अब आगे............
अधिराज वैदेही को उठाने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसकी सारी कोशिश बेकार हो रही थी तभी उसी नजर वैदेही के पैरों पर पड़ती है जहां सर्प दंश का निशान था , बिना देर किए अधिराज अपने पंखों को फैलाते हुए वैदेही अपनी बाहों में भर कर पंचमढ़ी की तरफ उड़ जाता है...
"अधिराज अधिराज " किसी की घबराई हुई आवाज से अधिराज अपने ख्यालों से बाहर आते हुए कहता है....
" क्या हुआ शशांक..?... तुम इतने घबराए हुए क्यूं हो..?.."
शशांक चिंता भरी आवाज में कहता है..." अधिराज तुम यहां अपने स्मृति में ही वैदेही को पा लोगे क्या..."
" क्या बात है शशांक..?.. तुम चिंतित लग रहें हो , गुप्तचरों से क्या सूचना प्राप्त हुई ..?.."
शशांक थोड़ा गुस्से में कहता है.." तुम जानते हो अधिराज एक बार तुम वैदेही को खो चुके हो , और अब तो उनपर खतरा पहले से भी ज्यादा है और तुम हो की बस स्मृति में ही रहते हो ,कहीं इस बार भी तुम उन्हें न खो दो ..."
अधिराज उसे शांत कराता हुआ कहता है..." नही शशांक, हम अब ऐसा नहीं होने देंगे...इस बार प्रक्षीरोध हमसे हमारी वैदेही को नहीं छिन पाएगा..."
शशांक जोर देते हुए कहता है.." तो फिर जल्दी यहां से इंसानी दुनिया में चलो,, यहां रहना अब हम सबके लिए ठीक लिए नहीं है..प्रक्षिरोक्ष को हमारे यहां रहने की सूचना प्राप्त हो चूकी है..."
अधिराज शशांक की बात से थोड़ा परेशान हो चुका था लेकिन अब उसमें पहले जैसी ताक़त नहीं थी , तीन मणियों के मिल जाने से प्रक्षिरोध बहुत ज्यादा खतरनाक बन चुका था, अब बस उसे तलाश है तो जीवंतमणि की जोकि एकांक्षी के पास है.....
वहीं दूसरी तरफ विक्रम परेशान सा अपने रुम में चहलकदमी करते हुए बार बार फोन को देखते हुए बड़बड़ा रहा था कि तभी उसके फोन की रिंग बजती है जिसे देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है...
उस काॅल को उठाते हुए विक्रम कहता है...." हेलो! एकांक्षी.."
दूसरी तरफ से एक तेज गुस्से की आवाज आती है..." तुझे समझ नहीं आता , कितनी बार कहा है मेरी बहन से दूर रहना..अभी हास्पिटल पहुंचा के चैन मिला है..."
विक्रम धीमी आवाज में कहता है..." नही भाई..."
विक्रम की बात को काटते हुए राघव गुस्से में चिल्लाते हुए कहता है..." मैं तुम्हारा कोई भाई वाई नहीं हूं , मेरी बहन से दूर रहो..." इतना कहते ही राघव झटके से उसकी काॅल कट कर देता है...
विक्रम फोन में से एकांक्षी की फोटो को देखते हुए कहता है..." ऐसा नहीं हो सकता मिस्टर राघव , मैं वैदेही को ओह ! साॅरी एकांक्षी को कभी नहीं छोड़ सकता , एकांक्षी सिर्फ मेरी है , इस बार मैं अधिराज को अपने रास्ते का कांटा नहीं बनने दूंगा , फिर चाहे इसके लिए मुझे स्मृतिका कितनी बार भी प्रयोग क्यूं न करना पड़े , पर वैदेही अब अधिराज की नहीं है..."
" वैदेही अधिराज की है और उसकी ही रहेगी.."
अचानक आई आवाज से विक्रम हैरान रह गया....
" कौन हो तुम...?... सामने आओ..."
विक्रम के चिल्लाते ही एक छोटी तितली अंदर आती है जो थोड़ी ही देर में अपने असली रूप में आ चुकी थी , जिसे देखकर विक्रम दांतों को भिंच के गुस्से में कहता है..." माद्रिका...."
