REBIRTH OF MEHBUBA
यह कहानी है धोखे प्यार और बदले की जिसमें मोहब्बत एक दफा नहीं होती।
क्योंकि जो एक दफ़ा हो जाए, उसे मोहब्बत नहीं कहते।
और अगर किसी कहानी का अंत हो चुका हो, तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह अधूरी है—
कभी-कभी वह कहानी अपने अंजाम का इंतज़ार कर रही होती है।
मोहब्बत जिस्म से नहीं, रूह से की जाती है और रूहें…
कभी-कभी मरने के बाद भी ज़िंदा रहती हैं और रूहें अगर टूटी हुई हो तो कब्रें भी उन्हें क़ैद नहीं कर पातीं।
कहते हैं, भगवान चाहे तो क्या नहीं कर सकता— वह ज़िंदा को मौत दे सकता है और मरे हुए को फिर से साँसें भी।
लेकिन सोचिए…
अगर भगवान आपको इंसाफ़ या बदले के लिए एक नया जन्म दे दे,
क्या वही दिल फिर से धड़क पाएगा?
या धड़कनों में सिर्फ़ बदले की आवाज़ बचेगी?
यह कहानी साधारण नहीं है, यहाँ मौत भी आख़िरी सच नहीं, यह कहानी थोड़ी अजीब है।
जब तक आप इसे पूरा पढ़ेंगे नहीं, तब तक समझ नहीं पाएँगे।
और अगर समझ आ गई… तो क्या ही बात है।
तो आइए…
एक ऐसी दास्तान में उतरते हैं, जहाँ मोहब्बत, मौत और बदला एक ही साँस में जिए जाते हैं।
TRAILER
First Scene
“मैं तुमसे प्यार नहीं करता, रूप।
(रूप एक पल के लिए चुप हो जाती है और उसकी आँखें सामने खड़े लडके के चेहरे पर ठहर जाती हैं।)
“तो फिर… ये शादी ?”
वह बिना झिझक कहता है—
मैं स्नेहा से प्यार करता हूँ।
और मैं चाहता हूँ कि तुम… ख़ुद इस शादी से मना कर दो।”
(उसकी आवाज़ में न अफ़सोस था, न ही शर्म। था तो बस एक ठंडा सा फ़ैसला)
(रूप की ऑंखों में आंसू आ जाते है वह अपनी काँपती आवाज में कहती है) “अगर मैं मना न करूँ तो?”
“तो इस शादी के बाद तुम्हारी ज़िंदगी में जो कुछ भी होगा…
उसकी ज़िम्मेदार सिर्फ़ तुम खुद होगी।”
क्या रूप इस शादी से मना करेगी?
या यह शादी उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी क़ीमत बन जाएगी?
Second Scene
उसने आज लाल रंग की साडी पहनी हुई थी जिसमें शायद खून तो छिप गया था लेकिन उसका दर्द
उसकी आँखें बयां कर रही थीं।
शायद… उसकी आँखें बोलती थीं।
“बहुत ग़लत किया तुमने…”
“मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, कि तुम मेरे साथ ऐसा कर सकते हो।”
“मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया…
खुद को भूल गई…
और तुमने?”
उसकी आवाज़ चीख में बदल जाती है—
“तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया!
आख़िर क्यों…?” आख़िर क्यों
और उसकी एक जोरदार चीख़ निकल जाती है अब चारों तरफ सिर्फ़ ख़ामोशी फैल गई थी ।
Third Scene
अस्पताल का कमरा।
सफ़ेद रोशनी।
मशीनों से आती बीप बीप की आवाज़।
एक लड़की बेड पर लेटी है उसकी आँखें बंद थी ।
तभी दरवाज़ा खुलता है।
एक लड़का अंदर आता है,
(उसकी आँखों में ग़ुस्सा साफ झलक रहा था। उसने उस कमरे में फैले संनाटे को चीरती हुई अपनी कठोर आवाज़ में कहना शुरू किया)
“स्नेहा, आज तुमने हद पार कर दी।”
वह एक क़दम पास आता है—
“मेरा बस चले तो मैं तुम्हें अपने घर से नहीं, इस दुनिया से दूर फेंक दूँ।”
(लड़की कोई जवाब नहीं देती।)
“सिर्फ़ नानी की वजह से मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूँ। तो ये नाटक बंद करो और घर चलो… वरना—”
उसकी बात अधूरी रह जाती है।
कौन है यह इंसान
जो स्नेहा से इस तरह बात करता है?
