116/2) का अर्थ थोड़ा सूक्ष्म है, ...
ऋगुवेद सूक्ति--(61) की व्याख्या"बलं धेहि"ऋगुवेद --4/9/6भाव--शक्ति प्रदान करो।ऋग्वेद मण्डल 4, सूक्त 9, मन्त्र 6 का “बलं धेहि” पद अत्यन्त ...
ऋगुवेद सूक्ति-(60) की व्याख्या"श्रेष्ठ यश:"ऋगुवेद --4/33/11भावार्थ --श्रेष्ठ यश प्राप्त करो।ऋग्वेद 4/33/11 में “श्रेष्ठ यश:” का भाव वास्तव में मनुष्य ...
ऋगुवेद सूक्ति--(51)की व्याख्या“नव्यो नव्यो भवति” (ऋग्वेद-- 1/31/8)का भाव बहुत प्रेरणादायक और गहन है।शब्दार्थ:--नव्यो नव्यः = बार-बार नया, सदैव नवीनभवति ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१२) की व्याख्या-“त्वमस्माकं तव स्मसि”ऋगुवेद --८/९२/३२भावार्थ --प्रभु ! तू हमारा है हम तेरे हैं।यह आत्मसमर्पण, आश्रय और दिव्य–संबंध ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (१०) की व्याख्या“न रिष्यते त्वावतः सखा” — (जो ईश्वर का सखा/भक्त है वह नष्ट नहीं होता) —इस ...
“ऋगुवेद सूक्ति--(11) की व्याख्या--एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” —ऋग्वेद -- ६/३६/४भावार्थ --सब लोकों का स्वामी वह एक ही है।पूर्ण ऋचा ...