वो कोई चौबीस–पच्चीस वर्ष की खूबसूरत सी लड़की दिखाई पड़ रही थी। तीखे नाक–नक्श और पथरायी हुई आँखें… जिनके कोरों से बहती अश्रुधारा उसके जीवित होने का प्रमाण दे रही थी। वो घर के बाहर दरवाजे की चौखट से सटी खड़ी थी और अपलक उस आँगन को निहार रही थी, जहाँ उसके घर के किसी सदस्य की अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी। पूरे घर में मातम पसरा हुआ था और हर ओर से जोर–जोर से रोने की आवाजें उठ रही थीं। मेरे कदम यह दृश्य देखकर सहसा ठिठक गए। अनायास ही मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनने चला गया। ठीक सामने वाली लाइन में एक परचून की दुकान थी, जहाँ जाकर मैं रुक गया।
Full Novel
शहीद की विधवा - सीजन 1 - भाग 1
वो कोई चौबीस–पच्चीस वर्ष की खूबसूरत सी लड़की दिखाई पड़ रही थी। तीखे नाक–नक्श और पथरायी हुई आँखें… जिनके से बहती अश्रुधारा उसके जीवित होने का प्रमाण दे रही थी। वो घर के बाहर दरवाजे की चौखट से सटी खड़ी थी और अपलक उस आँगन को निहार रही थी, जहाँ उसके घर के किसी सदस्य की अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी। पूरे घर में मातम पसरा हुआ था और हर ओर से जोर–जोर से रोने की आवाजें उठ रही थीं। ...Read More
शहीद की विधवा - सीजन 1 - भाग 2
सिंह साहब ने मुझसे कहा –“ठीक है बेटा, वैसे भी अब इस पूरे जहाँ में हमारा अपना तो कोई नहीं बचा है। इस क्रियाकर्म को सम्पन्न कराने के लिए किसी न किसी की आवश्यकता तो पड़ेगी ही… और वो तुम ही सही। शायद भगवान की भी यही मर्ज़ी है, तभी तो उन्होंने तुम्हें हमारे पास भेजा है। ”उनकी बातें सुनकर मैंने संयमित होकर उन तीनों को प्रणाम किया और फिर जाकर वहीं बैठ गया। कुछ देर बाद पंडित जी का आगमन हुआ, तब मुझे पता चला कि वे मृतात्मा की शांति के लिए गरुण पुराण का पाठ करने ...Read More