“खामोशी के बाद”
हाय…
मैं रीना हूँ।
आज जब मैं यह सब लिख रही हूँ, मेरी उम्र चालीस के पार है। बाहर से देखने वाला कहेगा—एक पढ़ी-लिखी, सभ्य, आत्मनिर्भर औरत।
लेकिन भीतर… भीतर मैं एक ऐसे कमरे में बंद हूँ, जिसकी खिड़कियाँ सालों पहले किसी ने तोड़ दी थीं।
अकेलापन आज मुझे नहीं मिला।
वह तो उसी रात ने मुझे सौंप दिया था—जब मैंने खुद से बोलना छोड़ दिया था।
मैं अपने माँ-पापा की इकलौती संतान थी। अमीर, खुले विचारों वाले, आत्मविश्वास से भरे लोग।
माँ कहती थीं—
“रीना, डरना मत। डर इंसान को जीते-जी मार देता है।”
पापा हँसकर जोड़ते—
“और अगर कभी लगे कि दुनिया गलत है, तो याद रखना—तुम सही हो।”
मैं वही लड़की थी।
बिंदास।
बोल्ड।
निडर।
मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिला तो लगा जैसे ज़िंदगी ने मेरी बाहों में छलाँग लगा दी हो।
हमारा एक अलग ग्रुप था—अमीर घरों के बच्चे, महँगी गाड़ियाँ, ब्रांडेड कपड़े, रातें जो सुबह से लंबी होती थीं।
हम पढ़ते भी थे, पर जीते ज़्यादा थे।
साल था 2000 / 31 दिसंबर।
हमारे सीनियर का आलीशान फ्लैट—शहर की सबसे ऊँची इमारत में।
शराब की बोतलें, तेज़ म्यूज़िक, हँसी, शोर।
रात के बारह बजे जैसे ही घड़ी ने 2001 का स्वागत किया, सबने एक-दूसरे को गले लगाया।
मैं भी।
“हैप्पी न्यू ईयर, रीना!”
“टू यू टू!”
रात बढ़ती गई।
दो बजे तक मेरी ज़्यादातर सहेलियाँ नशे में कहीं पड़ी थीं—कोई सोफे पर, कोई बाथरूम के बाहर।
मैं…
मैं भी लड़खड़ा रही थी।
मेरे दस मेल दोस्त—जिन्हें मैं अपना परिवार मानती थी—मुझे हॉल में लाकर बैठा दिया।
“रीना, तुम लेट जाओ… यू आर ड्रंक,” किसी ने कहा।
मैं हँसी।
“अरे… मैं ठीक हूँ…”
लेकिन मेरे शब्द मेरे साथ नहीं थे।
मैं बेड पर लेटी। आँखें भारी थीं।
म्यूज़िक दूर जाता लगा।
और फिर…
कुछ आवाज़ें।
हँसी।
फुसफुसाहट।
“वीडियो ऑन कर।”
“चुप… जाग न जाए।”
मैं हिलना चाहती थी।
लेकिन शरीर मेरा नहीं था।
दर्द…
असहनीय।
किसी ने मेरा शरीर छुआ।
किसी ने मेरा सम्मान नोच लिया।
मैं चीखना चाहती थी।
लेकिन गला मेरा साथ नहीं दे रहा था।
एक के बाद एक…
सुबह के चार बजे तक।
मुझे याद है—किसी ने सुई चुभोई।
इंसुलिन।
उसके बाद…
अंधेरा।
जब आँख खुली, तो छत अजनबी थी।
शरीर में ऐसा दर्द जैसे हड्डियाँ बिखर गई हों।
मैं उठने लगी—
और गिर पड़ी।
“रीना… लेटी रहो।”
आवाज़ जानी-पहचानी थी।
“दीपक?”
“हाँ।”
“टाइम…?”
“दस बज रहे हैं।”
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा—
“क्या तुम मुझे पुलिस स्टेशन ले चलोगे?”
दीपक चुप रहा।
फिर बोला—
“मैंने फोन कर दिया है। पुलिस आती ही होगी।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें… पता है मेरे साथ क्या हुआ?”
वह पल भर रुका।
फिर बोला—
“हाँ… मैं मॉर्निंग वॉक पर निकला था… तुम सड़क किनारे मुझे नग्न हालत में मिलीं।”
उसकी आवाज़ में कटाक्ष था।
“ऐसे मनाया जाता है न्यू ईयर?”
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
पुलिस इंस्पेक्टर ने आते ही पूछा—
“मैडम, क्या हुआ आपके साथ?”
मैं कुछ नहीं बोली।
महिला हवलदार मेरे पास बैठी।
“डरो मत… सच बताओ।”
और तभी…
मुझे वह वीडियो याद आया।
मेरे माँ-पापा।
उनकी इज़्ज़त।
मैंने सिर झुका लिया।
“कुछ नहीं… हम लोगों में झगड़ा हो गया था।”
इंस्पेक्टर ने दीपक की तरफ देखा—
“इसने कहा रेप हुआ है।”
मैंने जल्दी से कहा—
“मैं नशे में थी… कपड़े फट गए… इन्हें गलतफहमी हो गई।”
कमरे में सन्नाटा था।
इंस्पेक्टर ने दीपक को डाँटा।
“बेवजह पुलिस बुलाते हो!”
वे चले गए।
दरवाज़ा बंद हुआ।
दीपक फट पड़ा—
“ये क्या था, रीना? तुम तो पुलिस स्टेशन जाना चाहती थीं!”
मैंने धीरे से कहा—
“अब ठीक हूँ… हॉस्टल चली जाऊँगी।”
मैं उठी।
अपने कपड़ों की जगह—
दीपक का लोअर और टी-शर्ट।
“आपके कपड़े धोकर लौटा दूँगी।”
वह चुप था।
मैं बिना पीछे देखे निकल आई।
आज…
न पैसा है,
न निडरता,
न बिंदास हँसी।
सिर्फ़ खामोशी है।
मैं जानती हूँ—
वह रात मुझे सिर्फ़ घायल नहीं कर गई,
उसने मुझे चुप रहना सिखा दिया।
और समाज?
वह आज भी कहता है—
“क्यों गई थी?”
“किसके साथ थी?”
“कपड़े कैसे थे?”
लेकिन कोई नहीं पूछता—
“दोषी कौन था?”
मैं रीना हूँ।
और मेरी कहानी सिर्फ़ मेरी नहीं है।
यह हर उस औरत की है—
जिसने सच बोलने से ज़्यादा
चुप रहने को सुरक्षित समझा।
मेरी तरह....
आर्यमौलिक