Bis Minit - So Mil - Ek Shart - 6 in Hindi Drama by Varun Vilom books and stories PDF | बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - ​अध्याय 6: कहाँ हो तुम

Featured Books
Categories
Share

बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - ​अध्याय 6: कहाँ हो तुम

शाम ढल चुकी थी।

पाँच सितारा होटल के बाहर रोशनी अभी भी तेज़ थी—काँच के दरवाज़ों से छनकर फुटपाथ तक आती हुई। वैलेट पार्किंग में गाड़ियाँ रुकतीं, खुलतीं, बंद होतीं। हँसी, परफ़्यूम, महँगे जूते—सब कुछ भीतर जा रहा था।

फुटपाथ के किनारे नील बैठा था।

घुटनों के बीच गिटार।

सामने एक पुराना कटोरा।

दाढ़ी काफ़ी बढ़ चुकी थी। बाल बिखरे हुए। चेहरे के निशान हल्के पड़ गए थे—पर थे। बाएँ गाल पर सूजन अब भी अजीब-सी आकृति बनाए हुए थी। आँखों में न शिकायत थी, न उम्मीद—बस एक थकान।

वह गिटार बजा रहा था।

धीरे।

साफ़।

कुछ लोग रुकते।

कुछ सिक्के गिरते।

कुछ बिना देखे आगे बढ़ जाते।

तभी एक काली लग्ज़री कार होटल के सामने आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला।

इंद्राणी उतरी—महँगी ड्रेस, ऊँची एड़ी, वही आत्मविश्वास। उसके साथ एंटोन था। बाल सलीके से जमे हुए, चेहरे पर वही आधी मुस्कान।

इंद्राणी की नज़र अचानक नीचे गई।

वह ठिठकी।

फिर हँसी।

“अरे… देखो तो,” उसने एंटोन से कहा।

“ये तो हमारा चैंपियन है।”

नील ने ऊपर नहीं देखा।

बस बजाता रहा।

इंद्राणी आगे बढ़ी।

कटोरे में नोट फेंका।

“कब से ये नया शौक़ शुरू किया?”

उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था।

“या फिर सब कुछ लुटा के अब यही बचा है?”

नील की उँगलियाँ रुक गईं।

इंद्राणी झुकी।

आवाज़ और नीचे लाई।

“वैसे,” उसने मुस्कराकर कहा, “तेरी वो खूबसूरत बीवी… कहीं किसी कोठे पर तो नहीं बैठा दिया उसे?”

नील एक झटके में खड़ा हुआ।

“चुप रह,” उसकी आवाज़ भारी थी।

एंटोन ने आगे बढ़कर उसे धक्का दे दिया। “Loser.”

नील पीछे गिरा।

सिर पास के लैम्पपोस्ट से टकराया।

एक सूखी-सी आवाज़।

वह वहीं पड़ा रह गया। कराहता हुआ।

इंद्राणी हँसी।

एंटोन भी।

दोनों बिना पीछे देखे अंदर चले गए।

कुछ देर बाद नील उठकर चल रहा था।

एक हाथ में वड़ा पाव। दूसरे कंधे पर झोला।

गिटार पीछे घिसटता हुआ आ रहा था।

सर के पीछे हल्की सूजन, लैम्पपोस्ट की चोट।

वह बेमन से खा रहा था—जैसे पेट नहीं, आदत खा रही हो।

सड़क के मोड़ पर एक इलेक्ट्रॉनिक्स शोरूम था।

शीशे के पीछे दर्जनों फ्लैट स्क्रीन टीवी।

सब पर एक रेस चल रही थी। हवा को चीरती चमकदार गाड़ियाँ।

नील अपने आप रुक गया।

एक पल के लिए।

फिर स्क्रीन बदली।

न्यूज़ शो।

पॉडकास्ट का क्लिप।

स्क्रीन पर मुस्कुराता चेहरा उभरा—प्रतुल मोतवाणी।

नीचे हिंदी में फ्लैश हुआ—

“देश के बेहतरीन कार रेसर्स की तलाश।”

“सौ किलोमीटर। बीस मिनट।”

“बड़ा इनाम। संपर्क करें।”

नील की आँखें टिक गईं।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

“चल बे भिखारी।” शोरूम का गार्ड था।

उसने नील को धकेल दिया।

वड़ा पाव हाथ से गिर गया।

सड़क पर बिखर गया।

“साहब गुस्सा कर रहे हैं,” गार्ड बोला। “ग्राहक डर रहे हैं तुझसे। निकल यहाँ से।”

नील दीवार के सहारे संभला।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस मुड़ते समय—

एक बार फिर स्क्रीन की तरफ़ देखा।

स्क्रीन पर फ़्लैश होता फोन नंबर।

उसने मन ही मन दोहराया।

फिर आगे बढ़ गया।

गिटार पीछे घिसटता रहा।

पर पहली बार—कदमों में थोड़ी दिशा थी।

कई सौ किलोमीटर दूर—मुंबई का मैट्रिक्स अस्पताल

सफ़ेद रोशनी।

भागते क़दम।

एक स्ट्रेचर अस्पताल के गलियारे में तेज़ी से धकेला जा रहा था।

दामिनी उस पर लेटी थी।

पेट पूरा बाहर निकला हुआ।

चेहरा पसीने से भीगा।

साँस टूटी-टूटी।

अंदर तेज़ मरोड़।

“आह—”

उसकी उँगलियाँ चादर को जकड़ लेतीं, फिर ढीली पड़ जातीं।

“नील…”

होंठ हिले।

आवाज़ मुश्किल से निकली।

“नील…”

एक नर्स आगे दौड़ते हुए बोली—

“वॉटर ब्रेक हो चुका है!”

दूसरी ने झुककर देखा—

“डॉक्टर को बुलाओ। प्रीमैच्योर है!”

स्ट्रेचर मुड़ा।

डबल दरवाज़े खुले।

ऑपरेशन थिएटर।

अंदर नर्सें।

डॉक्टर।

मशीनों की तेज़ आवाज़ें।

बाहर—

विश्वजीत सोलंकी रुक गए।

कदम वहीं जम गए।

दरवाज़ा बंद हो गया।

वे अकेले खड़े रह गए।

सफ़ेद दीवार।

ऊपर जलती लाल बत्ती।

उनके हाथ अनायास जुड़ गए।

आँखें ऊपर उठीं—

न प्रार्थना शब्दों में थी,

न आवाज़ में।

बस एक नाम था।

“नील…”

उन्होंने फुसफुसाकर कहा।

“मेरी बच्ची को तुम्हारी ज़रूरत है।”

गलियारे में सन्नाटा उतर आया।

“कहाँ हो तुम?”