जिंदगी यूँ ही कतरा-कतरा,
रेत की तरह हाथों से फिसलती जा रही है…
संभल सको तो संभाल लो,
वरना यूँ ही गुजरती जा रही है।
वक़्त भी कितना बचा है,
जो यूँ ही खाली बैठकर बिताए जा रहे हो…
कभी तो पास आओ,
देखो—हम यहाँ तन्हा बैठे हैं।
पता नहीं क्यों खफ़ा हो,
क्या कोई गिला है हमसे…
अगर शिकायत है, तो कह क्यों नहीं देते,
क्या पता हम ही तुम्हारी राह देख रहे हों।
खैर छोड़ो…
तुम भी बेवफ़ा ही निकले, सबकी तरह।
अब तुमसे क्या गिला करें,
जब हम खुद ही एक शिकवा बन गए हैं।
- Manvika Shveta