मुझे पता है मैं जैसी भी हूँ — अच्छी हूँ।
फिर भी लोग क्या कहते हैं,
उससे मैं खुद को क्यूँ कमतर महसूस करने लगती हूँ?
मैं खुद को सबसे ज़्यादा जानती हूँ,
फिर भी दूसरों की बातें ही
मेरी पहचान तय क्यों कर देती हैं?
क्या सच में किसी और की राय
मेरी असली ‘मैं’ से ज़्यादा मायने रखती है?
✍️ A.Shadow 🖤
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