Galatfehmi ka Khoon - 1 in Hindi Love Stories by Hindi kahaniyan books and stories PDF | गलतफहमी का खून - 1

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गलतफहमी का खून - 1

दोस्ती, जुनून और वो 

 दिल्ली का शास्त्री नगर। यहाँ की सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि सड़क पर हॉर्न बजाती गाड़ियों और फेरीवालों की आवाज़ से होती थी।
इन्हीं तंग और भीड़भाड़ वाली गलियों में एक पुराना, सीलन भरा छोटा सा घर था। यह घर था सोनाक्षी का।सोनाक्षी, जिसके चेहरे पर गोण्डा, उत्तर प्रदेश की सादगी थी, लेकिन आँखों में दिल्ली के सपने चमकते थे। उसके पिता रामअवतार दिहाड़ी मज़दूर थे। पत्थर उठाते-उठाते उनके हाथ इतने सख्त हो गए थे कि जब वे सोनाक्षी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते, तो उनकी हथेली की रगड़ साफ़ महसूस होती थी। रोज़ सुबह लेबर चौक पर खड़ा होना, कभी काम मिलना, कभी खाली हाथ लौटना — यही उनकी ज़िंदगी थी। घर में पैसे कम थे, पर सोनाक्षी के लिए उनका प्यार बेहिसाब था।ठीक उसके घर के बगल में एक अलग ही दुनिया थी — अतुल जोशी का घर।
अतुल का घर बड़ा था, वहाँ के कमरे से ए.सी. की ठंडी हवा बाहर तक महसूस होती थी। अतुल स्वभाव से थोड़ा अकड़ू, खुद को हीरो समझने वाला, लड़कियों में मशहूर किस्म का लड़का था। उसे ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, सिवाय सुकून के।और इन दोनों के बीच एक तीसरी कड़ी थी — विशाल।
विशाल भी सोनाक्षी की तरह ग़रीब परिवार से था। वह शांत था, लेकिन उसकी खामोशी के अंदर बहुत शोर था।बचपन से ये तीनों — सोनाक्षी, अतुल और विशाल — एक तिकोने की तरह थे। स्कूल, ट्यूशन, पार्क, बाज़ार — जहाँ एक दिखता, वहाँ बाकी दो ज़रूर होते। सोनाक्षी और अतुल अक्सर मिलकर विशाल की टांग खींचते, उसका मज़ाक उड़ाते, पर उस मज़ाक में बेइज़्ज़ती नहीं, अपनापन होता था। विशाल मुस्कुराता रहता, क्योंकि उसकी दुनिया सोनाक्षी की हँसी में बसती थी।

वक़्त का पहिया घूमा, स्कूल की यूनिफ़ॉर्म उतर गई और बी.ए. के कॉलेज की रंगीन दुनिया शुरू हो गई। शुरुआत में सब पहले जैसा ही था। तीनों साथ कॉलेज जाते, बस की धक्के भी साथ खाते और कैंटीन की चाय भी साथ पीते।लेकिन हवा धीरे-धीरे बदलने लगी थी।
सोनाक्षी अब वो गोण्डा वाली सीधी-सादी लड़की नहीं रही थी। कॉलेज का माहौल उस पर असर डालने लगा था। धीरे-धीरे उसने अतुल और विशाल के साथ बैठना कम कर दिया। वह नए लोगों से मिलने लगी, नए समूहों में हँसने-बतियाने लगी।विशाल यह सब दूर से देखता रहता। जब सोनाक्षी किसी और लड़के की बाइक पर पीछे बैठती या किसी और के मज़ाक पर हँसती, तो उसके सीने में एक अजीब सी चुभन होती। वह जलन नहीं, एक गहरा डर था — उसे खो देने का डर।सबसे ज़्यादा जो नाम सोनाक्षी की ज़ुबान पर आने लगा था, वह था — विष्णु।
विष्णु उनकी ही क्लास का लड़का था। होशियार, विनम्र, और शायद विशाल से बेहतर… या कम से कम विशाल को ऐसा लगता था। सोनाक्षी कॉलेज तो इन दोनों के साथ आती थी, लेकिन उसका मन और वक़्त अब ज़्यादातर विष्णु के पास रहता था।
