Dark Side of Surrogacy in Hindi Women Focused by S Sinha books and stories PDF | सरोगेसी का काला पक्ष

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सरोगेसी का काला पक्ष

 

                                                        सरोगेसी का काला पक्ष
सरोगेसी क्या है?


सरोगेसी वह मेडिकल क्रिया है जिसमें एक महिला गर्भधारण करती है और जन्म के बाद बच्चे को किसी और को सौंप देती है  . आमतौर पर, वह ऐसे दंपत्ति या माता-पिता के लिए बच्चे को जन्म देती है जो स्वयं गर्भधारण नहीं कर सकते - इन्हें "इच्छुक माता-पिता" ( intended parents )  कहा जाता है  .  आसान शब्दों में इसे किराये की कोख भी कहा जाता है   . 

एक आंकड़े के अनुसार हर साल लगभग दो करोड़ लोग बांझपन के शिकार होते हैं  .  वैसे माता पिता जो किसी कारणवश स्वयं गर्भधारण में असमर्थ हैं उनके लिए यह एक वरदान है  . पर इस प्रक्रिया का दुरुपयोग होने लगा था और अनेक मामलों में धन अर्जन का एक साधन बन गया  . कुछ साल पहले तक सरोगेसी पर अनेक देशों में कमर्शियल सरोगेसी पर कोई प्रतिबंध नहीं था पर इसके दुरुपयोग को देखते हुए अब ज्यादातर देशों में कमर्शियल सरोगेसी गैरकानूनी है  . अनेक देशों में परोपकार  ( altruistic surrogacy ) की दृष्टि से निकट संबंधी के लिए यह सशर्त मान्य है , भारत में भी  . कुछ देशों में अभी भी कमर्शियल सरोगेसी मान्य है - अमेरिका के कुछ राज्यों में ,यूक्रेन , ग्रीस , कनाडा , जॉर्जिया  आदि में  .  इसके लिए फिलहाल जॉर्जिया  सबसे लोकप्रिय जगह  माना जाता  है  . 

यह एक  गतिशील वैश्विक बाज़ार बन गया है जहाँ  संभावित ग्राहकों की एक बड़ी संख्या है , वह भी  एक ऐसा बाजार जो अक्सर कानूनी रूप से अस्पष्ट क्षेत्रों में काम करता है और नियमों से बचने और मांग को पूरा करने के लिए एक देश से दूसरे देश में घूमता रहता है  .  यदि आप बच्चा चाहते हैं और आपके पास धन की कमी नहीं  है, तो लगभग कुछ भी संभव है  . भिन्न देशों में  नियमों और कीमतों में व्यापक भिन्नता के कारण,भावी पेरेंट्स अक्सर अपने देश से बाहर जा कर इसका लाभ उठाते हैं  , कभी उन्हें गंतव्य स्थान बदलना भी पड़ता है . कुछ लोगों के लिए सरोगेसी एक लाभदायक उद्योग है जिसमें दिखावटी नैतिकता होती है लेकिन वास्तविक उद्देश्य पैसा कमाना होता है  . 

दो तरह के सरोगेसी के - परंपरागत सरोगेसी में सरोगेट मां के अंडे का उपयोग किया जाता है, जिससे वह आनुवंशिक मां बन जाती है  .  जेस्टेशनल सरोगेसी में, अंडाणु इच्छित मां या किसी डोनर  द्वारा प्रदान किया जाता है   . अंडे को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF ) के माध्यम से निषेचित किया जाता है और फिर सरोगेट मां के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है   . 

एक नजर सरोगेसी के लाभ और हानि पर 

लाभ -

 सरोगेसी  एक ऐसे बच्चे  को जन्म देता है जिसका अन्यथा कोई वज़ूद नहीं होता है  . इसके चलते एक परिवार फलता फूलता है  . 

दूसरों को एक अनमोल उपहार देकर सरोगेट को गर्व और संतोष का अनुभव होगा 

अन्य सरोगेट महिलाओं के साथ एक नए समुदाय का हिस्सा बनने का अवसर देता है  . 

सरोगेट को अपनी मातृत्व या जनन पूरी करने के बाद भी अतिरिक्त एक बार फिर मातृत्व का अनुभव करने का अवसर मिलता है  .  

सरोगेट के लिए अतिरिक्त आर्थिक लाभ का जरिया होता है  . 

हानि -

 सरोगेसी भावनात्मक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण काम होता है   . 

समाज में कुछ लोगों को इसके प्रति नकारात्मक धारणा  होती है  . 

ज्यादातर मामलों में देश से बाहर जाना पड़ता है  . 

इसमें प्रेगनेंसी संबंधित जोखिम के अतिरिक्त समय समय पर मेडिकल चेकअप और दवाओं का दुष्प्रभाव भी शामिल है  . अपनी निजता से  समझौता करना पड़ता है , जैसे - खान पान , मेडिकल टेस्ट आदि , कभी दबाव में भ्रूण हत्या या सिजेरियन कराना पड़ सकता पड़ता है  .  

