Manzile - 37 in Hindi Motivational Stories by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 37

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मंजिले - भाग 37

एक सत्य -----

सच मे कही  न कही घटित होती है, जिंदगी की जमात की वो कहानी ---- जो तुम कहना चाहते थे कह चुके थे।

मुड़ कर वो कभी वापिस नहीं आते, चाहे कुछ भी हो। मुस्काना एक अहम भी हो सकता है.... घूलोगे, बहुत घू -लोगे तब तैयार मिलेगा पापा का वो आशेयाना। कितना टूट सकते हो, टूट जाओ, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

मेहरबानिया अक्सर तेरी याद करते है। जो तुम हिसाब किताब मे नहीं जोड़ते थे। देखा है एक ऐसा बंदा जो मेरे अंदर ही था, मै बाहर ढूढ़ता रहता था।

                                                  लिख दिया तो सब्र आया। कि जिंदगी यही खत्म हो गयी उस की, नहीं चली थी, एक क़लम की तरा।

मैंने कुछ कहना था, कह दिया। बहुत ऑप्रेशन हुए थे, दो तो दो बार घुटनो के, चलते जाना उसी का ही काम था। हर चीज जोड़ लेता था, पर समय नहीं जोड़ सका, न शायद रब का कोई शुक्र शायद।

कौन था वो जिसका अब करयाने की दुकान पर अब काटर था। कोई होगा जरूर... जिसके सात भाई भी थे पुराने समय की बात अब नये युग से अलगाव तो नहीं कर सकते। उसके जोड़ से मै अक्सर खुश हुआ था।

बेटा था बात सरदार जी 2025 की कर रहा हूँ, वो खुद तद- रुस्त  था, कितना ही। पेशगी ली हो किसे ने, तो बिना बोले कोई कैसे निकल गया जान निकाल देगा, वो एक पैसा नहीं छोड़े था।

मनहूस वो अक्सर आज की औलाद को अक्सर कह देता था। साभ ती है बाप को, तो हिसाब कयो  पूछती है। जिंदगी से हस कर. लड़ा जंग.... उसका भाई था उपाए के वक़्त उसकी गर्दन ही किसी ट्राली से वजी और उत्तर गयी।

                     ये हादसा कितना भयकर था।

कहानी को लिखते वक़्त कितनी दफा क़लम रुकी होंगी, कयो पता। नहीं। जिंदगी लेखो पर आधारत नहीं, मदारी बन कफ घूमो ये भी मुनासिब नहीं। शैतान की माफिक किसी को डराना ये भी माफिक नहीं। आराम से गुजरे यही जिंदगी है। जोड़, घटाओ, गुना, तकसीम.... यही जिंदगी का मतलब है। यही जिंदगी का असली चेहरा है।

आख़र तक आँखे खुली रखना यही तो शिकारी की पहचान होती है, शिकार की तलाश यही ज़िन्दगी है। तुम उसके लिए बने वो तुम्हारे लिए बना... यही जोड़ यही घटा यही तकसीम है। बेटे की शादी बाप की चाहना होती है... देख लू। उसकी वाइफ दुनिया से कूच कर गयी थी।

उस बेटे की माँ ----- ममता आख़र तक देखी थी उसने। हर फ़र्ज़ पूरा किया था बेटे और बाप ने। कितना टुटा होगा वो शक्श... कितना टुटा होगा ---- 35 साल की उम्र लिए वो नुक्स निकाल रहा है, कारसाज की बनायीं सूरत को। तभी समय हाथ से निकल गया। कब शादी होंगी, कब होंगी औलाद.... बस यही तुम समय मुताबक जीत और हार जाते हो। इसी समय को हाथ से पकड़ पाना तुम्हारी बड़ी मशकत होंगी। पकड़ कर दिखाओ समय को... नहीं पकड़ पाओगे। आख़र तक। कितना भाग सकते हो भागो, आख़र तक। एक दिन तो रुकोगे। यही सत्य है। ये सत्य कहानी मंजिले की सर्व हस्त निबध मात्र है। इसको करीब से देखोगे, अल्फाजो मे ढूढ़ कर तुम्हे एक सत्य लेखनी का अबास होगा पता कयो, ये उतनी सत्य है हम पर जितनी तुम समझ लो।

                        समय एक ऐसा रहस्य है, जिसे जानना बहुत ही मुश्किल है, हर कही हुई बात समय के अंदर टेपरिकार्ड की तरा फिट रहती है.... तुम लम्मी उम्र नहीं... बड़ रहे हो मौत की और को, जो सत्य है।

(चलदा )--------------- नीरज शर्मा