और कौन है वह
जो उससे मोहब्बत करता है?
REBIRTH OF MEHBUBA part 1
कहते हैं, लड़कियाँ वो हीरा होती हैं—
जिसने पा लिया, समझो जीवन की सबसे बड़ी दौलत पा ली है।
लेकिन जब यही हीरा किसी को बहुत लंबे इंतज़ार के बाद मिले,
और वो हीरों में भी बेशकीमती हो…
तो वो हीरा नहीं, कोहिनूर बन जाता है।
बृजराज अधिकारी—
जिनके नाम में ही “अधिकारी” था।
कहने को दौलत उनके कदमों में थी,
पर फिर भी वो एक साधारण, अध्यात्म में विश्वास रखने वाले इंसान थे।
उनकी पत्नी, नीरजा— एक पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई औरत थीं।
हालाँकि उनके रहन-सहन को देखकर कोई यह अंदाज़ा नहीं लगा सकता था कि वे इतनी शिक्षित भी हैं।
फिर भी, उनके भीतर हर गुण था,
हर वो कमी पूरी थी… सिवाय एक— संतान की।
पर कहते हैं न, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।
देर से ही सही, पर अधिकारी परिवार के आँगन में आख़िरकार एक नन्ही परी ने जन्म लिया।
वो हीरा नहीं कोहिनूर थी।
बृजराज अधिकारी की आँखों का तारा—
जिस पर वे अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार थे।
आख़िर वो थी ही इतनी प्यारी, इतनी मासूम, कि अपने रूप से किसी का भी मन मोह ले।
शायद इसी वजह से अधिकारी साहब ने उसका नाम “रूप” रखा।
और वही नन्ही परी, अब रूप अधिकारी के नाम से जानी जाती है।
18 साल बाद
ये क्या हो रहा है आज इस घर में?
पूरा घर फूलों से सजा हुआ था।
हर कोना उजाले से नहाया हुआ— जैसे दीवारें भी मुस्कुरा रही हों
चारों तरफ़ सिर्फ़ और सिर्फ़ उजाला ही उजाला था।
चारों तरफ़ भाग-दौड़ थी,
सारे नौकर-चाकर अपने-अपने काम में लगे हुए थे।
लेकिन नीरजा जी को तो देखिए— कैसे परेशान हो रही थीं नीरजा जी की आँखों में हल्की चिंता साफ़ झलक रही थी।
हर बार उन्हें यही डर सता रहा है—“क्या सब समय पर ठीक से होगा?”
नीरजा जी अपने चारों तरफ़ देखती हैं और कहती हैं,
“अरे, जल्दी-जल्दी करो ना! आज रूप का जन्मदिन है, और आप लोग इतने आराम से काम कर रहे हैं।”
“श्यामू, ये फूल यहाँ क्या कर रहे हैं? उठाओ इन्हें , यहाँ से!”
“जी, मैडम।”
श्यामू तुरंत फूल उठाकर चला जाता है।
“उफ़्फ़, ममता!
कितनी बार कहा है तुमसे कि ये काँच के statues अच्छे से रखो।
अगर एक भी टूट गया, तो रूप का गुस्सा… तुम नहीं जानती क्या!
और हॉं जरा हाथ तेज चलाओ।”
कहते हुए नीरजा जी रसोई की ओर बढ़ जाती हैं।
(उनके दिल में हल्की बेचैनी और excitement के मिश्रित भाव थे)
तभी उनके कानों में एक बूढ़ी, स्नेहभरी आवाज़ पड़ी——
(नीरजा जी उस दिशा में मुडती हैं वो बूढी औरत नीरजा जी की सास व बृजराज जी की मां कल्याणी आधिकारी थी।)
“नीरजा, तू परेशान क्यों हो रही है?
