1957 में ही प्रयाग में साहित्यकारों का एक सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में श्रोता के रूप में मैं उपस्थित था। वहीं मैने महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, शिवदान सिंह चौहान, यशपाल आदि साहित्यकारों को देखा और सुना। हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह बनारस से आए थे। प्रयाग में एक परिमल संस्था थी जिसमें धर्मवीर भारती अधिक सक्रिय थे। नामवर सिंह ने ‘नए साहित्य के मूल्यांकन की समस्याएँ’ प्रकरण पर अपना पर्चा पढ़ा जिसमें उन्होंने लघु प्रस्थिति में लघुमानव के संघर्ष को प्रयास नहीं अप्रयास कह कर उल्लेख किया था। जहाँ अंधा-युग, अंधा-कुआँ और अंधी-गली में भटकने वाली अंधी पीड़ा हो वहाँ बैद्धिकता नहीं अबौद्धिकता के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। धर्मवीर भारती ने एक काव्य-नाटक ‘अंधा-युग’ लिखा था। निश्चित रूप से नामवर सिंह ने यह टिप्पणी परिमल से जुड़े हुए लोगां के लिए की थी। बाहर मैदान में नामवर सिंह और धर्मवीर भारती आपस में नोंकझोंक करते दिखे।
प्रयाग विश्वविद्यालय में उस समय छात्र-संघ व्याख्यान आयोजित करता था। एक व्याख्यान का स्मरण मुझे है जिसमें स्वामी चिन्मयानन्द को बुलाया गया था। गीता पर उनका व्याख्यान सरल अंग्रेजी में अत्यन्त प्रभावपूर्ण था। विश्वविद्यालय के अनेक अध्यापक भी व्याख्यान सुनने के लिए आकर बैठते थे। यह व्याख्यान कई दिनों तक चला और पूरा यूनियन हाल भरा रहता था। 1957 में ही दूसरा आम चुनाव हुआ था। पण्डित जवाहरलाल नेहरु पूरे देश में चुनावी व्याख्यान देते हुए प्रयाग भी आये थे। वे फूलपुर के संसदीय सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी थे। समय निकालकर वे विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान देने के लिए खड़े होते ही बच्चों से पूछा कि हिन्दी में बोलूँ या अंग्रेजी में। बहुत से बच्चों ने हिन्दी के पक्ष में हाथ उठाया। उन्होंने हिन्दी में बोलना शुरू किया। कुछ देर हिन्दी में बोलते हुए वे अंग्रेजी में बोलने लगे। छात्रों पर नेहरु का प्रभाव अधिक था। उनकी अदाएँ तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ना आदि युवाओं को बहुत भाती थीं। व्याख्यान देकर वे फूलपुर में एक सभा करने के लिए निकल गये।
एक दूसरे व्याख्यान का भी स्मरण है जिसे सी.डी. देशमुख ने सीनेट हाल में ही दिया था। वे उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे। शाम को वह व्याख्यान हुआ। उसमें विश्वविद्यालय के अधिकांश अध्यापक उपस्थित थे। मैं भी वाचनालय से निकला था। व्याख्यान की बात सुनकर वहीं रुककर सुनने लगा। कुछ अन्य छात्र भी थे। जाड़े का समय था पर उसमें विज्ञान संकाय के एक प्रोफेसर केवल धोती कुर्ता पहने थे, जबकि अन्य शिक्षक गर्म सूट में थे। हम लोगां के लिए यह आश्चर्य की बात थी। बाद में पता चला कि अवकाश प्राप्ति के बाद उन्होंने संन्यास ले लिया था। मैं 1956 से 58 तक प्रयाग विश्वविद्यालय में रहा। उस समय पूरे विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन का उत्तम परिवेश था। विश्वविद्यालय नियमित खुलता था। बच्चे भी पठन-पाठन में लगे रहते थे। लड़कियाँ भी पढ़ती थीं किन्तु उनकी संख्या लड़कों से कम हुआ करती थी।
विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए मेरे मन में विश्वविद्यालय में अध्यापक बनने की इच्छा जगने लगी। मैं अक्सर देखता था जो बच्चे परास्नातक पहली दूसरी पोजीशन पा जाते थे, प्रायः उन्हें विश्वविद्यालय में ही यदि जगह है तो नियुक्ति मिल जाती। इसलिए बीए की परीक्षा देने के बाद मैं घर आया और जून में ही अपनी व्यवस्था कर प्रयाग चला गया। मैंने अर्थशास्त्र में एम. ए. करने का मन बनाया क्योंकि उसमें सोचने-विचारने की बहुत गुंजाइश थी। जून में ही पढ़ाई शुरू कर दी। दिलकुशा पार्क के पास एक बिल्डिंग में एक कमरा किराए पर लिया और पढ़ने लगा। विश्वविद्यालय के खुलने के समय तक मैं पाठ्यक्रम का काफी अंश पढ़ चुका था। आठ दस घंटे मैं रोज पढ़ाई में लगाता, बनाता खाता और सो जाता। एम.ए. भाग एक में प्रवेश लेकर कक्षा के अतिरिक्त वाचनालय में ही बैठकर पढ़ता। पर यह पढ़ाई बहुत दिनों तक नहीं चल सकी। नवम्बर आते आते सिर भारी रहने लगा। हल्का बुखार भी रहता।
अन्ततः 7 नवम्बर 1958 को मुझे विश्वविद्यालय छोड़कर घर आ जाना पड़ा। फिर विश्वविद्यालय जाना नहीं हो सका। गोण्डा आकर जिला अस्पताल में अपने को दिखाया। हल्के बुखार के कारण तपेदिक का सन्देह करके फेफड़ों का एक्सरे हुआ उसमें लंग्स क्लीयर आया। डॉक्टर दवा देते रहे लेकिन कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ। पिताजी ने विक्रम सिंह वैद्य को भी दिखाया। थॉमसन कॉलेज के भूतपूर्व भूगोल प्रवक्ता इल्तेफात अहमद अपने घर पर सुबह-शाम डिशेन की दवाएँ देते थे। वे मेरे अध्यापक भी रहे। एक दिन मैं उनके पास गया, अपनी बात बताई। उन्होंने डिसेन की पेट साफ करने की दवा दी। उसका प्रयोग करते ही तापक्रम सामान्य हो गया और सिर का भारीपन भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। यह सब होते होते जनवरी बीत रही थी। विश्वविद्यालय छूटा तो फिर छूट ही गया। फरवरी से जून तक घर पर रहते हुए मैंने खेती में काफी मेहनत की। पर गाँव के लोग कहते थे कि खेती भैया हम लोगां को करने दो, आप बाहर से पैसा कमा कर लाओ तो हम लोग खेती और अच्छी कर लेंगे।
प्रश्न-विश्वविद्यालय छूटने के बाद आपने क्या किया? अध्यापन के क्षेत्र में कैसे आ गए?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- जुलाई 1959 में जब कॉलेज खुले तो मै बाबू श्याम जी श्रीवास्तव से मिलने गया। वे उस समय कन्हैयालाल इण्टर कालेज में प्रिंसिपल हो गये थे और कॉलेज परिसर में ही रहते थे। वे थॉमसन कालेज में मेरे अध्यापक रहे और मेरा उनके घर आना-जाना था। मेरी स्थिति को जानकर उन्होने कहा कि कालेज में जेटीसी ग्रेड में एक पद रिक्त है। तुम यहीं पर आ जाओ। यहाँ पढ़ाते हुए तुम्हारा स्वास्थ्य भी सुधर जाएगा। उस समय जेटीसी का ग्रेड था- साठ-चार-सौ रुपये। मैं केवल बी0ए0 था। अप्रशिक्षित होने के कारण मुझे साठ रुपये के दो तिहाई चालीस रुपये और मंहगाई भत्ता मिलकर पचपन रुपये प्रतिमाह मिलते रहे। कालेज भवन के ऊपर ही चार कमरे बने हुए थे जिसमें अध्यापक रहते थे। दो कमरों में बाबू मथुरा सिंह और केदारनाथ पाण्डेय रहते थे। उन्हीं के साथ मुझे समायोजित किया गया। कमरों का किराया नहीं देना था। केवल भोजन की ही व्यवस्था करनी थी। चाय केवल केदारनाथ पाण्डेय पीते थे जिसे वे बाहर से मँगा लिया करते थे। हम लोग जलपान की कोई अलग से व्यवस्था नहीं करते थे। कभी-कभार मक्का आदि भुनवा लिया जाता लेकिन वह भी हमेशा नहीं। गोपाल चपरासी भोजन बनाने का काम कर दिया करते थे। पूरे एक वर्ष मैंने मनोयोग से पढ़ाया। उसी वर्ष अध्यापकों के ग्रेड पुनरीक्षित कर दिए गए। श्यामजी साहब ने सुझाव दिया यदि शिक्षा विभाग में काम करना है तो प्रशिक्षण आवश्यक है। मैंने भी सोचा कि अगले वर्ष प्रशिक्षण प्राप्त करने का प्रयास किया जाए।
मैंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में बीएड प्रशिक्षण के लिए आवेदन किया। उस समय अंकों के आधार पर बी0एड0 में प्रवेश मिल जाता था। पर पहली सूची में जब मेरा नाम नहीं आया तो मुझे चिन्ता हुई। मैं पता लगाने गोरखपुर गया। श्यामजी साहब के भाई के दामाद को साथ लेकर मैं प्रोफेसर मनमोहन वर्मा से मिला। वे महादेवी वर्मा के भाई थे। उन्होंने पूछा कि आपने आवेदन किया था इसका क्या सबूत है। मैंने रजिस्ट्री रसीद दिखाई, तो उन्होंने कहा कि कुछ फार्म गुम हो गये हैं। मेरे अंको को देखकर मुझे एक फार्म दिया। मैंने भरकर जमा किया और मेरा प्रवेश हो गया। एक वर्ष मैंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से ही बीएड का प्रशिक्षण प्राप्त किया। केदारनाथ पाण्डेय जी के पड़ोस के एक पंडित जी लोकोशेड में काम करते थे। उन्हें एक कमरे और बरामदे वाला रेलवे क्वार्टर मिला हुआ था जिसमें वे अकेले रहते थे। पाण्डेय जी ने उन्हीं के साथ मेरे रहने की व्यवस्था करा दी। राशन वगैरह घर से ले जाता रहा। इसीलिए कम पैसे में यह प्रशिक्षण सम्भव हो पाया। लेकिन इसके लिए भी मुझे पाण्डेय जी और मथुरा सिंह जी से थोड़ी मदद लेनी पड़ी जिसे मैंने बाद में चुकाया। उस समय गोरखपुर के शिक्षा विभाग में काफी लोग थे। वहाँ हम लोगां का अध्यापन का प्रयोगात्मक कार्य महाराणा प्रताप इण्टर कालेज में हुआ करता था। वहाँ बी0एड0 प्रशिक्षणार्थी हर साल पढ़ाते थे।
इसीलिए नए लोग जब पढ़ाने जाते तो बच्चे प्रायः उनकी परीक्षा लेने के लिए कुछ न कुछ करते। मैं जब पहली बार पढ़ाने गया तो मेरे कक्षा में प्रवेश करते ही सभी बच्चे खड़े हो गए पर बैठे नहीं। मैंने पूछा- क्या बात है? एक बच्चे ने कहा कि सीट बहुत गंदी है। मैंने जैसे ही अपनी रुमाल निकाल कर साफ करने की कोशिश की वैसे ही सब बच्चे बैठ गये। मैंने अपना पाठ पढ़ाना शुरू किया और दो चार दिन में ही बच्चे इतने प्रभावित हुए कि फिर कोई समस्या नहीं खड़ी की और सहयोग करते रहे। उस समय बी0एन0 झा गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। दीक्षान्त समारोह प्रायः प्रतिवर्ष हो जाया करता था। उस वर्ष के दीक्षान्त समारोह में राधा कृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए थे। केन्द्रीय सरकार में मंत्री रहीं लक्ष्मी एन0 मेनन भी दीक्षान्त समारोह में आयी थीं। दोनों ने अंग्रेजी में प्रभावी व्याख्यान दिया था जिससे सभी लोग प्रभावित हुए थे।
बीएड का प्रशिक्षण पूरा हो जाने के बाद जुलाई में मैं फिर कॉलेज गया। श्याम जी साहब मेरी नियुक्ति एलटी ग्रेड में करना चाहते थे किन्तु एलटी ग्रेड के लिए मैनेजर के पास जिलाधिकारी की सिफारिश थी। इस कारण मेरी नियुक्ति एलटी ग्रेड में नहीं हुई। श्यामजी साहब ने मेरी नियुक्ति सी0टी0 ग्रेड में की और मैं सत्र 1961-62 में सीटी ग्रेड में कन्हैयालाल इण्टर कालेज में ही काम करता रहा। उसी वर्ष तीसरा आम चुनाव हुआ था। कालेज के हिन्दी प्रवक्ता केदारनाथ पाण्डेय स्वतन्त्र पार्टी के टिकट से विधायकी का चुनाव लड़ गए। हम और बाबू मथुरा सिंह दोनों उनके चुनाव में सहयोग करते रहे। क्षेत्र के प्रभावी व्यक्तियों में मुरली मुनीम, श्रीराम सिंह तथा उनके साथी पाण्डेय जी का सहयोग कर रहे थे। कांग्रेस पार्टी से शांतिचन्द्र शुक्ल मैदान में थे। चुनाव में कांग्रेस व स्वतन्त्र पार्टी के बीच में ही टक्कर थी। केदारनाथ पाण्डेय बहुत थोड़े ही वोटो से चुनाव हार गए। कन्हैयालाल इण्टर कॉलेज के प्रबन्धक के एक कर्मचारी शांतिचन्द्र शुक्ल का प्रचार कर रहे थे। उन्हें मेरा केदारनाथ पाण्डेय का सहयोग करना अच्छा नहीं लगा। मैं कालेज में नया ही था। उन लोगों को लगा कि यह नया अध्यापक जिस साहस के साथ पाण्डेय जी का सहयोग कर रहा है, आगे चलकर यह कभी दबकर नहीं रहेगा। प्राचार्य श्यामजी श्रीवास्तव ने मुझे सारी स्थिति बताई। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं स्वयं ही इस विद्यालय में रहना पसन्द नहीं करूँगा। मैंने टॉमसन कालेज में भी आवेदन किया था और उम्मीद कर रहा था कि मेरी नियुक्ति हो जाएगी। बड़े बाबू से भेंट हुई तो उन्होंने कहा कि आश्वस्त होने की कोई जरूरत नहीं है। बड़े बड़े दार्शनिकों को कोई नहीं पूछता है। टॉमसन कालेज में भी एलटी ग्रेड में मेरी नियुक्ति नहीं हुई पर प्राचार्य आर पी श्रीवास्तव ने मुझसे कहा कि यदि सीटी ग्रेड में काम करना चाहो तो मैं नियुक्त कर दूँ। मैंने उनसे कहा कि मैं कल आपको इसका उत्तर दूँगा। मुझे अन्यत्र एलटी ग्रेड में नियुक्ति मिल रही थी पर घर वालों की राय थी कि टॉमसन कॉलेज घर के निकट है। यहाँ यदि नियुक्ति मिल रही है तो कार्यभार ग्रहण कर लेना ही ठीक रहेगा। फिर आगे देखा जाएगा।
मैंने टॉमसन कॉलेज के प्राचार्य को सूचित कर दिया और 9 जुलाई, 1962 को कार्यभार ग्रहण कर लिया। मुझे कक्षा ग्यारह, दस और नौ में पढ़ाने को दिया गया। मेरी रुचि साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विशेष थी। इसीलिए प्राचार्य जी ने अन्त्याक्षरी और निर्धन छात्र-कोश वितरण का प्रभारी बना दिया। जिन बच्चों को शुल्क मुक्ति नहीं मिलती थी वे प्रायः निर्धन छात्र-कोश से सहायता के लिए आवेदन करते थे। यह सहायता आधे शुल्क के बराबर दी जाती थी।
