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@chanchal1718


"आजकल के रिश्ते: एक कड़वा सच....
"आजकल के रिश्तों की कड़वी सच्चाई। 📱💔 क्या आप सहमत हैं? कमेंट में बताएं। #ModernRelationships #Sachai #RealTalk #Relationships #DeepThoughts #HindiQuotes "

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क्या शादी के बाजार में 'इंसानियत' का भाव गिर गया है?
जब एक पिता अपनी बेटी के लिए जीवनसाथी तलाशता है, तो उसके मन में सुरक्षा की भावना सबसे ऊपर होती है। लेकिन समय के साथ, इस 'सुरक्षा' की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है। आज एक पिता जब लड़का देखने जाता है, तो उसकी नज़रें सबसे पहले 'प्रॉपर्टी के कागजों' और 'बैंक बैलेंस' को टटोलती हैं।
क्या हमने कभी सोचा है कि एक पिता का तराज़ू इतना संकुचित क्यों हो गया है?
उस तराज़ू में नौकरी का रुतबा है, कार की चमक है और आलीशान घर का आकार है, लेकिन उसमें उस लड़के के 'स्वभाव' का वजन कहीं खो गया है। हम यह तो देख लेते हैं कि लड़का कितना कमाता है, पर यह नहीं देखते कि वह अपनी पत्नी के दुखों को कितना समझता है। हम परिवार की प्रतिष्ठा तो देख लेते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि उस परिवार की सोच कितनी पुरानी और दकियानूसी है।
शादी दो आत्माओं का मिलन माना जाता है, लेकिन आज यह 'सुरक्षित निवेश' (Safe Investment) की तरह हो गई है। पिता को लगता है कि यदि लड़का अमीर है, तो बेटी कभी दुखी नहीं होगी। लेकिन क्या पैसा कभी उस सम्मान की जगह ले सकता है, जो एक इंसान अपने जीवनसाथी को देता है?
अक्सर, चकाचौंध की इस दौड़ में हम 'इंसान' को पीछे छोड़ आते हैं। एक ऐसा लड़का जो शायद आर्थिक रूप से बहुत मजबूत न हो, पर दिल का नेक है—उसे पिता अक्सर नकार देते हैं। वहीं दूसरी ओर, एक ऐसा लड़का जो अहंकार और पैसे में अंधा है, उसे हम अपनी बेटी के लिए 'बेस्ट' समझ बैठते हैं। नतीजा? बेटियाँ बाहर से तो रानी की तरह रहती हैं, लेकिन अंदर से घुट-घुट कर जीती हैं।
समय आ गया है कि पिता अपनी बेटी का हाथ सौंपते समय यह सवाल करना सीखें: "क्या यह इंसान मेरी बेटी को वो सुकून देगा जो उसके मायके की छत के नीचे था?"
पैसा तो कमाया जा सकता है, तरक्की की जा सकती है, पर एक ख़राब इंसान के साथ पूरी उम्र गुजारना, उस बेटी के लिए किसी जेल से कम नहीं है। पिता का असली फ़र्ज़ सिर्फ 'आर्थिक सुरक्षा' देना नहीं, बल्कि 'इंसानी सुरक्षा' सुनिश्चित करना है।
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पिता का तराज़ू
​बाप की आँखों में वो ख़्वाब नहीं था,
कि बेटी का हाथ किसी नेक इंसान के हाथ में हो,
उसने तराज़ू में जब भी तौला उस लड़के को,
सिर्फ उसकी कोठी, कार और बैंक-बैलेंस का भार था।
​चेहरे की बनावट, प्रॉपर्टी के कागजात और नौकरी का रुतबा,
पिता ने बड़ी बारीकी से हर एक चीज़ को परखा,
पर भूल गया वो उस तराज़ू में इंसान को रखना,
भूल गया वो ये देखना कि दिल में उसके कितना है रहम और तड़पना।
​पूछा नहीं उसने कभी—"क्या ये इंसान तुझे इज़्ज़त देगा?"
"क्या इसका परिवार तेरे आँसुओं को पोंछने का हौसला रखेगा?"
चकाचौंध के पर्दे में बाप अपनी आँखें मूँद बैठा था,
बेटी की आज़ादी को वो सोने के पिंजरे में बेच बैठा था।
​सज गई डोली, चमक उठीं वो महंगी दीवारें,
मगर अंदर खामोश थी रूह, और मायूस थीं वो आँखें,
पैसा तो मिल गया पिता को, पर सुकून का न मिला पता,
क्योंकि रूह की परख के बिना, हर रिश्ता एक अधूरा ख़त सा है।
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NariShakti, Swatantrata, Sapne, Motivational

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एक लड़की का आसमान

किताब सी है ज़िंदगी मेरी, जिसे सब पढ़ना तो चाहते हैं,
मगर मेरे अनकहे शब्दों को, कोई समझ ही नहीं पाते हैं।
सुबह मेरी शुरू होती है, घर की अनगिनत जिम्मेदारियों से,
रात कटती है अधूरे सपनों को, तकिये के नीचे दबा कर सोने में।
मैं सिर्फ किसी की बेटी, किसी की बहन या पत्नी नहीं हूँ,
मैं तो वो हूँ, जिसे खुद से ही मिलनी है, मैं वो कहानी नहीं हूँ।
चूल्हे-चौके की दीवारों में, मेरा वजूद सिमट कर रह गया था,
'लोग क्या कहेंगे' के डर में, मेरा खुद का नाम खो गया था।
पर अब ये उड़ान मेरी, किसी बंधन की मोहताज नहीं,
अपने सपनों के लिए जीने की, मुझे किसी की इजाज़त की दरकार नहीं।
अब न रुकुंगी, न झुकूँगी, मैं अब अपनी पहचान बनाऊंगी,
एक लड़की हूँ मैं, अपना खुद का आसमान बनाऊंगी!

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