“क़ीमत”
बेटी पैदा होते ही
घाटे का सौदा मान ली जाती है।
पापा के सपने
EMI में बदल जाते हैं,
माँ की चुप्पी
सौदे की रसीद बन जाती है।
लड़की नहीं पूछी जाती,
बस सामान गिना जाता है
सोफ़ा, सोना, नक़द…
और बीच में
एक ज़िंदा इंसान।
वो जली
तो कहा गया किस्मत थी,
वो चुप रही
तो कहा गया संस्कार।
समाज हाथ मलता है,
आँख नहीं मिलाता,
और अगले घर की बेटी के लिए
फिर वही माँग दोहराता है।
दहेज आग नहीं है,
ये तो
रोज़ की हत्या है
जिसे हम
रिवाज़ कहकर
घर के अंदर छुपा देते हैं।
प्राची तंवर