घर /फ्लैट
जिंदगी में सब कुछ अपनी मर्जी से नहीं मिलता। फिर भी 'एक घर' की चाहत तो सभी की होती है। पर हाय! ये कैसा मजाक, जिंदगी का, दिल्ली में रहने की चाहत! यह सपना भी पुरा नहीं हो सकता। दिल्ली में जनसंख्या अधिक है, जमीन कम है। आज से दस साल पहले जिसने अपनी जमीन खरीदकर अपना घर बना लिया, बड़ा किस्मतवाला था। आज के समय में तो घर के नाम पर मिलता है एक फ्लैट, उसमें भी बस अन्दर-दीवारें फर्श अपना, अगर वो फ्लैट थर्ड या फोर्थ फ्लोर पर है तो उसमें पहुँचने का रास्ता मतलब जीना शेयरिंग होता है।
जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो कितने गर्व से दोस्तों को बताते थे वो जो बड़ा सा काला चैनल वाला गेट है वो है हमारा घर। कितना बड़ा था हमारा घर, द्वार भी अपना, फर्श भी अपना, जीना भी अपना, आंगन भी अपना। 'आंगन' शब्द आने वाली पीढ़ी के लिए आश्चर्य होगा, इतिहास बन गया होगा।
दो छोटे कमरों का 45 गज का फ्लैट भी चालीस लाख में मिलता है दिल्ली में। 30 गज के जमीन पर चार-चार फ्लोर बने हुए हैं यहाँ और चारों फ्लोर पर अलग-अलग परिवार रहते हैं। प्रथम तल वाले को दूसरे, तीसरे तल निवासी की कोई जानकारी नहीं। पड़ोसी शब्द भी अब सिर्फ शब्दकोश में ही मिलेगा। कहते हैं मुंबई का तो इससे भी बुरा हाल है। एक कमरे को चार-चार अजनबी साझा करते हैं। मजे की बात ये है कि इन चारों से अलग-अलग अपने रूममेट का नाम या जानकारी पूछी जाए तो बता नहीं पाएंगे। ये कैसा समय है? ये आधुनिकता और तरक्की के नाम पर हम कहाँ आ गए? बहुत कुछ पीछे छूट गया है। छूट गया है अपना घर, 'परिवार', पड़ोसी, रिश्तेदार, दोस्त।
घर के नाम पर एक डिब्बा मिलता है मर-मर कर कमाने को, रात को सोने को। कभी-कभी सोच हो जाती आज महानगरीय इंसान की, हैरान हूँ सोचकर क्या जिंदगी है ये? 'घर' शब्द शब्द-शब्द ही रह गया, अर्थ ना जाने कहाँ खो गया। सब भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं जिंदगी की दौड़ में, एक अच्छी सुविधाजनक जिंदगी जीने के लिए। पर क्या ये जी रहे हैं ना उन्हें सुबह का पता, ना शाम का एहसास। आगे कौन-पीछे कौन, कुछ नहीं खबर बस दौड़ रहे, ना मंजिल का पता, ना रास्तों का, बस दौड़ रहे हैं।
पहले घरों की नेमप्लेट पर लिखा होता था - 'उपाध्याय निवास', 'शर्मा निवास', 'वर्मा हाउस', 'लक्ष्मी निवास' आदि-आदि। आज नेमप्लेट नम्बर प्लेट में बदल गई। एक ही बिल्डिंग में पाँच-पाँच परिवार रहते हैं यहाँ दिल्ली में, मुंबई में तो शायद हजारों परिवार एक ही बिल्डिंग में रहते हैं। यहाँ किसी इंसान का ठिकाना कमरा नम्बर या फ्लैट नम्बर हो गया है।
जिस बिल्डिंग में मैं रहती हूँ थर्ड फ्लोर पर, उसी के फोर्थ फ्लोर पर तीन प्राणियों की एक फैमिली रहती है। पति-पत्नी और उनका बेटा। तीनों ही दिनभर घर से बाहर रहते हैं। माफ कीजिए घर नहीं फ्लैट। पति सुबह आठ बजे घर से ऑफिस के लिए निकलता है, देर रात्रि 12-1 बजे पहुँचता है, कभी खाना खाता है, कभी नहीं खाता। थका-हारा सो जाता है अगली सुबह ऑफिस पहुँचने के लिए। महीने के दो लाख कमाता है पर समय नहीं है पलभर ठहरने के लिए। पत्नी भी ऑफिस जाती है आठ बजे और देर रात घर आती है आठ बजे तक। बच्चा 8 बजे प्रातः स्कूल जाता है वो भी स्कूल और ट्यूशन व स्पोर्ट्स से फ्री होकर शाम 8 बजे घर पहुँचता है। सिर्फ रविवार को तीनों मिलते हैं एक साथ। उसमें भी एक दूसरे के लिए समय कम ही होता है। कभी मूवी चले गए, मॉल चले गए या घर में ही सो रहे हैं, नींद पूरी कर रहे हैं। तो पाठकगण आप ही बताइए क्या जिंदगी है ये? यह भागदौड़ किसलिए? क्या पाया हमने और क्या खो रहे हैं, क्या खो गया हमसे। जरूर बताइएगा ये कहाँ आ गए हम चलते-चलते -
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