सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था। शहर की यह शाम भी कुछ वैसी ही थी—आधी भागदौड़ में डूबी हुई, आधी थकी हुई। वह कैफ़े के कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। सामने मेज़ पर कॉफी का कप रखा था, जिसमें से उठती भाप जैसे उसकी उलझी हुई सोच को और गहरा कर रही थी। मोबाइल उसकी हथेली में था, लेकिन स्क्रीन देखे बिना ही वह उसे घुमाए जा रही थी। ज़िंदगी बाहर से जितनी सुलझी हुई दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई होती है— सुहानी इसका जीता-जागता उदाहरण थी।
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 1
पार्ट - 1सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था।शहर की यह शाम कुछ वैसी ही थी—आधी भागदौड़ में डूबी हुई, आधी थकी हुई।वह कैफ़े के कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। सामने मेज़ पर कॉफी का कप रखा था, जिसमें से उठती भाप जैसे उसकी उलझी हुई सोच को और गहरा कर रही थी। मोबाइल उसकी हथेली में था, लेकिन स्क्रीन देखे बिना ही वह उसे घुमाए जा रही थी।ज़िंदगी बाहर से जितनी सुलझी हुई दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई होती है—सुहानी इसका जीता-जागता उदाहरण थी।उसी वक्त कैफ़े का ...Read More