एक पार्टी ही तो है, वो तो अक्सर ही होती रहती है।
फिर परेशान मत हो, सब मिलकर कर सारा काम कर देंगे, चिंता मत करो।”
नीरजा जी ने थोड़ी राहत की साँस ली, लेकिन फिर बोलीं—
“मा, वो बात नहीं है…
लेकिन पार्टी हमारे घर में पहली बार हो रही है न?
अधिकारी जी हमेशा बाहर ही करते थे,
और ऊपर से ये रूप के लिए पार्टी है, तो और ज्यादा टेंशन हो रही है।
आप तो जानती ही हैं ना, वो रूप के मामले में कैसे है, बस इसलिए।”
बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा—
“नीरजा, सब ठीक होगा।
लेकिन एक बात तो बताओ, हमारी कोहिनूर कहाँ है?
हमने सुबह से देखा ही नहीं। जिनके लिए ये सब सजाया जा रहा है, वो तो यहाँ ही नहीं।”
(नीरजा जी की आँखों में हल्की चिंता और प्यार दोनों झलक रहे थे)
“कितनी बार कहा है, इस लड़की से… ऐसे बिना बताए कहीं मत जाया करो।
अगर इनको पता लगा न तो बहुत डॉंटेगे आपकी कोहिनूर को भी और हमें भी।”
बूढ़ी औरत ने मुस्कुरा कर कहा—
“वो हमारी नन्ही चिड़िया है…
कहाँ तक रोक कर रखेगी, नीरजा?
थोड़ा रुककर, नरमी से आगे बोलीं—
आख़िर उसकी ही चाहत और चहक से तो इस घर का हर सवेरा खिलता है ख़ासकर हमारे बेटे का।”
नीरजा जी ने थोड़ी राहत की साँस ली, लेकिन आँखों में हल्की चिंता अभी भी थी।
उस मुस्कान में प्यार था, और उस प्यार में विश्वास—
कि रूप की मासूमियत और स्वतंत्रता ही
इस घर की खुशियों की वजह है लेकिन उसी प्यार के साथ
एक डर भी था— कहीं उनकी बेटी की इन खुशियों को किसी की नज़र न लग जाए…
वहीं दूसरी तरफ़ एक छत थी,
जो देखने में किसी महल की छत लग रही थी।
उस छत के चारों ओर दूर-दूर तक सिर्फ़ और सिर्फ़ पानी ही पानी नज़र आ रहा था।
वो छत बहुत बड़ी थी, और वहाँ से जाने के लिए बस एक पतला-सा रास्ता था।
छत पर तेज़ बारिश हो रही थी।
ऐसा लग रहा था जैसे बारिश का सारा पानी उसी छत से होकर नीचे जा रहा हो
और चारों तरफ़ फैल गया हो।
उसी पतले रास्ते से
एक लड़की सफेद कपडों में दौड़ती हुई आती है और छत के बिल्कुल बीचों-बीच आकर रुक जाती है।
वो अपने हाथ फैला देती है और बारिश का मज़ा लेने लगती है।
उस पूरी छत पर सिर्फ़ उसी लड़की की हँसी गूँज रही थी और उसके पैरों में बंधी पायल की हल्की-सी चमकती आवाज़।
तभी एक और लड़की वहाँ पहुँचती है और उसे चिल्लाकर कहती है— “रूप!
अगर ताऊजी को पता लग गया ना, तो हम मारे जाएँगे।
प्लीज़ चल ना… इधर बारिश में भीगना बंद कर।”
रूप बादलों की तरफ़ देखकर कहती है—
“ख़्वाहिशें बहुत हैं, मल्लिका की… उन्हें पूरा करना होगा आपको।”
फिर थोड़ी देर रुककर, थोडी तेज आवाज़ में बोलती है—
“और अगर पूरा नहीं कर पाए ना, तो हमें दूसरा जन्म दे देना… ताकि हम ख़ुद उन्हें पूरा कर सकें।
इस साल भी यही wish लेकर आई हूँ।”
निया हल्की मुस्कान के साथ कहती है—
“अरे, रूप! तेरा हो गया हो तो चलें?”