एक शाम, सूरज ढल चुका था। अतुल का कमरा, जो हमेशा ठंडा और सुकून भरा रहता था, आज वहाँ की हवा भारी लग रही थी। अतुल अपनी गेमिंग चेयर पर बैठा था, पैर टेबल पर फैलाए हुए। विशाल अभी-अभी बाहर से आया था, हाथ में एक काली पन्नी थी।अतुल ने एक नज़र पन्नी पर डाली और अपनी शरारती मुस्कान के साथ बोला,
"क्या लाया है रे? आज बड़ा चुपचाप है?"विशाल ने बिना कुछ बोले पन्नी टेबल पर रख दी। अंदर से बीयर के कैन की हल्की सी खनक सुनाई दी।
"बस बीयर है यार… पीने का मन था," विशाल की आवाज़ में एक थकान थी, जो शरीर की नहीं, मन की थी।अतुल भी नशे का शौकीन था। उसने तुरंत एक कैन खोला। दोनों ने पीना शुरू किया। कमरे में ए.सी. की हल्की आवाज़ और बीयर के घूँटों के अलावा सन्नाटा था।जैसे-जैसे नशा चढ़ा, विशाल का ज़ब्त टूटने लगा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं, पर सिर्फ़ नशे से नहीं, रोने से भी। अचानक, विशाल फूट-फूट कर रोने लगा। आँसू उसके गालों पर ऐसे बहने लगे जैसे कोई बाँध टूट गया हो।अतुल घबरा गया, फिर भी हँसते हुए, थोड़ा परेशान होकर बोला,
"अरे क्या हो गया? लड़की की तरह क्यों रो रहा है? बीयर चढ़ गई क्या?"विशाल ने अपनी भीगी आँखें ऊपर उठाईं, उसके चेहरे पर दर्द साफ़ दिख रहा था।
"भाई… मैं मर जाऊँगा यार। सच में मर जाऊँगा।""क्यों? किसने क्या बिगाड़ दिया तेरा?" अतुल अब थोड़ा गंभीर हो गया।"सोनाक्षी…" विशाल की आवाज़ काँप गई।
"मैं उससे प्यार करता हूँ भाई। आज से नहीं, बचपन से। सच्चा वाला प्यार। वो मेरी जान है यार।"अतुल थोड़ी देर के लिए हैरान हुआ, फिर ज़ोर से हँस पड़ा।
"अरे इसमें रोने वाली क्या बात है? ये तो अच्छी बात है। जा, बोल दे उसे। बचपन की दोस्त है तेरी, मना थोड़ी करेगी तुझे।"विशाल ने सिर हिलाया, एक गहरी साँस ली जो आँसू बनकर बाहर आ गई।
"नहीं यार… अब वो हमारी वाली सोनाक्षी कहाँ रही? देखता नहीं तू? अब हमारे साथ बैठती भी नहीं। सारा दिन उस विष्णु के साथ रहती है। कॉलेज हमारे साथ आती है, लेकिन जाती उसके साथ है। पक्का कुछ चल रहा है इनके बीच।"अतुल ने बीयर का कैन ज़ोर से टेबल पर पटका। उसकी दोस्ती जाग गई थी।
"बात तो तू सही कह रहा है। मैंने भी नोटिस किया है, वो लड़का विष्णु कुछ ज़्यादा ही नज़दीक आ रहा है। तू टेंशन मत ले, मैं कुछ करता हूँ।"

अगली सुबह धूप कुछ ज़्यादा तेज़ थी। विशाल और अतुल कॉलेज जाने के लिए तैयार थे। हमेशा की तरह, विशाल ने सोनाक्षी को फोन किया ताकि वह गली में बाहर आ जाए।फोन की घंटी बजी, सोनाक्षी ने उठाया।
"हाँ विशाल?""कहाँ है? हम गली में बाहर खड़े हैं, आ जा," विशाल ने सामान्य बनने की कोशिश की, लेकिन उसका दिल भारी था।सोनाक्षी की आवाज़ थोड़ी थकी हुई लगी।
"यार विशाल, तुम्हें पता है ना तारीख़ों का? आज मेरा महीने का पहला दिन है, पेट में बहुत दर्द है। मैं आज कॉलेज नहीं जा पाऊँगी।"विशाल अंदर से टूटा हुआ था, फिर भी अपनी पुरानी आदत के अनुसार मज़ाक कर बैठा। एक फीकी सी हँसी के साथ बोला,