माद्रिका अपने शक को यकीन में बदलते हुए कहती हैं..." मुझे लग ही रहा था तुम कोई साधारण इंसान नहीं हो , हममें से ही कोई हो , अब ये और बता दो तुम आखिर हो कौन..?.."
विक्रम एक शातिराना अंदाज में हंसते हुए कहता है..." तुम तो ऐसे पूछ रही हो , जैसे छोटे बच्चे को लोलीपॉप देकर पूछते बेटा आपका नाम क्या है..."
विक्रम के इस बात से माद्रिका (तानिया) उसे गुस्से में घूरते हुए कहती हैं..." पता तो मैं कर लूंगी, , बस इतना ध्यान रखना , वैदेही केवल अधिराज की है तुम उससे दूर रहो ..."
इतना कहकर माद्रिका वहां से चली जाती है और विक्रम उसे जाते देख हंसते हुए कहता है..." वैदेही किसकी होगी , ये वक्त बताएगा लेकिन मैं तुम्हें अपने रास्ते में नहीं आने दूंगा , तुम जैसी शातिर कीट को नियंत्रित करना मैं अच्छे से जानता हूं..."
उधर अधिराज शशांक से चिंता जाहिर करते हुए कहता है..." शशांक तुम मां को लेकर इंसानी दुनिया में जाओ , हम यहां से अपने विशेष सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा कर आते हैं..."
अधिराज की बात मानकर शशांक राजमाता रत्नावली को लेकर इंसानी दुनिया में पहुंचता है , जहां वो अपने रहने की व्यवस्था करता है....
इधर विक्रम किसी और ही ख्यालों में था....
अपने आप से बातें करते हुए कहता है...." मुझे याद है एकांक्षी जब तुम पंचमढ़ी आई थी...."
फ्लैशबैक.....
वैदेही आज सुबह जल्दी उठकर कहीं जाने के लिए तैयार हो रही थी , जिसे देखकर उसकी मां पूछती है..." आज कहां जा रही हो , इतनी भौंर में , अधिराज तो आज आयेंगे नहीं..."
वैदेही अपनी आंखों में काजल लगाते हुए कहती हैं..." मां ! हमें स्मरण है, तभी तो हम औषधि के लिए पंचमणि जा रहे हैं , जब अधिराज होते हैं , तो वो हमें कहां औषधि के लिए जाने देते हैं और आपको तो पता है, हमारे पास औषधि कितनी कम है..."
" ठीक है ,अपना ध्यान रखना..."
वैदेही अपने आप से कहती हैं..." आप निश्चित रहिए मां, वहां युवराज माणिक है जो हमारी सहायता अवश्य करेंगे..."
वैदेही अपनी मां की आज्ञा से पंचमणि के लिए चल देती है , .......
काफी देर चलने के बाद आखिरकार उसे पंचमणि की सीमा में प्रवेश कर लिया था , ज्यादा चलने की वजह से उसके चेहरे पर थकान साफ देखी जा सकती थी लेकिन अपने काम के प्रति कमी नहीं आने की वजह से उसके अंदर आत्मविश्वास जागृत था.....
वैदेही पंचमणि की सीमा से काफी अंदर आ चुकी थी , अचानक उस सुनसान रास्ते में एक हलचल पैदा हुई ...
वैदेही अचानक हुई पक्षियों की कलरव से थोड़ी परेशान होने लगी तभी एक विशालकाय सांप उसके सामने था , उसे देखकर वैदेही काफी डर चुकी थी, वो विशालकाय सांप उसके पूछता है...." तुम कौन हो...?...और यहां पंचमणि क्यूं आई हो...?..."
वैदेही पहले ही उसके रूप से काफी डर चुकी थी, उसमें भी वो विशालकाय सांप उसके सामने आता जा रहा था ....
वैदेही जोर जोर से चिल्लाते हुए कहती हैं...." हम तो साधारण सी उपचारिका हैं, हमें खाकर तुम्हारा पेट नहीं भरेगा.."
तभी वो विशालकाय सांप अपना रूप बदलता है, जिसे देख वैदेही हैरानी से कहती हैं...."आप.."
..........to be continued........
आखिर कौन है ये विशालकाय सांप..?