चिट्ठी का इंतजार

(1)
  • 238
  • 0
  • 474

एक ज़माना था… जब समय घड़ी की सुइयों से नहीं, इंतज़ार की धड़कनों से मापा जाता था। उस छोटे से कस्बे की सुबह बड़ी सादी होती थी। सूरज निकलता, चूल्हों में आग जलती, और गलियों में झाड़ू की आवाज़ गूंजती। पर जिस आवाज़ का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता, वह होती थी — डाकिया की साइकिल की घंटी। रामदीन के घर में यह इंतज़ार जैसे रोज़ की पूजा थी। आँगन में पीपल के पत्तों की छाया पड़ती थी। बीच में एक पुरानी चौकी रखी रहती, जिसके चारों पाये ज़मीन में धँस चुके थे। उसी पर बैठी रहती थीं अम्मा — आँचल सिर पर, आँखें गली के मोड़ पर टिकी हुई।

1

चिट्ठी का इंतजार - भाग 1

"चिठ्ठी का इंतजार"एक ज़माना था…जब समय घड़ी की सुइयों से नहीं, इंतज़ार की धड़कनों से मापा जाता था।उस छोटे कस्बे की सुबह बड़ी सादी होती थी। सूरज निकलता, चूल्हों में आग जलती, और गलियों में झाड़ू की आवाज़ गूंजती।पर जिस आवाज़ का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता, वह होती थी — डाकिया की साइकिल की घंटी।रामदीन के घर में यह इंतज़ार जैसे रोज़ की पूजा थी। आँगन में पीपल के पत्तों की छाया पड़ती थी। बीच में एक पुरानी चौकी रखी रहती, जिसके चारों पाये ज़मीन में धँस चुके थे। उसी पर बैठी रहती थीं अम्मा — आँचल सिर ...Read More

2

चिट्ठी का इंतजार - भाग 2

भाग दो"चिठ्ठी का इन्तजार"मोहन को गए हुए तीन बरस हो चुके थे।तीन बरस — कहने को तो बस तीन अम्मा के लिए हर बरस एक पूरी उम्र था।शहर जाने के दिन मोहन ने जाते-जाते कहा था, “अम्मा, बस काम लग जाए, फिर आपको भी बुला लूँगा।” अम्मा मुस्कुरा दी थीं। माँ जानती है, बेटे झूठ नहीं बोलते,बस समय सच नहीं बोलने देता।उस दिन के बाद से अम्मा की सुबहें बदल गई थीं। अब वह सूरज से पहले उठ जातीं।चूल्हे पर चढ़ती पहली रोटी भगवान को नहीं,मोहन को अर्पित होती। “जहाँ भी हो, पेट भर के खाना…” वे बुदबुदातीं।मोहन शहर ...Read More

3

चिट्ठी का इंतजार - भाग 3

भाग तीन"चिट्ठी का इंतजार"जहाँ आशा और भय बराबर खड़े होते हैंजहाँ शब्द टूटने लगते हैं, और मौन बोलने लगता चिट्ठियाँ सिर्फ ख़बर नहीं लाती थीं, वे मौन संकेत लाने लगी थीं, रामदीन के घर में सब कुछ पहले जैसा ही था, वही आँगन, वही चौकी, वही पीपल की छाया, पर उस स्थिरता के भीतर कुछ टूट रहा था, धीरे-धीरे, बिना आवाज किए।मोहन की चिट्ठियाँ अब छोटी हो गई थीं,पहले जहाँ पूरा पन्ना भर जाता था,अब आधा भी नहीं भरता।“मैं ठीक हूँ” अब “ठीक हूँ” बन गया था।बाबूजी इस बदलाव को समझ रहे थे, वे चिट्ठी पढ़ते समय हर विराम ...Read More