रेगिस्तान की रात फिर से खूंखार हो चुकी थी।
चारों तरफ सन्नाटा था…
लेकिन उस सन्नाटे के बीच जलती आग की लपटें किसी तूफ़ान का संकेत दे रही थीं।
कालसिंह अपने घोड़े के पास खड़ा तलवार साफ कर रहा था।
उसकी आँखों में वही पुराना ज़हर था —
राजाओं के लिए नफरत… और सत्ता की भूख।
पास ही रस्सियों से बंधी बैठी थी मालवणी।
उसके हाथों पर चोट के निशान थे।
चेहरा धूल से भरा हुआ।
लेकिन आँखों में अब भी एक सवाल था—
“मुझे जिंदा क्यों रखा है?”
कालसिंह धीरे-धीरे उसके सामने आया।
“क्योंकि तुम मेरे काम की हो।”
मालवणी ने नफरत से उसकी ओर देखा।
“मैं तुम्हारी मदद कभी नहीं करूँगी।”
कालसिंह हँस पड़ा।
“रेगिस्तान में इंसान अपनी मर्जी से नहीं… मजबूरी से जीता है।”
उसने अपने आदमी को इशारा किया।
एक सैनिक आगे आया और पूंगल का नक्शा जमीन पर फैलाया।
“ये देख…”
कालसिंह की उंगली किले की दीवारों पर घूमी।
“यहाँ हमला होगा।”
मालवणी चौंक गई।
“तुम पूंगल पर हमला करना चाहते हो?”
कालसिंह की आँखें चमक उठीं।
“सिर्फ पूंगल नहीं…”
“नरवरगढ़ भी।”
वो धीरे-धीरे बोला—
“सालों पहले तुम्हारे राजाओं ने मेरे पिता को धोखा दिया था।”
“उसे चोर कहकर मरवा दिया।”
“लेकिन असली गद्दार कौन थे… ये किसी ने नहीं पूछा।”
#ढोला_मारू_की_प्रेम_कहानी
writer bhagwat singhnaruka ✍️