“सफेद बालों वाला इश्क़……”
मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना,
उनकी मोहब्बत से सीखना….. तो उसी पे लिखा है।
मैं देखती हूँ उन्हें कहीं छज्जे पे बैठे,
वो अख़बार पढ़ते हैं, ये स्वेटर बुनती हैं।
बीच-बीच में नज़रें मिलती हैं,
बिन बोले ही सारा दिन गुज़र जाता है।
कोई शोर नहीं, कोई दिखावा नहीं,
बस एक कप चाय, दो हिस्सों में बांटी जाती है।
मैं देखती हूँ उन्हें किसी बगीचे में,
धीमी चाल से, पर क़दम मिलाकर चलते।
वो लाठी थामे हैं, पर इनका हाथ नहीं छोड़ते,
ये फूल तोड़ें तो वो मना नहीं करते।
बेंच पर बैठकर घंटों ख़ामोश रहते,
फिर भी लगता है बातें हज़ार करते।
मैं देखती हूँ उन्हें ट्रेन के बाद भी,
स्टेशन पर उतरते ही वो भीड़ में ढूँढते हैं।
"संभल के" कहना अब आदत हो गई है,
पचास साल बाद भी फ़िक्र नई सी लगती है।
वो टिकट रखती हैं, ये पैसे गिनते हैं,
सफ़र ख़त्म हो, पर हमसफ़र नहीं बदलते हैं।
मैं देखती हूँ उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर,
वो चढ़ नहीं पाते तो ये हाथ बढ़ाती हैं।
प्रसाद में पहला निवाला उसे खिलाती हैं,
दुआ में पहले उसका नाम लगाती हैं।
लोग कहते हैं इश्क़ जवानी में होता है,
मैं कहती हूँ इश्क़ तो बुढ़ापे में पूरा होता है।
कभी वो रूठे तो ये चश्मा साफ़ करती हैं,
कभी ये खाँसे तो वो पानी ले आते हैं।
ना गुलाब, ना तारीफ़, ना वादे बड़े-बड़े,
बस एक-दूजे की दवाई वक़्त पे याद दिलाते हैं।
मुझे पसंद है बुज़ुर्ग जोड़ों को साथ देखना,
क्योंकि उन्होंने सिखाया मोहब्बत उम्र नहीं देखती,
मोहब्बत बस निभाना देखती है।
प्राची गुर्जर…..