महाभारत की कहानी - भाग-२००
भीष्म वर्णित आसक्तित्याग और शुक्र की कथा
प्रस्तावना
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।
संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।
महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।
मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।
अशोक घोष
भीष्म वर्णित आसक्तित्याग और शुक्र की कथा
युधिष्ठिर ने कहा, पितामह, मेरे जैसे राजा कैसे आसक्ति से मुक्त हो सकते हैं, यह बताइए। भीष्म ने कहा, सहि सुख क्या है, स्नेह के वश में मूर्ख लोग समझ नहीं पाते। जब देखेंगे कि पुत्रों ने यौवन प्राप्त कर लिया है और जीविका अर्जन में समर्थ हो गए हैं, तब उनके विवाह कर देंगे और स्वयं सांसारिक बंधन से मुक्त होकर सुख से विचरण करेंगे। पुत्रवात्सल्य वाली वृद्धा स्त्री को भी गृह में रखकर मोक्षलाभ के लिए यत्नशील होंगे। पुत्र हों या न हों, पहले यथाविधि इन्द्रियसुख भोगने के बाद संसार त्याग करके निष्पृह होकर विचरण करेंगे। यदि मोक्षलाभ की इच्छा हो तो मेरे अभाव में परिवार कैसे जीविकानिर्वाह करेगा, ऐसी चिंता न करें। जीव स्वयं उत्पन्न होता है, वर्धित होता है और सुख-दुःख भोगकर अंत में मर जाते है। सभी जीव पूर्वजन्म के कर्म अनुसार विधाता द्वारा नियत भोजन प्राप्त करते हैं। मनुष्य मिट्टी के पिंड के समान और सर्वदा परतंत्र है, उसके लिए स्वजनपोषण की चिंता करना व्यर्थ है। मृत्यु के बाद तुम स्वजनों के सुख-दुःख का कुछ भी जान नहिं सकोगे। तुम्हारे जींदा रहने का समय और तुम्हारे मृत्यु के बाद वे कर्म अनुसार सुख-दुःख भोगेंगे, यह समझकर तुम अपना हित की चेष्टा करो। जो सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समबुद्धि है, जो जानते हैं कि इहलोक में अर्थ दुर्लभ और कष्ट सुलभ है, वही मुक्तिलाभ करते हैं।
युधिष्ठिर ने कहा, पितामह, देवर्षि उशनार ने देवताओं के विपक्ष में रहकर असुरों का हितसाधन क्यों करते थे, उनका शुक्र नाम क्यों हुया, वे आकाश के मध्यदेश में क्यों नहीं जा सकते, इन सबको कहकर मेरी जानकारि करने का ईच्छा को निवारण करें। भीष्म ने कहा, विष्णु ने शुक्र का माता की वध किया था इसलिए शुक्र देवद्वेषी हो गए थे। एक दिन उन्होंने योगबल से कुबेर को बन्दी करके उनका सारे धन हर लिया। कुबेर के अभियोग सुनकर महादेव त्रिशूल से शुक्र को मारने आए तो शुक्र त्रिशूल के अग्रभाग में आश्रय लिया।
महादेव ने शुक्र को पकड़कर मुह में डालकर ग्रास कर लिया। उसके बाद उन्होंने सरोवर के जल में दस कोटि वर्ष तपस्या की, उनके उदर में रहने से शुक्र को भी उन्नतिलाभ हुआ। महादेव जल से उठने पर शुक्र बाहर आने के लिए बार-बार प्रार्थना करने पर आखिर में महादेव ने कहा, तुम मेरे शिश्न से निर्गत हो जाओ। शिश्नपथ से निर्गत होने पर उशनार का नाम शुक्र हो गया और वे आकाश के मध्यस्थल में जाने में असमर्थ हो गए। शुक्र को देखकर महादेव क्रुद्ध होकर उन्हें हत्या करने के लिए त्रिशूल उद्यत किया। तब भगवती ने कहा, शुक्र अब मेरे पुत्र हो गए, तुम्हारे उदर से जो निकला है वह विनष्ट नहीं हो सकता। महादेव ने तब शुक्र को मुक्ति देकर कहा, शुक्र, तुम जहाँ इच्छा हो वहाँ जा सकते हो।
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(धीरे-धीरे)