"ओहो… मतलब आज लाल बारिश हो रही है?"सोनाक्षी चिढ़ गई, पर उस चिढ़ में भी पुरानी दोस्ती थी।
"हट बदतमीज़! कुछ भी बोलता है।" और उसने फोन काट दिया।विशाल ने फोन जेब में रख लिया। चेहरे पर थोड़ी मुस्कान थी, पर अंदर ज़हर घुल रहा था। उसे पता था कि वह आज घर पर है, पर उसके दिमाग़ में शक की परछाइयाँ फैल चुकी थीं।
कॉलेज पहुँचकर विशाल और अतुल का मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लग रहा था। दो लेक्चर जैसे-तैसे अटेंड किए, फिर दोनों कैंटीन के पास खड़े हो गए। तभी वहाँ विष्णु आ गया।विष्णु के चेहरे पर परेशानी साफ़ दिख रही थी। उसे उम्मीद थी कि आज सोनाक्षी कॉलेज में मिलेगी, लेकिन वह आई ही नहीं थी। शायद उसके पास सोनाक्षी का फोन नंबर भी नहीं था या हो सकता है, उसने कभी माँगा ही न हो।विष्णु सीधे अतुल और विशाल के पास आया। उसे लगा, ये तो उसके बचपन के दोस्त हैं, इन्हें पता होगा।
"भाई, आज सोनाक्षी नहीं आई क्या? कोई बात हुई है क्या?" उसने मासूमियत से पूछा।यह सवाल विशाल के जले हुए दिल पर नमक जैसा लगा।
‘जिस लड़की से मैं जान से ज़्यादा प्यार करता हूँ, उसके बारे में ये तीसरा आदमी मुझसे पूछ रहा है?’विशाल का गुस्सा, जो वह कल रात से पी रहा था, अचानक उबल पड़ा।
वह घूरकर बोला,
"मुझे क्या पता? मैं उसका बाप हूँ क्या? क्यों नहीं आई, मुझे क्या पता… जा, तू खुद ही पूछ ले।"अतुल ने देखा कि मामला गरम हो रहा है। उसने तुरंत विशाल के कंधे पर हाथ रखा,
"छोड़ न यार, क्यों इतना चिल्ला रहा है?"विष्णु थोड़ा सहम गया, पर फिर भी बोला,
"भाई, चिल्ला क्यों रहे हो? मैं तो बस सामान्य सा पूछ रहा था। तुम उसके दोस्त हो, इसलिए पूछा।"विशाल आगे बढ़ा, उसकी आँखों में खून उतर आया था।
"तुझे क्या लेना-देना उससे? कौन है तू? बड़ा प्यार दिखा रहा है उस पर?"अब विष्णु के भी अहं पर चोट लगी। क्लास के कई लड़के इधर-उधर से देख रहे थे।
"सुनो भाई," विष्णु ने आवाज़ ऊँची की,
"इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो? बात करने पर भी तुम्हें दिक्कत है क्या?"ये बात अतुल के कानों में चुभ गई। उसके सबसे क़रीबी दोस्त विशाल से कोई इस लहजे में बात करे, ये वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था।
हालात दो सेकंड में बदल गए।
विशाल ने आव देखा न ताव, झटके से विष्णु का कॉलर पकड़ लिया। उसकी शर्ट के बटन टूटने की आवाज़ आई।"क्या बोल रहा है तू? हमें ही औकात सिखाएगा? यहीं खड़ा-खड़ा तेरा मुँह तोड़ दूँगा," विशाल गरजा।विष्णु घबरा गया, पर वह भी लड़का था, पीछे नहीं हटा।
"भाई, तुमने शुरू किया था। मैं तो प्यार से बात कर रहा था। तुम ही झगड़ा कर रहे हो।"अब अतुल बीच में कूदा। उसने विष्णु को ज़ोर से धक्का दिया।
"बात ही क्यों कर रहा था उससे? किसी ने कहा था बात करने को? दूर रह उससे।"विष्णु ने झटके से अपना कॉलर छुड़ाया और गुस्से में बोला,
