तुम अक्सर कोशिश करती हो
कठोर बनने की।
लोगों की नज़र में सख़्त,
थोड़ी रूखी,
थोड़ी दूर-दूर सी।
शायद इसलिए कि
दुनिया को नरमी समझ नहीं आती,
और हर बार नरम दिल
सबसे पहले चोट खाता है।
क्या ख़ूब कहा है
“कठोर दिखना
अक्सर बचाव की भाषा होती है।”
लोग सोचते हैं
तुम्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।
कि तुम मज़बूत हो,
अडिग हो,
बिलकुल पत्थर जैसी।
पर तुम ही जानती हो
तुम्हारा दिल पत्थर का नहीं है।
वो अब भी काँपता है
किसी अपने की आवाज़ पर,
अब भी भर आता है
बिना वजह किसी याद पर।
क्या ख़ूब कहा है
“दिल अगर पत्थर का होता,
तो दर्द चुपचाप सह लेता,
ये जो चुप रहकर टूटता है,
ये ज़िंदा दिल की निशानी है।”
तुम कठोर इसलिए नहीं हो
कि तुम्हें महसूस नहीं होता,
तुम कठोर इसलिए दिखती हो
क्योंकि तुम्हें
बहुत ज़्यादा महसूस होता है।
Dear Me,
ख़ुद को दोष मत दो
अगर तुम अब पहले जैसी नहीं रहीं।
तुम बदली नहीं हो,
तुमने बस सीख लिया है
कहाँ नरम रहना है
और कहाँ कठोर दिखना ज़रूरी है।
और हाँ
जो तुम्हें पत्थर समझते हैं न,
उन्हें क्या पता
पत्थर बनने से पहले
तुम कितनी बार
काँच की तरह टूटी हो।
आख़िर में बस इतना
“कठोर चेहरा
और नरम दिल
ये वही लोग रखते हैं
जिन्होंने ज़िंदगी को
बहुत क़रीब से देखा होता है।”
☹️🙁