मेरे दूल्हे को मरना होगा

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घर भरा हुआ था। आँगन में रिश्तेदारों की आवाज़ें थीं—हँसी, गाने, बर्तनों की खनक। शादी की तारीख़ पास थी, और हर कोना तैयारियों से भरा हुआ। सौम्या गुनगुनाती हुई कमरे में आई। अलमारी से सलवार-कमीज़ निकाली और बेड पर रख दी। फिर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और नल खोल दिया। एक-एक कर उसने कपड़े उतारकर गंदे कपड़ों के बैग में रख दिए। पानी गिरता रहा। गरम भाप उठती रही। एक हफ्ते में शादी थी। उसकी आँखों के सामने करण का चेहरा तैर गया—

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 1: निर्वस्त्र

घर भरा हुआ था। आँगन में रिश्तेदारों की आवाज़ें थीं—हँसी, गाने, बर्तनों की खनक। शादी की तारीख़ पास थी, हर कोना तैयारियों से भरा हुआ। सौम्या गुनगुनाती हुई कमरे में आई। अलमारी से सलवार-कमीज़ निकाली और बेड पर रख दी। फिर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और नल खोल दिया। एक-एक कर उसने कपड़े उतारकर गंदे कपड़ों के बैग में रख दिए। पानी गिरता रहा। गरम भाप उठती रही। एक हफ्ते में शादी थी। उसकी आँखों के सामने करण का चेहरा तैर गया— करण, उसका मंगेतर, होने वाला पति। अमेरिका रिटर्न। स्मार्ट और शार्प। स्विट्ज़रलैंड के हनीमून ...Read More

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 2: चुप्पी

बाथरूम वाली घटना की उसी शाम, बड़ी हवेली होने वाली शादी की सजावट से जगमगा रही थी। यही हवेली के बचपन का घर था। सौम्या के पिता, ठाकुर धुरंधर सिंह, पुराने समय के राजवाड़ी ज़मींदार थे। मौजूदा पहचान भले ही एक सांसद की थी, लेकिन पैसा, रौब और शक्ति अब भी राजवाड़ों जैसी ही थी। हवेली के चारों ओर फैला बाग़ तरतीब से कटा हुआ था, लेकिन हर पगडंडी पर निगाहें तैनात थीं। चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद गुंडों का पहरा था। कुछ सजे-धजे कमांडो—बूट चमकाते, कंधों पर राइफलें। कुछ उन्हीं में घुले-मिले सादे कपड़ों में—कहीं बनियान पहने, कहीं जैकेट डाले, ...Read More

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 3: डाकू-जख्खड़

मटन बिरयानी की खुशबू अब भी हवा में तैर रही थी। मंत्री जगनमोहन दयाल ने उँगलियाँ धोते हुए तसल्ली कहा, “जानकी भाभी—आपके घर जैसी बिरयानी पूरे प्रदेश में कहीं नहीं मिलेगी।” जानकी देवी पल्लू सही करती हुई बोलीं, “निर्मला दीदी और बच्चों के लिए एक डब्बा पैक करवा रही हूँ।” मंत्री दयाल हँसे। “नहीं भाभी, जो बात ताज़ा खाने में है वो अलग ही होती है। उन्हें लेकर ही आऊँगा, यहीं खिलाने।” “जी, बिल्कुल,” जानकी देवी ने कहा। “आपका ही घर है।” ठाकुर धुरंधर सिंह मुस्कराए। “आइए, गोष्ठी में चलते हैं।” दोनों के बीच वही पुरानी अपनायत थी—सत्ता की, ...Read More