"क्या हो गया है तुम लोगों को? इतना हंगामा क्यों कर रहे हो?"बस, यहीं से बात हाथापाई में बदल गई।
अभी उसके मुँह से ये शब्द निकले ही थे कि एक करारा थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा।विशाल ने पूरी ताकत से, दिल की सारी भड़ास निकालते हुए विष्णु के चेहरे पर जोरदार तमाचा जड़ दिया। थप्पड़ की गूँज पूरे कॉरिडोर में सुनाई दी। विष्णु का सिर झटक गया।लेकिन विष्णु ने भी तुरंत जवाब दिया। उसने विशाल की गर्दन पकड़ ली और जोर से दबाने लगा। विशाल की साँसें अटकने लगीं।अपने दोस्त को मुश्किल में देखकर अतुल पागल सा हो गया। वह जानवर की तरह विष्णु पर टूट पड़ा।
एक तरफ़ विशाल, दूसरी तरफ़ अतुल — विष्णु अकेला पड़ गया।घूँसे, लातें, चीखें और गालियाँ — दोनों ने मिलकर विष्णु को बुरी तरह पीटा। उसका नाक और मुँह ख़ून से भर गए।तभी आसपास के लड़के भागकर आए और बड़ी मुश्किल से उन्हें अलग किया।
किसी ने भीड़ में से पूछा,
"क्या हुआ भाई, क्यों लड़ रहे हो?"विशाल अपनी शर्ट झाड़ते हुए, हाँफती आवाज़ में बोला,
"बेकार में हमारे बीच घुसने की कोशिश कर रहा था।"किसी और ने विष्णु से पूछा,
"तू क्यों उलझा इनसे?"विष्णु ने दर्द से भरी आवाज़ में कहा,
"मैंने तो बस सोनाक्षी के बारे में पूछा था… बस इसी बात पर ये मुझसे लड़ पड़े।"
माहौल थोड़ा शांत हो रहा था, लेकिन अतुल का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था। उसे लग रहा था कि लोग उन्हें ग़लत समझ रहे हैं। उसे अपनी ताकत, अपना रुतबा दिखाना ज़रूरी लगा।अतुल भीड़ के बीच खड़ा होकर ज़ोर से बोला,
"सारे लड़के ध्यान से सुन लो! आज के बाद अगर किसी ने भी सोनाक्षी से बात करने की कोशिश की, या उसके आस-पास भी दिखा… तो शाम तक अपने घरवालों का चेहरा नहीं देख पाएगा। कॉलेज से निकलते ही सीधा ऊपर भेज दूँगा। ये अतुल जोशी का वादा है।"सन्नाटा छा गया। यह धमकी नहीं, एक एलान था।बात उड़ते-उड़ते कॉलेज के प्रिंसिपल तक पहुँच गई।
प्रिंसिपल उम्रदराज़ आदमी थे, मगर अतुल के पिता के काफ़ी क़रीबी दोस्त थे। अतुल के घर उनका आना-जाना था। अतुल उन्हें ‘सर’ नहीं, ‘अंकल’ कहकर बुलाता था।प्रिंसिपल ने अतुल को अपने केबिन में बुलाया।
"बेटा अतुल, ये क्या सुन रहा हूँ मैं? विष्णु के साथ मारपीट क्यों की?"अतुल ने बहुत सफ़ाई से झूठ बोला और मासूमियत का चेहरा पहन लिया।
"अंकल, गलती उसकी थी। उसने मेरे दोस्त विशाल पर पहले हाथ उठाया। हम तो बस अपना बचाव कर रहे थे। वो लड़का खुद ही लड़ाई करता है।"प्रिंसिपल ने चश्मा ठीक किया। शायद उन्हें सच्चाई का अंदाज़ा था, पर दोस्ती और रुतबे के आगे सब दब गया।
"ठीक है, मैं देखता हूँ," उन्होंने कहा। "मैं उसे सबक सिखाऊँगा।"कुछ देर बाद फैसला आया।
नाइंसाफ़ी की हद देखिए — जिसने मार खाई, जिसकी इज़्ज़त सरेआम तार-तार हुई, वही विष्णु… उसे दो महीने के लिए कॉलेज से निलंबित कर दिया गया। उस पर इल्ज़ाम लगाया गया कि उसने कॉलेज का माहौल खराब किया।और अतुल और विशाल?
