एक बड़े मेले के भीड़-भाड़ वाले प्रांगण के भीतर एक विशाल कक्ष सजा हुआ था। वहां बहुत सारे लोग मौजूद थे। सामने, एक सोने-ओसके सिंहासन पर लगभग सोलह–सत्रह वर्ष का एक लड़का बैठा था; जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर। उसकी आँखों में युवावस्था की चमक थी, पर स्वभाव में बादशाहत का गर्व। उसके चारों ओर दरबारी और लोग खड़े थे। सामने बैठे थे मियाँ तानसेन, जिनकी उँगलियाँ वीणा के तारों पर ऐसे फिर रही थीं, मानो हवा भी सुरों में ढल रही हो। ज्यों ही आलाप समाप्त हुआ, पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया। फिर अकबर ने धीरे से ताली बजाते हुए कहा —
Maharana Pratap - Introduction
एक बड़े मेले के भीड़-भाड़ वाले प्रांगण के भीतर एक विशाल कक्ष सजा हुआ था। वहां बहुत सारे लोग थे। सामने, एक सोने-ओसके सिंहासन पर लगभग सोलह–सत्रह वर्ष का एक लड़का बैठा था; जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर। उसकी आँखों में युवावस्था की चमक थी, पर स्वभाव में बादशाहत का गर्व। उसके चारों ओर दरबारी और लोग खड़े थे।सामने बैठे थे मियाँ तानसेन, जिनकी उँगलियाँ वीणा के तारों पर ऐसे फिर रही थीं, मानो हवा भी सुरों में ढल रही हो।ज्यों ही आलाप समाप्त हुआ, पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया।फिर अकबर ने धीरे से ताली बजाते हुए कहा —“वाह… वाह… ...Read More