आज अमावस्या की बेहद डरावनी और काली रात थी। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव के उस मोहल्ले पर इस अंधेरी रात का गहरा साया छाया हुआ था। बाहर सन्नाटा और अंधेरा था, लेकिन दीनानाथ के घर के अंदर का माहौल बाहर के अंधेरे से कहीं ज्यादा भयानक था। हॉल में टीवी तेज़ आवाज़ में चल रहा था। समाचार चैनल पर देश-दुनिया की खबरें गूंज रही थीं, लेकिन उन्हीं दीवारों के बीच एक 21 साल के युवक की सिसकियाँ उस शोर में दब कर रह गई थीं।
दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 1
लहू के आँसू और वो काली रातआज अमावस्या की बेहद डरावनी और काली रात थी। मध्य प्रदेश के एक से गाँव के उस मोहल्ले पर इस अंधेरी रात का गहरा साया छाया हुआ था। बाहर सन्नाटा और अंधेरा था, लेकिन दीनानाथ के घर के अंदर का माहौल बाहर के अंधेरे से कहीं ज्यादा भयानक था। हॉल में टीवी तेज़ आवाज़ में चल रहा था। समाचार चैनल पर देश-दुनिया की खबरें गूंज रही थीं, लेकिन उन्हीं दीवारों के बीच एक 21 साल के युवक की सिसकियाँ उस शोर में दब कर रह गई थीं।रुद्रांश ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा ...Read More
दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 2
अतीत के घाव और वो तीन केलेबलुआ पत्थर की ठंडी सीढ़ियाँ रुद्रांश की रीढ़ में सिहरन पैदा कर रही लेकिन उसने सिकुड़ने की कोशिश नहीं की। हवा में सुबह की ओस और रात की बुझी हुई आरती की राख की महक घुली थी। उसकी नज़रें स्थिर थीं। उसने एक नज़र नीचे बसे उस गाँव की ओर देखा, जहाँ उसका घर था—नहीं, वह 'घर' नहीं, बल्कि ईंट-गारे और ताने-उलाहनों से बुना एक ऐसा पिंजरा था जहाँ उसका बचपन घुट-घुट कर मर चुका था। उसने अपनी गर्दन घुमाकर पीछे मंदिर के शांत प्रांगण को देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था ...Read More