वे सीना तानकर कॉलेज के गेट से बाहर निकले, जैसे कोई जंग जीत कर लौट रहे हों।लेकिन विशाल के दिल में अभी भी डर था। विष्णु तो चला गया, पर क्या सोनाक्षी के दिल से भी वह निकल पाएगा? कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी, यह तो बस एक नई जंग की शुरुआत थी।
रविवार का दिन था। आमतौर पर यह छुट्टी और आराम का दिन होता है, लेकिन उस दिन अतुल के कमरे में न आराम था, न सुकून — बस एक अजीब सी बेचैनी थी।विशाल सोफ़े पर बैठा था, पैर हिला रहा था। उसके दिमाग़ में कल की लड़ाई और विष्णु का खून से लथपथ चेहरा घूम रहा था।
"अतुल भाई… मज़ा नहीं आ रहा यार," विशाल ने थकी हुई आवाज़ में कहा। उसके भीतर पकड़े जाने का डर बैठ गया था।अतुल बिस्तर पर लेटा मोबाइल में गेम खेल रहा था। उसने नज़र उठाए बिना पूछा,
"क्या हुआ रे? अभी तक उसी में अटका हुआ है क्या?""हाँ यार," विशाल ने सिर पकड़ लिया।
"बस टेंशन हो रही है। हमने ताकत दिखाकर विष्णु को सस्पेंड तो करा दिया, वो कॉलेज से हट गया… लेकिन सोनाक्षी? जब उसे पता चलेगा कि विष्णु कॉलेज से गायब है, तो वो हमसे ज़रूर पूछेगी। तब हम क्या कहेंगे? झूठ कब तक चलेगा?"अतुल हँसा, एक बेफ़िक्र हँसी। वह उठकर बैठ गया और बोला,
"अरे तू क्यों इतना दिमाग़ खा रहा है? वो हमारी बचपन की दोस्त है यार, कोई बाहर वाली थोड़ी है? हम जो भी बोलेंगे, मान जाएगी। हम पर शक नहीं करेगी।"अतुल की बातों में पूरा भरोसा था, लेकिन विशाल का दिल कह रहा था कि अब तूफ़ान आने वाला है। 
सोमवार की सुबह हुई। तीनों — सोनाक्षी, विशाल और अतुल — कॉलेज पहुँचे।
आज सोनाक्षी कुछ अलग सी लग रही थी। वह चुप थी, उसके चेहरे पर अजीब सा तनाव था।क्लासरूम में पहुँचते ही उसने अपना बैग हमेशा की तरह विशाल और अतुल के बैग के पास तो रख दिया, लेकिन खुद वहाँ नहीं बैठी।
वह क्लास के दरवाज़े पर जाकर खड़ी हो गई।उसकी नज़रें कॉरिडोर में आते-जाते हर चेहरे पर टिक रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ख़ास व्यक्ति का इंतज़ार कर रही हो, जो आज भी नहीं आया था। उसकी आँखों में इंतज़ार साफ़ दिख रहा था, और यह इंतज़ार विष्णु के लिए था।पीछे बैठा विशाल यह सब देख रहा था। उसके दिल में फिर से वही जलन उठने लगी।
वह खुद को रोक नहीं पाया, पीछे से आवाज़ दी,
"अरे सोनाक्षी! वहाँ दरवाज़े पर क्या पहरेदार बनकर खड़ी है? इधर आ, क्लास शुरू होने वाली है।"सोनाक्षी ने पलटकर देखा भी नहीं, बस धीमी आवाज़ में बोली,
"आ रही हूँ थोड़ी देर में…"अतुल ने बात काटते हुए कहा,
"कोई खास का इंतज़ार कर रही है क्या?"सोनाक्षी ने बहाना बनाया,
"नहीं… बस यहाँ से बाहर का नज़ारा अच्छा लग रहा है। थोड़ी हवा आ रही है।"लेकिन विशाल जानता था कि वहाँ न हवा थी, न नज़ारा — वहाँ सिर्फ़ विष्णु की कमी थी।अतुल ने विशाल के कंधे पर हाथ रखा और इस बार गंभीर होकर बोला,
"भाई, एक बात कहूँ? बुरा मत मानना, और डरना मत।""बोल न," विशाल ने हिचकिचाकर कहा।"देख, मौका यही है। तू जा और सोनाक्षी को अपने दिल की बात साफ़-साफ़ बोल दे। उसे प्रपोज़ कर दे।"विशाल घबरा गया।
"नहीं यार… अभी उसका मूड ठीक नहीं लग रहा। फिर कभी, किसी अच्छे दिन बोलूँगा।"अतुल ने उसकी आँखों में देखा और कड़वाहट से बोला,
"भाई, अगर आज नहीं बोला ना… तो कल कोई और उसे ले जाएगा। आज विष्णु नहीं आया, कल कोई दूसरा आ जाएगा। मेरी बात मान, देर मत कर। जा और बोल दे।"अतुल की बात तीर की तरह लगी — ‘कोई और उसे ले जाएगा’ — यह ख्याल विशाल से सहा नहीं गया।
"चल ठीक है," उसने मुट्ठी भींच ली।
"तू कह रहा है तो आज बोल ही देता हूँ। आर या पार।"
विशाल उठने ही वाला था कि अचानक सब कुछ बदल गया।
