पिता का तराज़ू
बाप की आँखों में वो ख़्वाब नहीं था,
कि बेटी का हाथ किसी नेक इंसान के हाथ में हो,
उसने तराज़ू में जब भी तौला उस लड़के को,
सिर्फ उसकी कोठी, कार और बैंक-बैलेंस का भार था।
चेहरे की बनावट, प्रॉपर्टी के कागजात और नौकरी का रुतबा,
पिता ने बड़ी बारीकी से हर एक चीज़ को परखा,
पर भूल गया वो उस तराज़ू में इंसान को रखना,
भूल गया वो ये देखना कि दिल में उसके कितना है रहम और तड़पना।
पूछा नहीं उसने कभी—"क्या ये इंसान तुझे इज़्ज़त देगा?"
"क्या इसका परिवार तेरे आँसुओं को पोंछने का हौसला रखेगा?"
चकाचौंध के पर्दे में बाप अपनी आँखें मूँद बैठा था,
बेटी की आज़ादी को वो सोने के पिंजरे में बेच बैठा था।
सज गई डोली, चमक उठीं वो महंगी दीवारें,
मगर अंदर खामोश थी रूह, और मायूस थीं वो आँखें,
पैसा तो मिल गया पिता को, पर सुकून का न मिला पता,
क्योंकि रूह की परख के बिना, हर रिश्ता एक अधूरा ख़त सा है।
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