बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त

(1)
  • 135
  • 0
  • 1.7k

ट्रैक साँस रोके हुए था। सुपरकार वर्ल्ड चैंपियनशिप की आख़िरी रेस—जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। एरीना में मौजूद हज़ारों लोग और अपनी टीवी स्क्रीनों से चिपके करोड़ों दर्शक मन ही मन एक काउंटडाउन कर रहे थे। पिट क्रू दस्ताने कस रहे थे। विज्ञापनों से सजी, चमचमाती, बड़े पहियों वाली रेसकार गाड़ियाँ—जिनके शक्तिशाली इंजन घरघराहट के साथ आग उगलने को तैयार थे। स्टार्ट लाइट्स जल चुकी थीं, पर हरी होने से पहले का वह एक सेकंड—फ्लैग पोस्ट लिए लड़के, चीयर गर्ल्स, दर्शक—सब शांत। सबकी साँसें थम-सी गई थीं।

1

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 1: ऊँचाई

ट्रैक साँस रोके हुए था। सुपरकार वर्ल्ड चैंपियनशिप की आख़िरी रेस—जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। एरीना मौजूद हज़ारों लोग और अपनी टीवी स्क्रीनों से चिपके करोड़ों दर्शक मन ही मन एक काउंटडाउन कर रहे थे। पिट क्रू दस्ताने कस रहे थे। विज्ञापनों से सजी, चमचमाती, बड़े पहियों वाली रेसकार गाड़ियाँ—जिनके शक्तिशाली इंजन घरघराहट के साथ आग उगलने को तैयार थे। स्टार्ट लाइट्स जल चुकी थीं, पर हरी होने से पहले का वह एक सेकंड—फ्लैग पोस्ट लिए लड़के, चीयर गर्ल्स, दर्शक—सब शांत। सबकी साँसें थम-सी गई थीं। टीम इनसैनिटी के चैंपियन रेसर नील वरदराजन ने हेलमेट के ...Read More

2

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 2: डेथ ब्रिज

रेस से दो हफ्ते बाद नील एक इमारत के सबसे ऊपरी माले पर, छज्जे के किनारे पर खड़ा था। शहर फैला था—लाइटों का जाल, कारों की रेंगती हुई रेखाएँ, और बीच-बीच में हवा का सन्नाटा। उसकी आँखों में आँसू थे, चेहरा पसीने से भरा। बाल बिखरे हुए। कोट एक ओर फेंका पड़ा था। टाई ढीली। एक पैर किनारे से आगे निकला हुआ—जैसे शरीर अब दिमाग़ से आगे निकल गया हो। उसने नीचे देखा। और फिर— – दो घंटे पहले पार्टी रोशनी और शोर से भरी थी। ग्लास टकरा रहे थे। कैमरे घूम रहे थे। संगीत इतना ऊँचा कि बातचीत ...Read More

3

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 3: दामिनी

अपने आलिशान पेंटहाउस के बाहर वे दोनों खड़े थे। ऊँची काँच की दीवारों वाली वह इमारत दूर से ही दिखती थी। नीचे फैला हुआ सजा-सँवरा लॉन—क़रीने से कटी झाड़ियाँ, समतल घास, बीच में पत्थर की महँगी कलाकृतियाँ, जिन पर हल्की धूप चमक रही थी। दोनों ओर पतले पानी के फव्वारे लगातार उठते और गिरते, जैसे इस जगह को कभी शोर की ज़रूरत ही न रही हो। संगमरमर की चौड़ी सीढ़ियाँ उस लॉबी तक जाती थीं जहाँ हमेशा हल्की ख़ुशबू तैरती रहती थी। आज वही जगह चुप थी। नील और दामिनी— साधारण कपड़ों में। ऐसे, जैसे किसी और की ज़िंदगी ...Read More

4

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 4: अतीत की परछाईं

नील बिस्तर पर बैठा था। सामने आईना रखा था। चेहरे के लाल धब्बे अब गहरे पड़ चुके थे। बायाँ सूज गया था—इतना कि आँख आधी बंद दिखती थी। त्वचा तनी हुई, असमान। पहचान में न आने वाली। एक हाथ में ड्रिप लगी थी। पारदर्शी द्रव धीरे-धीरे नसों में उतर रहा था। वह आईने में खुद को देख रहा था। जैसे किसी और को देख रहा हो। दरवाज़ा खुला। दामिनी भीतर आई। पेट अब साफ़ दिखता था। वह धीरे-धीरे चल रही थी। नील ने तुरंत आईना उठाकर बिस्तर के किनारे फेंक दिया। काँच की हल्की आवाज़ हुई। वह झुककर अस्पताल ...Read More

5

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 5: प्रतुल मोतवाणी

सुबह के सात बजे। अहमदाबाद के पॉश इलाके में फैला हुआ मोतवाणी हाउस— ऊँची दीवारें। इलेक्ट्रॉनिक गेट। अंदर लंबा गेट तोड़ा नहीं गया था। वह खुला था। अंदर दर्जनों गाड़ियाँ खड़ी थीं। आईटी विभाग। सीबीआई। स्थानीय पुलिस। मुख्य दरवाज़े के भीतर अफ़रा-तफ़री थी। दराज़ खुल रहे थे। फाइलें बाहर आ रही थीं। कंप्यूटर टर्मिनल्स से हार्ड-डिस्क निकाली जा रही थीं। सील। टेप। मोहर। दीवारों पर लगी पेंटिंग्स उतारी जा रही थीं। ऊपर बेडरूम में तकिए फाड़े जा रहे थे। गद्दे चीर दिए गए। नोटों के बंडल बाहर गिरे। लॉकर से हीरे-जवाहरात के केस निकले। “पूरी रिपोर्ट तैयार करो,” किसी ...Read More

6

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - ​अध्याय 6: कहाँ हो तुम

शाम ढल चुकी थी। पाँच सितारा होटल के बाहर रोशनी अभी भी तेज़ थी—काँच के दरवाज़ों से छनकर फुटपाथ आती हुई। वैलेट पार्किंग में गाड़ियाँ रुकतीं, खुलतीं, बंद होतीं। हँसी, परफ़्यूम, महँगे जूते—सब कुछ भीतर जा रहा था। फुटपाथ के किनारे नील बैठा था। घुटनों के बीच गिटार। सामने एक पुराना कटोरा। दाढ़ी काफ़ी बढ़ चुकी थी। बाल बिखरे हुए। चेहरे के निशान हल्के पड़ गए थे—पर थे। बाएँ गाल पर सूजन अब भी अजीब-सी आकृति बनाए हुए थी। आँखों में न शिकायत थी, न उम्मीद—बस एक थकान। वह गिटार बजा रहा था। धीरे। साफ़। कुछ लोग रुकते। कुछ ...Read More