रूप—
“निया… बस थोड़ी देर और।”
निया झुँझलाकर कहती है— “ठीक है, यहीं रह और इन बादलों से मांगती रह अपनी wish।
कौन-सा ये पूरी करने वाले हैं।”
फिर चिढ़ाते हुए बोलती है—
“लेकिन जिसकी तू ख़्वाहिश रखती है ना, वो आज आने वाला है भूल गई क्या?”
रूप अचानक आँखें खोलती है—
“Bullet Proof Kalyan हो गया…
अरे! मैं तो भूल ही गई चल, जल्दी!”
वो दोनों उस महल के बाहर आ जाती है तभी
निया इशारा करते हुए कहती है—
“इस तरफ़ से नहीं जा सकते रोड वाले रास्ते से जाना पड़ेगा इधर बारिश की वजह से
पानी भर गया होगा। चल, जल्दी!”
दोनों रोड वाले रास्ते से भीगते हुए घर की तरफ़ जा रही थीं। बारिश अब भी थमी नहीं थी और कपड़ों से टपकता पानी उनकी चोरी-छिपे आई हुई शरारत की गवाही दे रहा था।
निया चलते-चलते कहती है—
“रूप,
एक बात बता…
तू हर साल अपने जन्मदिन पर इसी महल की छत पर आती है
और वही अजीब-सी wish मांगती है।”
आगे वह हल्की झुंझलाहट के साथ कहती हैं—
“और आज तो हद ही कर दी इतनी बारिश में भी इधर आ गई। अब देख…
भीगते-भीगते घर जाना पड़ रहा है ऊपर से चोरी से आई थी, तो पैदल ही जाना पड़ रहा है।”
रूप हल्का-सा मुस्कुराती है।
चलते-चलते अचानक रास्ते में गोल-सा घूम जाती है जैसे बारिश में उसे अपनी खुशी मिल रही हो।
वह हँसते हुए कहती है—
“पता नहीं क्यों, लेकिन मेरा दिल बार-बार यही मांगने को कहता है ना जाने क्यों…”
फिर निया की तरफ़ देखकर—
“और रही बात हर साल यहाँ आने की तो ये भी दिल कहता है, मेरा कोई कसूर नहीं है।”
निया सिर हिलाते हुए बोलती है—
“रूप, ये तेरा दिल है ना…पता नहीं तुझसे क्या-क्या करवाता हैं।”
फिर अचानक उसकी आँखों में शरारत आ जाती है—
“चल, वो छोड़। ये बता… वो दिखता कैसा होगा?”
रूप थोड़ी सोच में पड़कर कहती है— “उम्म… Science में diagram नहीं देखा क्या?”
निया आँखें घुमाते हुए—
“अरे मेरी माँ!
मैं उसकी नहीं, उसकी बात कर रही हूँ जिसे तू ख्वाइशों में मंगा करती है।”
फिर हल्के से चिढ़ाते हुए—
“वैसे बुलाया है क्या उसे आज की party में?
रूप की मुस्कान थोड़ी रुक जाती है।
धीमी-सी आवाज़ में कहती है— “हाँ… बुलाया तो है।”
फिर मन ही मन डरते हुए— “लेकिन… क्या वो आएगा?
आख़िर कौन है वो, जिसकी ख़्वाहिशें हमारी रूप हर साँस में करती है?
क्या होगा आज की उस पार्टी में— जहाँ मुस्कान के पीछे किसी अनकही बेचैनी की परछाईं छुपी है?
क्या वो इंसान आएगा, जिसका इंतज़ार रूप की धड़कनों ने सालों से कर रखा है?
या फिर…
ये भीगी हुई सड़क उसकी ज़िंदगी में कोई ऐसा मोड़ ले आएगी जहाँ से लौटना मुमकिन नहीं होगा?
क्योंकि कुछ मुलाक़ातें
दरवाज़ों से नहीं—
रास्तों से होती हैं…