बाबा भाग 1
लेखक राज फुलवरे
विट्ठल पाटिल अब उम्र के उस पड़ाव पर आ चुके थे, जहाँ शरीर धीमा हो जाता है पर मन अब भी पुरानी तरह सजग रहता है। गाँव के बाहर बने छोटे से घर में रहते हुए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खेत, मेहनत और परिवार के लिए लगा दी थी।
उनका बेटा, शाम, अब शादी के लायक हो चुका था। विट्ठल जी के चेहरे पर एक संतोष था—
“चलो, अब मेरी जिम्मेदारी पूरी होने वाली है। बेटे का घर बस जाएगा।”
शादी की खुशबू
गाँव में खूब धूमधाम से शादी हुई। ढोल-ताशे, रंग, रिश्तेदारों की भीड़—सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा था। दुल्हन मीरा, खूब तेज-तर्रार और सुंदर लड़की थी।
शादी के कुछ दिन बाद शाम और मीरा घर में रमने लगे। शुरू-शुरू में सब अच्छा था—हंसी-मजाक, रात के किनारे चाय पीते हुए बातें, मीरा का विट्ठल जी को "बाबा" कहकर खाना परोसना।
पर धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा।
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मीरा के इरादे
एक रात कमरे में बैठते हुए मीरा ने शाम से कहा—
मीरा:
“देखो शाम, तुम्हारे पिता के नाम पर इतनी जमीन है, घर है, और पैसा भी। अगर ये सब हमारे नाम हो जाए ना… तो जिंदगी सेट हो जाएगी।”
शाम (थोड़ा हैरान):
“पर मीरा… बाबा ने सब कुछ मेहनत से बनाया है। और क्या ज़रूरत है अभी इन बातों की?”
मीरा (हंसते हुए):
“तुम बहुत भोले हो शाम। अरे, शादी हो गई है। अब जिम्मेदारियां तुम्हारी हैं। कल को अगर उनके दिमाग में कुछ और आ गया, तो? एक काम करो… बाबा से हस्ताक्षर करवा लो किसी कागज़ पर। बस इतना।”
शाम अंदर से असहज था, पर पत्नी के मोह में बह गया।
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धोखा
एक दोपहर, जब विट्ठल पाटिल दालान में बीड़ी पी रहे थे, शाम ने कागज़ लेकर कहा—
शाम:
“बाबा… पंचायत ऑफिस का एक फॉर्म है। जरा यहां हस्ताक्षर कर दोगे?”
विट्ठल पाटिल (मुस्कुराते हुए):
“अरे हां-हां बेटा। कर दे… तू अब बड़े काम करता है। अपने बाप से क्या छुपाना।”
वह बिना पढ़े, बेटे पर भरोसा करते हुए हस्ताक्षर कर देते हैं।
उन्होंने सोचा भी न था कि उसी दिन वह अपनी सारी जायदाद अपने ही हाथों सौंप रहे हैं… अपने बेटे को नहीं, बल्कि बहू के लालच को।
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टूटा हुआ रिश्ता
कुछ हफ्ते बाद रात को अचानक बहस छिड़ गई।
मीरा ने गुस्से में घर के बर्तन पटक दिए।
मीरा:
“तुम्हारे पिता बहुत दखल देते हैं। घर मेरा है, मैं जैसा चाहूं वैसा चलाऊँ! हर बात में टांग अड़ाते हैं!”
विट्ठल (हैरान):
“अरे मीरा बहू, मैंने क्या किया? मैं तो चुपचाप ही रहता हूँ…”
पर शाम ने भी आवाज उठाई—
शाम:
“हमारे घर में दखल मत दो बाबा! आप जो थे… अब नहीं हो। इस घर में अब आपका कोई अधिकार नहीं।”
विट्ठल पाटिल:
“क्या बोलता है तू शाम? ये घर… ये जमीन… ये सब तो मैंने—”
शाम (कागज़ दिखाते हुए):
“अब ये घर हमारा है। आपने कागजों पर खुद हस्ताक्षर किए हैं। आप ही ने हमें दिया है। अब कृपया… हमारे घर से निकल जाइए।”
उस उम्रदराज आदमी के पैर कांप गए।
विट्ठल:
“बेटा… इतना बड़ा फैसला? मुझे घर से निकाल देगा?”
मीरा:
“दरवाज़ा उधर है… जाइए।”
और विट्ठल पाटिल, जिनकी आँखों में बेटे का बचपन अभी भी जिंदा था, चुपचाप बाहर निकल आए।
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बाबा का अकेलापन
रात के अंधेरे में, हाथ में एक छोटा झोला, बदन पर फटा कुरता… विट्ठल पाटिल मंदिर की तरफ चल पड़े।
मंदिर के सामने बैठकर उन्होंने भगवान से कहा—
विट्ठल:
“हे विठोबा… शाम को पालने में मेरी कमी कहाँ रह गई? उसे अच्छा खाना दिया… अच्छे कपड़े… प्यार दिया… फिर कहाँ गलती हो गई भगवान?”
उनके गालों पर आंसू बह रहे थे।
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ढूँढ़ते हुए सम्मान
अगले दिन वह बाजार में जा पहुँचे। एक दुकान पर जाकर बोले—
विट्ठल:
“मालिक… कोई छोटा-मोटा काम दे दोगे? कुछ तो कमाना है।”
दुकानदार ने ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा—
दुकानदार:
“चलो, ये लकड़ी की गाड़ी है। इसे धकेलकर सामान ले जाओ। थोड़ा पैसा दूँगा।”
विट्ठल ने सिर हिलाया।
गाड़ी भारी थी, उम्र भी साथ नहीं दे रही थी, पर पेट और सम्मान दोनों भूखे थे।
उन्होंने शहर के कोने-कोने तक सामान पहुँचाया। शाम तक थककर चूर हो गए।
जब पैसे लेने गए तो मालिक ने कुछ सिक्के उनके हाथ में फेंक दिए।
विट्ठल (गिनते हुए):
“मालिक… यह पैसा कम है।”
दुकानदार:
“अरे बुजुर्ग! जितना दिया है ले और निकल। ज्यादा बोलेगा तो अभी धक्का मार के निकाल दूँगा।”
और उसने सच में उन्हें धक्का दे दिया।
विट्ठल पाटिल सड़क पर गिर पड़े… और पास बैठी एक गाय उन्हें देखती रह गई, जैसे बेचैन मन को देखकर दुखी हो हो गई हो।
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राहुल—एक दोस्त का सहारा
वहीं सामने से उनका पुराना दोस्त, राहुल, आता है।
राहुल:
“अरे विट्ठल! ये क्या हालत बना ली? क्या हुआ रे दोस्त?”
विट्ठल (आँखें पोंछते हुए):
“कुछ नहीं रे… दुनिया बदल गई है। बेटा भी बदल गया।”
राहुल के आँखों में गुस्सा और दुख दोनों।
राहुल:
“चल, पहले खाना खा। कुछ लेकर आया हूँ।”
राहुल रोज उन्हें खाना लाकर देता, पर विट्ठल खाना छूते भी नहीं।
राहुल (डांटते हुए):
“ऐसा क्यों करता है? खाना खा ले, नहीं तो बीमार पड़ जाएगा।”
विट्ठल:
“राहुल… कौर गले में अटक जाता है। बेटे का धोखा खाने के बाद भूख लगती ही नहीं।”
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शाम का जागना
घर में, मीरा और शाम खूब खुश थे। पर एक दिन शाम बैठे-बैठे अचानक अपने बचपन में खो गया।
कैसे उसके बाबा उसे साइकिल पर स्कूल छोड़ने ले जाते थे…
कैसे बारिश में भीगकर उसे छाता पकड़ाते थे…
कैसे बीमार होने पर रात भर जागते थे…
उसके हाथ कांप गए। दिल बैठ गया।
शाम (धीमी आवाज में):
“मैंने क्या कर दिया? मैंने बाबा को क्यों निकाला?”
मीरा ने उसे रोकने की कोशिश की—
मीरा:
“अब पछतावा करके क्या होगा? छोड़ो ये सब।”
पर इस बार शाम ने उसकी बात नहीं मानी।
शाम:
“नहीं मीरा… मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी।”
वह उठ खड़ा हुआ।
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बेटे की तलाश
अगले दिन शाम और मीरा दोनों बाबा को ढूंढने निकल पड़े।
मंदिर गए—नहीं मिले।
नदी किनारे गए—नहीं मिले।
पुराने बरगद के पेड़ के नीचे गए—वहाँ एक कंबल पड़ा था, पर बाबा नहीं।
आखिरकार, शाम की नज़र दूर बैठे एक बूढ़े पर पड़ी…
वह विट्ठल पाटिल थे—सड़क किनारे, सूरज ढलते हुए, कितने थके हुए।
शाम (दौड़ते हुए):
“बाबा!!! बाबा!!!”
विट्ठल चौंक गए।
विट्ठल:
“शाम… तू? यहाँ क्यों आया है?”
शाम उनके पैरों पर गिर पड़ा।
शाम (रोते हुए):
“बाबा… मैं बहुत गलत था। मुझे माफ कर दो। तुमने मुझे सब दिया… पर मैं तुम्हारा नहीं बन पाया।”
मीरा भी आगे आई—
मीरा:
“बाबा… मैं भी दोषी हूँ। लालच में अंधी हो गई थी। माफ कर दीजिए।”
विट्ठल पाटिल की आँखों में आँसू आए।
विट्ठल (आँखें उठा कर):
“बेटा, गुस्सा तो बहुत है अंदर… दुख भी बहुत है। पर… तुम मेरे बच्चे हो। और बाप का दिल इतना छोटा नहीं होता।”
उन्होंने धीरे से शाम के सिर पर हाथ रखा।
विट्ठल:
“चलो… घर चलें।”
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घर वापसी
जब विट्ठल जी वापस घर लौटे, तो पड़ोसी, रिश्तेदार, सब खड़े थे।
किसी ने गले लगाया, किसी ने माफी मांगी कि वे भी कुछ न कर पाए।
मीरा ने उनके पैरों में हाथ लगाया—
और इस बार विट्ठल ने उसे बेटी की तरह सिर से उठाया।
विट्ठल:
“बहू, गलती इंसान से होती है। बस… अब घर में प्यार बना रहे।”
शाम ने कागज फाड़ दिए जिन पर जायदाद उसके नाम हो चुकी थी।
शाम:
“बाबा… ये सब आपका है। और हमेशा आपका ही रहेगा।”
विट्ठल मुस्कुराए—
“नहीं रे… अब ये सब हम सबका है।”
घर के आँगन में खुशियों की हवा फिर से बहने लगी।