मैं और मेरे अह्सास
लौटकर नहीं आता
गुजरा हुआ लम्हा लौटकर नहीं आता l
जानेवाला वापिस मुड़कर नहीं आता ll
निगाहों से जाम छलक रहा तब आशिक l
भरी महफ़िल से उठकर नहीं आता ll
नज़रे उठाकर सीना तानकर जीने वाला l
अपने ही घर में छुपकर नहीं आता ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह