Harjana – Part- 10 in Hindi Fiction Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | हर्जाना - भाग 10

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हर्जाना - भाग 10

आयुष्मान ने सुहासिनी का इलाज़ शुरू कर दिया। अपने सीनियर डॉक्टर्स के संपर्क में रहकर वह अच्छे से अच्छी सुविधाओं के साथ सुहासिनी का इलाज़ कर रहा था। उन्हें बचाने के लिए, वह अपनी पूरी जान लगा रहा था। धीरे-धीरे सुहासिनी में होते हुए सुधार को वह महसूस भी कर रहा था।

इसी बीच हर साल की तरह इस साल भी अनाथाश्रम के वार्षिकोत्सव का समय नज़दीक आ रहा था, जिसकी तैयारी बच्चे कर ही रहे थे। इसमें हर वर्ष मुख्य अतिथि के रूप में विजय राज जी को आमंत्रित किया जाता था। गीता मैडम उसके नाम को सभी के सामने उछालने का पक्का मन बना चुकी थीं। इसीलिए इस वर्ष उसकी सारी काली करतूत जानने के बाद भी मुख्य अतिथि के लिए उन्होंने विजय राज को ही बुलाया था। इस साल का यह कार्यक्रम कुछ ख़ास था। इसमें बड़े-बड़े लोगों को आमंत्रित किया गया था। आयुष्मान के साथ के बड़े-बड़े डॉक्टर्स, कुछ राजनेता और कुछ समाज सुधारक आदि। बच्चों ने बड़ी मेहनत से रंगा रंग कार्यक्रम तैयार किए थे। 

आज कार्यक्रम का दिन था। सारे आमंत्रित मेहमान और ख़ुद मुख्य अतिथि विजय राज जी अपने पूरे परिवार के साथ मौजूद थे। विजय राज ने दीप प्रज्वलित करके कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उसके बाद बच्चों के एक-एक करके सभी कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाने लगे। एक से बढ़ कर एक नृत्य और नाटक का आयोजन किया गया था। हर कार्यक्रम के बाद तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज जाता था।

सभी आइटम समाप्त होने के तुरंत बाद गीता मैडम स्टेज पर आईं। उन्होंने सबसे पहले सभी बच्चों के परफॉर्मेंस की तारीफ की। सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "आज मुझे यह बताते हुए बहुत ही ख़ुशी हो रही है कि 25 वर्ष पहले हमारे अनाथाश्रम के प्रांगण में जिस बच्चे को लाकर छोड़ दिया गया था, आज वह बड़ा होकर हमारे इस अनाथाश्रम का पहला डॉक्टर बन गया है।"

यह सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा।

गीता मैडम ने आगे कहा, "इतना ही नहीं उसने अपना पूरा जीवन हमारे इस अनाथाश्रम के ऐसे बच्चे, जिन्हें तिरस्कृत करके या कभी मजबूर होकर छोड़ दिया जाता है उन बच्चों के नाम कर दिया है।"

तालियाँ अब तक हॉल के वातावरण को हर्ष और उल्लास प्रदान कर रही थीं। आयुष्मान अपनी माँ सुहासिनी के साथ सबसे आगे की कतार में बैठा हुआ था। सुहासिनी अपने बेटे की सफलता पर बहुत ख़ुश हो रही थी। विजय राज को सामने शान से बैठा देख कर उसकी आँखों में नफ़रत और क्रोध दोनों का समावेश हो रहा था। विजय राज अपने सम्मान से बहुत ख़ुश था और भाषण देने के लिए आतुर दिख रहा था। उसके सामने बैठी सुहासिनी की याद उसके दिलो-दिमाग में कहाँ अंकित थी। वह तो उस हादसे को कर के कब का भूल चुका था लेकिन सुहासिनी वह कैसे भूल सकती थी।

गीता मैडम ने अपना भाषण आगे जारी रखते हुए कहा, "आज मैं आप सभी के समक्ष डॉक्टर आयुष्मान को बुला कर उसे सम्मानित करना चाहती हूँ। आज हमारे इस हॉल में एक कोई और भी हैं जिसने हमें आयुष्मान जैसा हीरा दिया है। मैं उनका भी सम्मान करना चाहती हूँ। आप में से कोई भी शायद उन्हें नहीं जानता होगा लेकिन इस हॉल में कोई एक ज़रूर विद्यमान है जो उन्हें अच्छी तरह से जानता है और अभी पहचान भी जाएगा। आप सभी अपने हाथों को आपस में एक बार फिर से जोड़ कर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत कीजिए हमारे अनाथाश्रम के पहले डॉक्टर आयुष्मान का। आयुष्मान के साथ ही साथ मैं स्वागत करना चाहती हूँ उनकी माँ सुहासिनी का।"

पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। तभी गीता मैडम की आवाज़ फिर गूँजी, "आओ आयुष्मान आओ, पूरा नाम आयुष्मान विजय राज।"

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः