Gumnaam - 1 in Hindi Drama by वंदना जैन books and stories PDF | गुमनाम - एपिसोड 1

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गुमनाम - एपिसोड 1

अनामिका और अविनाश दोनों उस पहाड़ी के किनारे टूटी हुई रेलिंग के पास खड़े डूबते हुए सूरज को देख रहे थे।

आसमान में गुलाबी नारंगी आभा पीछे छोड़ता हुआ सूरज अपनी गति से नज़रों से ओझल हो रहा था। अनामिका चारों ओर के दृश्य में डूबी हुई थी और अविनाश, ठीक अनामिका के पीछे, बस एक कदम की दूरी पर खड़ा था। उसके मन में विचारों का बवंडर उठा हुआ था। वो जानता था कि जो वो करने जा रहा है वो ग़लत है! उसे यह नहीं करना चाहिए! लेकिन उसे यह करना ही था; उसने अपने मरते हुए पिता से वादा किया था। उसने वादा किया था कि वो अनामिका को, उस लड़की को जो उसका प्यार थी उसकी जान ले लेगा। यह याद आते ही अविनाश की साँसे गहरी हुईं और अचानक उसने अनामिका की कलाई पकड़ कर उसे घुमा दिया। अनामिका हवा में झूलते हुए डर से चीख उठी।

"अविनाश यह क्या कर रहे हो तुम!”

"क्या अपने पिता को दिए वचन को निभाते हुए कोई बदला लेना गुनाह होता है अनामिका?”

"तुम क्या कह रहे हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है, मैं गिर जाऊँगी अविनाश, प्लीज़ संभालो मुझे" अनामिका की आँखें डर के मारे आँसुओं से भर गई थीं। अविनाश ने उसकी विनती को नजरअंदाज़ किया और दोबारा पूछा।

"पहले मेरे सवाल का जवाब दो अनामिका… क्या अपने मरते हुए पिता को दिये वचन को निभाते हुए कोई बदला लेना गुनाह होता है?” अविनाश की आवाज़ गहन-गंभीर थी, मानों समंदर की गहराई से आ रही हो! वो ऊपर से तो संयत था लेकिन अंदर ही अंदर उसके मन में अपने पिता के लिए नफ़रत उभरने लगी थी। अनामिका, उसके मन की पहली लड़की।

ऐसी लड़की जो धीमे-धीमे ही सही लेकिन उसके दिल के करीब आई थी! बहुत करीब। वो पहली लड़की जिसके लिए अविनाश ने अपने दिल में उठते कुछ एहसासों को पहचाना था! ऐसा नहीं था कि इसके पहले उसके जीवन में कोई लड़की न रही हो! लेकिन वो सब उसके लिए किसी पिकनिक की तरह थीं!! जहाँ दिन या हफ़्ते तो बिताया जा सकता है लेकिन जीवन नहीं! लेकिन अनामिका, अनामिका उसके लिए मंज़िल की तरह, उसके घर की तरह थी। जहाँ वो अपने दफ़्तर का काम खत्म कर लौटना चाहता था। अनामिका ऐसी पहली लड़की थी जिसने अविनाश के दिल के उस हिस्से को छुआ था जहाँ आज तक कोई और लड़की नहीं पहुँच पाई थी!

यह पहली बार था जब अविनाश ने किसी को अपने इतने करीब माना था और इससे पहले कि वो अपने मन की बात किसी से कह पाता उसके पिता ने अपने किये अहसानों और अपने नाम के बदले उसकी मौत माँग ली थी।

उसके प्यार की मौत, अविनाश के उस सपने की मौत जिसे उसने डरते हुए देखा था कि कहीं ऐसा न हो कि उसके सपने को उसकी खुद की ही नजर लग जाए!

अविनाश अब भी अनामिका की कलाई थामे और उसे पहाड़ी की चोटी से लटकाए खड़ा था। अनामिका अपनी तरफ़ से हर कोशिश कर रही थी कि वो ऊपर वापस आ सके लेकिन डर और अचानक से घटी घटना के सदमे से उसकी ताक़त जवाब दे गई थी।

उसने सिर उठा कर अविनाश की ओर बेबसी से देखा और विनती करते हुए बोली।

"अविनाश तुम क्या कह रहे हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा!! मुझे डर लग रहा है, प्लीज़ मुझे वापस" अनामिका ने रोते हुए कहा, उसकी आँखों में मौत का डर साफ़ झलक रहा था।

"मुझे माफ़ कर देना, अनामिका, लेकिन हमारी किस्मत ने हम दोनों के लिए यही लिखा है, आई एम सॉरी" इतना कह अविनाश ने अपनी आँखें बंद कर एक गहरी साँस भीतर खींची और धीमे-धीमे अनामिका की कलाई पर आपकी पकड़ ढीली कर छोड़ दी।

उसकी कलाई छोड़ने के बाद अविनाश ने आँखें खोल कर नीचे गिरती अनामिका की ओर देखा। जैसे ही अविनाश ने अनामिका को नीचे फेंका, उसका गाउन जो एक दिन पहले अविनाश ने ही उसे तोहफ़े में भेजा था, वो हवा में लहरा गया। हल्के आसमानी रंग का गाउन हवा में किसी बवंडर की तरह लहरा रहा था।

पहाड़ी से गिरते हुए अनामिका ऊपर खड़े अविनाश को अपलक देखे जा रही थी। कुछ देर पहले जहाँ उसकी आँखों में भय था, वहीं अब उसकी आँखों में एकसाथ कई सारे भाव आ गए थे। अविनाश इन भावों को अच्छे से पहचानता था। अनामिका की आँखों में उसके लिए नफ़रत थी, दुःख था और निराशा थी। ऐसी निराशा जो दो दिन पहले उसने अपने पिता की आँखों में देखी थी। ऐसी नफ़रत जो वो अक्सर आईने में अपने पिता के लिए अपनी आँखों में देखा करता था। दुख जो वो हमेशा अपने उस बचपन के लिए महसूस करता था जिसे संवार कर भी उसके पिता ने बिगाड़ दिया था।

एकदम सपाट चेहरा लिए अविनाश तब तक वहीं खड़ा रहा जब तक कि अनामिका घाटी में गिरते हुए पेड़ों की शाखों में समा कर उसे दिखना बंद न हो गई। अनामिका के नीचे गिरते ही अविनाश वहीं धम्म से अपने घुटनों पर गिर गया और अपनी हथेलियों में चेहरा छुपा कर रो दिया। वो रोता रहा जब तक कि उसकी सिसकियाँ नहीं बंधने लगीं। रोते-रोते थक गया तो उसने आसमान को देखते हुए ज़ोर से अनामिका को पुकार पागलों की तरह हंसने लगा।

"हाहा, मैंने कहा था, अनामिका, मेरे करीब मत आओ, मैंने कहा था। मैं बीमारी हूँ, एक जानलेवा बीमारी और देखो इस बीमारी ने तुम्हें यह प्यार, इश्क़! मोहब्बत यह सब मुझे रास नहीं आता। याद है उस दिन भी मैंने कोशिश की थी तुम्हें खुद से दूर करने की जब तुम अपने प्यार का इज़हार करने आई थी" कहते हुए अविनाश के गले की नसें फूलने लगी थीं। उसने एक बार फिर अपना चेहरा अपनी हथेलियों में भरा और वहीं ज़मीन पर माथा टेक कर एक बार फिर रो पड़ा। आज उसके जीवन का एक सुंदर सपना मर गया था। आज उसके जो जीने की वजह बन सकती थी, उसने खुद अपने हाथों से उसे खत्म कर दिया था।

जाने कितनी देर अविनाश वहाँ बैठा अनामिका के जाने का मातम मनाता रहा। शाम गहराई और अंधेरा होना शुरू हुआ तो अविनाश ने एक बार फिर पहाड़ी के नीचे उस ओर देखा जहाँ उसने अनामिका को फेंका था फिर मायूसी से निढाल हो कर खड़ा हो गया।

जारी है...