रोगी या विकलांग शिशु होने पर इच्छुक पेरेंट्स  अक्सर शिशु को स्वीकार नहीं कर सकते हैं  .   

नैतिक, कानूनी और सामाजिक पहलू 

शोषण और वस्तुकरण ( commodification  )  -  मूल बिंदु शोषण की संभावना के इर्द-गिर्द घूमता है, विशेष रूप से कम आय वाले या विकासशील देशों की महिलाओं का, जिन्हें आर्थिक दबाव के कारण सरोगेट बनने के लिए मजबूर किया जा सकता है  . इसके चलते यह आरोप लगाया जाता  है कि धनी व्यक्ति गरीबों के शरीर का उपयोग करते हैं  . 

नियमों का अभाव और कानूनी जटिलता - सरोगेसी कानून देश और यहां तक ​​कि राज्य के अनुसार भी बहुत भिन्न होते हैं  .  इस अव्यवस्थित / अनियंत्रित नियम के कारण कुछ समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जैसे - उन सरोगेट्स के लिए कानूनी सुरक्षा का अभाव जो अपने अधिकारों के बारे में पूरी तरह से जागरूक नहीं हो सकती हैं  . 

सीमा पार सरोगेसी से जुड़े मुद्दे  - जहां इच्छुक माता-पिता अनियमित गंतव्यों की यात्रा करते हैं, जिससे घर लौटने पर बच्चे की नागरिकता और पितृत्व के संबंध में संभावित शोषण और कानूनी अड़चन की आशंका  रहती है  .  सामाजिक कलंक और गोपनीयता -  सरोगेसी  के प्रति नकारात्मक धारणाओं के कारण सरोगेसी करने वाली महिलाओं को अपने समुदायों से आलोचना या सामाजिक समर्थन की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिसके कारण कुछ महिलाएं अपनी गर्भावस्था को छिपाती हैं और सामाजिक अलगाव का अनुभव करती हैं  . बच्चे के लिए खतरा - स्वास्थ्य और विकास संबंधी चिंताएँ - आईवीएफ और सरोगेसी व्यवस्थाओं से जन्म लेने वाले शिशुओं में प्रतिकूल परिणामों का खतरा बढ़ जाता है, जैसे - 

समय से पहले जन्म और कम वजन की संभावना  . नवजात शिशुओं को अक्सर गहन चिकित्सा  ( NICU ) देखभाल की आवश्यकता होने की संभावना अधिक है  . कुछ जन्मजात विकारों और उच्च रक्तचाप, मधुमेह और विकास में  देरी जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं की भी आशंका रहती  है  . 

मनोवैज्ञानिक और पहचान संबंधी मुद्दे  - बच्चे को जैविक माता-पिता के बारे में जानकारी से वंचित रखा जाता है (उदाहरण के लिए, गुमनाम दान के मामलों में)  .  जन्म के समय जन्मदाता माँ से जानबूझकर अलग करना कुछ आलोचकों के लिए चिंता का एक प्रमुख विषय है  . सरोगेसी के पीछे के  काले धंधे  की एक घटना -

कुछ लोग या संस्था सरोगेसी को एक उद्योग बना कर इसका दुरुपयोग करते हैं  - इसमें  महिलाओं के शरीर को वस्तुओं की तरह बार बार बेचा, नियंत्रित और शोषित किया जाता है  . जिन देशों या स्थानों पर इसकी कानूनी इजाजत है वहां यह धंधा कानून की आड़ में या इसके कमजोर पहलूओं का लाभ उठा कर चलता है  . 2022 - 23 के  मामले का भण्डाफोर हुआ जिसमें तमिलनाडु और वाराणसी में महिलाओं और किशोरियों को जबरन अंडाणु दान करने के लिए मजबूर किया गया  और कानून से बचने के लिए उनके जाली दस्तावेज बनाए गए  .  इसके बदले उन्हें 20 से 30 हजार रुपये दिए गए  थे  . अभी हाल ही में जॉर्जिया ( सोवियत संघ के विघटन के बाद एक स्वतंत्र देश ) में  एक षड्यंत्र के अंतर्गत चीनी गिरोह द्वारा 100 से अधिक महिलाओं को अंडाणु निकालने के लिए गुलाम बनाया गया था  .   