मेरे निर्देशन में बच्चों ने जिले में पुरस्कार जीता। 1964 में ही आरपी श्रीवास्तव साहब ने अवकाश ग्रहण किया। तीन महीने के लिए बाबू जेपी श्रीवास्तव प्रभारी प्राचार्य बनाए गए। इसी बीच प्राचार्य पद के लिए चयन भी हुआ और उसमें करनैलगंज के प्राचार्य श्यामजी श्रीवास्तव टॉमसन कॉलेज के प्राचार्य के पद पर चुने गए। उन्होंने जनवरी 1965 में टॉमसन कॉलेज के प्राचार्य का कार्यभार ग्रहण कर लिया। उन्होंने मुझे परीक्षा से भी सम्बद्व कर दिया। उन्हीं के कार्यकाल में मुझे एलटी ग्रेड में नियुक्ति मिली। बाद में उन्होंने मेरे जिम्मे हास्टल तथा प्राइमरी का कार्यभार भी दे दिया। यद्यपि मैं हास्टल में रह नहीं पाता था पर बच्चों की देखभाल पूरी सतर्कता से करता था। प्राइमरी की देखभाल के लिए मुझे सुबह सात बजे ही कॉलेज पहुँचना पड़ता था और चार बजे के बाद ही छुट्टी मिल पाती थी। मेरे दो छोटे भाई भी टॉमसन कॉलेज में पढ़ते थे और वे प्रायः दोपहर के लिए रोटी सब्जी ले आते थे। कभी कभी उसके साथ छाछ भी आ जाता था। इसी बीच बाबू मथुरा सिंह जो कर्नलगंज इण्टर कॉलेज में पढ़ा रहे थे, ने भूगोल में परास्नातक करने का मन बनाया।
उन्होंने मुझसे आकर कहा- यदि आप भी फार्म भर दे, तो आपके साथ तैयारी करने में आसानी होगी। उनके यहाँ भूगोल प्रवक्ता का पद रिक्त हो गया था। मैंने भी उन्हीं के साथ फार्म भर दिया। उस समय तक भूगोल में भी व्यक्तिगत विद्यार्थियों को परास्नातक में प्रवेश मिल जाता था। इसके लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय कुछ दिनों के लिए प्रयोगात्मक प्रशिक्षण के लिए बुलाता था। उस समय प्रो. बोस भूगोल विभाग के अध्यक्ष थे। विभाग में अध्यापकों की संख्या अधिक नहीं थी। लेकिन जो थे वे मेहनत करके पूरा काम करते थे। विश्वविद्यालय के बुलाने पर हम लोग प्रयोगात्मक प्रशिक्षण के लिए गए और कार्य पूरा किया। भूगोल में भी मैंने काफी अच्छी पुस्तकें पहले पढ़ रखी थीं। इस बार भी मैंने यथासंभव तैयारी किया। इसीलिए एम.ए. भाग एक में मुझे काफी अच्छे अंक मिले। इससे विभाग के बच्चों में सुगबुगाहट हुई कि यदि प्राइवेट बच्चे टाप करेंगे तो हम लोग क्या करेंगे। बच्चों की यह चिन्ता अनायास नहीं थी। एक दो विभाग में अध्यापक अभ्यर्थियों ने टाप किया था। मैं अपने ढंग से काम करता रहा। दूसरे वर्ष भी प्रयोगात्मक कार्य पूरा किया, परीक्षा दी। जब परिणाम आया तो मुझे द्वितीय श्रेणी मिली थी और दो प्रश्नपत्रों में 36, 38 अंक दे दिए गए थे। प्रयोगात्मक परीक्षा में औसत अंक दिए गए। इससे मुझे लगा कि संस्थागत छात्रों की चिंता ने आंतरिक परीक्षकों को अवश्य प्रभावित किया होगा। इस पर कोई भी टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। मैं अपने ढंग से काम करता रहा और टॉमसन कॉलेज की बढ़ोत्तरी के लिए जो भी संभव हो पाता करने की कोशिश करता।