"ठहरा हुआ पल"
कभी-कभी यूँ ही इंतज़ार अच्छा लगता है,
जैसे शाम को ढलता सूरज सच्चा लगता है।
ना किसी के आने की जल्दी,
ना किसी के जाने का डर।
बस एक ख़ाली कुर्सी,
एक कप चाय, और थोड़ा सा सब्र।
हवा में कोई आहट ढूँढना,
दरवाज़े को यूँ ही तकना।
घड़ी की टिक-टिक सुनना,
और पलकों को धीरे से झपकना।
ये इंतज़ार मोहब्बत का नहीं,
ये तो ख़ुद से मिलने का है।
जो बीत गया उसको शुक्रिया,
जो आएगा उसपे यकीन रखने का है।
कभी-कभी रुक जाना भी ज़रूरी है,
भागती दुनिया में ठहरना ज़रूरी है।
इंतज़ार सज़ा नहीं होता हमेशा,
कभी-कभी ये दुआ सा लगता है।
प्राची गुर्जर…..