नाम: खामोशी में तेरी
तुम पास हो, फिर भी दूर हो,
हर नजर मिलती है, पर हाथ नहीं मिलता।
कदम तेरे मेरे पास आते हैं,
पर राहें अचानक किसी अजनबी की तरह मोड़ लेती हैं।
तुम हंसते हो, और मेरी धड़कनें बढ़ जाती हैं,
शब्दों में कहीं दबा सा,
कोई सवाल उठता है—
क्यों हमारी बातें अधूरी रह जाती हैं?
हवा में तेरी खुशबू आती है,
और मैं खुद को रोकता हूँ,
ना छू लूँ, ना बोल दूँ,
पर दिल की ख्वाहिश, हर पल बढ़ती है।
तेरी आँखों में जो झलक है,
वो कहती है—“आओ।”
और आवाज़ मेरी,
सिर्फ़ खामोशी में फँस जाती है।
हर रात यही सोचता हूँ,
क्या मैं सही समय पर पहुँचूँगा?
या हमेशा इस खामोशी में,
तेरे करीब रहकर दूर ही रह जाऊँगा?