सदियों से तुम मेरी

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सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोशिश कर रही हो। उसे फिर वही सपना आया था—घने जंगल, बहता पानी और दूर कहीं चमकती हुई दो सुनहरी आँखें। यह सपना पिछले कई सालों से उसका पीछा कर रहा था, लेकिन हर बार जागते ही उसके टुकड़े धुंधले हो जाते थे।दिव्या ने सिर झटककर खुद को सामान्य किया और बिस्तर से उठ गई।

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सदियों से तुम मेरी - 2

सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोशिश कर रही हो। उसे फिर वही सपना आया था—घने जंगल, बहता पानी और दूर कहीं चमकती हुई दो सुनहरी आँखें। यह सपना पिछले कई सालों से उसका पीछा कर रहा था, लेकिन हर बार जागते ही उसके टुकड़े धुंधले हो जाते थे।दिव्या ने सिर झटककर खुद को सामान्य किया और बिस्तर से उठ गई। उसके कमरे की दीवारों ...Read More

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सदियों से तुम मेरी - 1

घने जंगल के बीचोंबीच फैली वह प्राचीन गुफा आज भी रहस्यों से भरी थी। चट्टानों से रिसता पानी सदियों कहानियों का साक्षी था। उसी गुफा की गहराइयों में, जहाँ सूर्य की किरणें भी प्रवेश करने से डरती थीं, नागलोक का राजमहल स्थित था। उस महल के सिंहासन पर बैठा था नागों का सम्राट — नागार्जुन।नागार्जुन की आँखों में एक अजीब सी खालीपन थी। उसका व्यक्तित्व आज भी उतना ही शक्तिशाली था जितना वर्षों पहले था, पर उसके भीतर का मन जैसे समय में कहीं ठहर गया था। नागलोक के सभी नाग उसकी शक्ति और न्यायप्रियता की प्रशंसा करते थे, ...Read More