सोनाक्षी की एक सहेली, रिया, भागती हुई आई और उसने सोनाक्षी के कान में धीरे-धीरे सारी बात बता दी — कल की लड़ाई, विष्णु की पिटाई और उसके सस्पेंशन तक की पूरी कहानी।सुनते ही सोनाक्षी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। वह तेज़ क़दमों से पीछे की तरफ़ आई, जहाँ विशाल और अतुल बैठे थे।"मुझे तुम दोनों से अभी कुछ ज़रूरी बात करनी है," सोनाक्षी की आवाज़ में बर्फ़ जैसी ठंडक थी।अतुल समझ गया कि मामला बिगड़ चुका है, पर उसने बात को हल्का दिखाने की कोशिश की।
"अरे वाह, इत्तफ़ाक देखो, विशाल को भी तुमसे कुछ बात करनी है।"सोनाक्षी ने सीधे विशाल की तरफ देखा,
"बोल विशाल, क्या बात करनी थी?"विशाल की हिम्मत जवाब दे गई।
"नहीं… पहले तुम बताओ, तुम क्या पूछना चाहती हो?"अतुल ने तुरंत बात घुमाई। वह उठता हुआ बोला,
"अच्छा सुनो, तुम दोनों आराम से बात करो, मैं ज़रा वॉशरूम होकर आता हूँ।"सोनाक्षी ने उसे रोका,
"नहीं अतुल, मुझे तुम दोनों से बात करनी है, यहीं रुको।"अतुल ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा,
"अरे नहीं पगली, पहले तुम विशाल की बात सुन लो। इसे तुमसे बहुत ‘ज़रूरी’ बात करनी है।"इतना कहकर अतुल वहाँ से निकल गया, मैदान खाली छोड़कर।अब क्लास में सिर्फ़ विशाल और सोनाक्षी रह गए।
"बोल विशाल," सोनाक्षी ने धीरे से कहा,
"क्या बात थी?"विशाल ने गहरी साँस ली। उसे लगा अब सच बोलने का वक़्त आ गया है। शायद प्यार का इज़हार करके वह सोनाक्षी का गुस्सा कम कर पाए।उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"सोनाक्षी… देख, जो भी बोलूँगा, दिल से बोलूँगा। कृपया सुनकर तुरंत गुस्सा मत करना और न ही मुझे जज करना।"सोनाक्षी ने गंभीर नज़रों से कहा,
"ठीक है, नहीं करूँगी। अब साफ़-साफ़ बोलो।"विशाल ने आँखें बंद कीं और दिल खोलकर रख दिया।
"सोनाक्षी, हम बचपन से साथ हैं। जब हम पहली क्लास में मिले थे न, तभी से तुम मुझे अच्छी लगती हो। पहले हम सिर्फ़ दोस्त थे, तो मुझे फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते गए… मुझे तुमसे लगाव होने लगा।"वह एक कदम आगे बढ़ा।
"अब मेरा मन कहीं और नहीं लगता। सच कहूँ तो… मुझे तुमसे प्यार हो गया है सोनाक्षी। सच्चा वाला प्यार। मैं तुम्हारे बिना ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?"कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
सिर्फ़ पंखे की घूँ-घूँ सुनाई दे रही थी।सोनाक्षी चुप थी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था — न खुशी, न शर्म, न हैरानी। सिर्फ़ पत्थर बनी खामोशी।
कुछ देर बाद सोनाक्षी ने अपनी चुप्पी तोड़ी।
"देखो विशाल," उसकी आवाज़ सीधी, सपाट थी,
"मेरे दिल में तुम्हारे लिए क्या है, वो मैं तुम्हें बता दूँगी। लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरे एक सवाल का जवाब देना होगा।"विशाल ने उम्मीद भरी नज़रों से देखा,
"ठीक है, पूछो।"सोनाक्षी ने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा,
"अगर तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो… तो तुम्हें मेरी कसम है। जो भी बोलोगे, सच बोलना। झूठ बिल्कुल नहीं।"विशाल अंदर तक हिल गया। सोनाक्षी की कसम उसके लिए सबसे बड़ी थी।
उसने काँपती आवाज़ में कहा,
"तेरी कसम सोनाक्षी, जो पूछेगी, सब सच-सच बताऊँगा।"सोनाक्षी ने बिना घुमाए-फिराए सीधा सवाल किया,
"बताओ, तुम्हारी और विष्णु की लड़ाई किस बात पर हुई थी? साफ-साफ़ सच बताओ।"अब विशाल के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था।
पहले उसने बहाना बनाना चाहा,
"वो… बस, वो हमसे बेवजह चिपक रहा था…""झूठ मत बोलो!" सोनाक्षी चीख पड़ी।
"तुमने कसम खाई है मेरी। सच बोलो, वरना अभी यहीं से चली जाऊँगी।"विशाल टूट गया। उसकी गर्दन झुक गई। फिर उसने सब कुछ उगल दिया।
"हाँ… मैंने ही मारा उसे। अतुल और मैंने मिलकर मारा। क्योंकि… क्योंकि मुझे गुस्सा आता था।""किस बात का गुस्सा?""इस बात का कि वो तुम्हारे साथ रहता था!"