जॉर्जिया में ईव उपनाम से जानी जाने वाली थाई महिला की सनसनीखेज कहानी -  रिपोर्ट के अनुसार यह एक अनियमित वैश्विक प्रजनन उद्योग के भीतर मानव तस्करी और शोषण का  मामला है

थाईलैंड की रहने वाली ईव एक युवती थी जो अपने परिवार का कर्ज चुकाने के लिए संघर्ष कर रही थी  .  तभी उसकी नज़र फेसबुक पर एक विज्ञापन पर पड़ी जिसमें जॉर्जिया में कानूनी सरोगेट के रूप में आकर्षक नौकरी का प्रस्ताव था  .  इससे  5 लाख बाट ( 5 लाख बाट , थाई मुद्रा = लगभग 16,400 अमेरिकी डॉलर) से अधिक की कमाई होने की संभावना थी  .  लोगों की मदद करने और अपने परिवार के आर्थिक बोझ को कम करने के इस वैध अवसर को देखते हुए  वह अक्टूबर 2024 में जॉर्जिया के लिए रवाना हो गई  .  
वहाँ पहुँचने पर, ईव और अन्य थाई  महिलाओं ने खुद को एक अत्यधिक नियंत्रित वातावरण में पाया, जहाँ उन्हें एक चीनी आपराधिक गिरोह द्वारा संचालित कई बंद आवासीय परिसरों में रखा गया था  . 
छल और नियंत्रण - महिलाओं के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए, उन्हें कुछ नियम बताकर घर से बाहर न निकलने के लिए कहा गया और सार्वजनिक स्थानों पर कैमरे लगा दिए गए  . उन्हें चेतावनी दी गई कि यदि वे नियमों का पालन नहीं करतीं या घर छोड़ने की कोशिश करती हैं तो उन्हें भारी कारावास की सजा होगी या जुर्माना भरना पड़ेगा  .
जबरन मेडिकल टेस्ट -  विशिष्ट दंपतियों के लिए वादा की गई सरोगेसी व्यवस्था के बजाय, महिलाओं को बार-बार हार्मोन के इंजेक्शन और मासिक अंडाणु निष्कर्षण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा . एक तरह से  अनिवार्य रूप से उन्हें एक "मानव अंडाणु फार्म" संचालन के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था .
जानकारी का अभाव - महिलाओं को उनके द्वारा ली जा रही दवाओं या निकाले गए अंडों के उपयोग के बारे में बहुत कम जानकारी दी जाती  थी . क्लिनिक के चिकित्सा कर्मचारियों ने टेस्ट आदि के बारे में विस्तार से नहीं बताया और महिलाओं को अक्सर चुपचाप बैठने के लिए खबरदार किया जाता था  .
बाहरी दुनिया से अलग थलग  -  ये महिलाएं बाहरी दुनिया से और उसी गिरोह द्वारा संचालित विभिन्न "घरों" में रहने वाली महिलाओं के अन्य समूहों से अलग-थलग थीं  .
भंडाफोड़ और जाँच 
इस गिरोह का पर्दाफाश तब हुआ जब  छद्म नाम  "ना" से  जाने वाली एक महिला ने तस्करों को लगभग 2,000 यूरो (लगभग 70,000 थाई बात) की "फिरौती" राशि देकर अपनी रिहाई सुनिश्चित की और थाई गैर सरकारी संगठन, पावेना फाउंडेशन फॉर चिल्ड्रन एंड वुमेन को इसकी सूचना दी  . इस NGO की स्थापना थाईलैंड की एक पूर्व मंत्री  पावेना होंगसाकुला ( Pavena Hongsakula ) ने की थी  . पीड़िता ने  पावेना को बताया कि अन्य थाई लोग अभी भी मानव अंडे के फार्म में फंसे हुए हैं क्योंकि उनके पास अपनी आजादी के लिए भुगतान करने के लिए पैसे नहीं हैं  . 
2025 की शुरुआत में इंटरपोल और थाई तथा जॉर्जियाई अधिकारियों के संयुक्त प्रयास से एक समन्वित बचाव अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप तीन अन्य थाई महिलाओं को बचाया गया और स्वदेश वापस भेजा गया  .  तब से जॉर्जियाई अधिकारियों ने मानव तस्करी की जांच शुरू कर दी है  . 
ईव की कहानी उन कई कहानियों में से एक है जो अनियमित वैश्विक सरोगेसी बाजार के जोखिमों और काले पक्ष को उजागर करती है, जहां विकासशील देशों की आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं का अंतरराष्ट्रीय तस्करी गिरोहों द्वारा शोषण किया जा सकता है  . 
बॉटम लाइन -  सरोगेसी के लाभ और हानि दोनों हैं और संभवतः लाभ अधिक हों  . फिर भी यह निर्णय आर्थिक , सामाजिक , कानूनी  , नैतिक और पारिवारिक पहलुओं पर विचार करने के बाद लेना चाहिए  . इस बारे में  जरूरी कानूनी जानकारी होना चाहिए , यदि नहीं है तो एक्सपर्ट से सलाह लें  . 

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नोट - समय समय पर सरोगेसी के कानून में देश इस कानून में बदलाव करते  रहते हैं  .