काश उस दिन वक़्त ठहर जाता,
काश कि उस दिन मैं चुप हो जाता,
ना मिलते हम, ना ही कोई बात होती,
और काश, ये काश ही रह जाता....
लेकिन,
लेकिन उसे भी तो मंज़ूर कुछ और ही था,
मिलना, बतियाना और ना जाने कितने जवाबों की जगह सवाल छोड़ जाना,
जैसे सब्र, अकेलापन, सूनापन, सोचने पे मजबूर.....
और एक लंबा इंतज़ार....
काश, ये काश ही रह जाता....
@मन_का_झरोखा