विशाल रोते-रोते चिल्लाया,
"मुझे लगा तुम दोनों के बीच कुछ चल रहा है। तुम हमें नज़रअंदाज़ करने लगी थी, उसके साथ घूमती थी, उसी में खोई रहती थी। मुझे जलन होती थी सोनाक्षी। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने उसे मारा और कॉलेज से निकलवाया, ताकि वो तुमसे दूर हो जाए।"फिर उसने बिना कुछ छोड़े सब बता दिया — कैसे उसने विष्णु को गाली दी, कैसे अतुल ने अपने घर की पहुँच का इस्तेमाल किया, और कैसे उन्होंने मिलकर एक मासूम लड़के की ज़िंदगी बिगाड़ दी।
सोनाक्षी सब सुनती रही। उसकी आँखों में आँसू आ गए, पर वे दुख के नहीं, गुस्से और नफ़रत के आँसू थे।"तुम्हें मेरा जवाब जानना है न, विशाल?"
उसने धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहा,
"तो सुनो। अगर तुमने आज ये हरकत न की होती… अगर तुमने अपनी ये घटिया सोच और ज़हर भरी जलन न दिखाई होती… और अगर तुमने इससे पहले आकर मुझे प्रपोज़ किया होता, तो मैं सौ प्रतिशत तुम्हें ‘हाँ’ कर देती।"विशाल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह अविश्वास से सोनाक्षी को देखने लगा।"हाँ विशाल," सोनाक्षी रोते हुए बोली,
"मुझे भी तुमसे प्यार था। बचपन से मैं भी तुम्हें चाहती थी। लेकिन आज…"उसने गुस्से में उसे धक्का दिया।
"आज तुमने साबित कर दिया कि तुम मेरे प्यार के क़ाबिल तो क्या, मेरी दोस्ती के भी लायक नहीं हो। तुमने अपने गंदे शक और ज़हर भरे दिमाग़ की वजह से एक मासूम इंसान को पीटा, उसकी पढ़ाई और इज़्ज़त से खेला।"वह यहीं नहीं रुकी, बोली,
"और रही बात अतुल की, जिसे तुम अपना सबसे बड़ा दोस्त कहते हो… क्या उसने तुम्हें कभी यह नहीं बताया कि मुझे भी तुमसे प्यार है? मैंने तो उसे पहले ही स्कूल में बता दिया था कि मुझे तुम पसंद हो।"सोनाक्षी दरवाज़े की तरफ़ मुड़ी, लेकिन जाने से पहले उसकी आख़िरी बात ने विशाल की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।"और रही बात विष्णु की… जिसके लिए तुमने ये सब किया…
वो तो मुझे अपनी बहन मानता था विशाल। उसकी कोई सगी बहन नहीं है, इसलिए वो मुझे अपनी दीदी समझता था और मैं उसे अपना भाई।
तुमने मेरे भाई को मारा है, विशाल… मेरे भाई को।"सोनाक्षी ज़ोर-ज़ोर से रोती हुई वहाँ से भाग गई।
और विशाल… वहीं खड़ा रह गया — खाली हाथ, खाली दिल, और पूरी ज़िंदगी भर के पछतावे के साथ।

कहानी जारी रहेगी…