कन्नड़ फिल्म 'Mark' (2025-2026) वर्तमान में भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक बनकर उभरी है। यह फिल्म न केवल दक्षिण भारत में, बल्कि पूरे देश में अपनी 'रॉ' और 'ग्रिटी' कहानी के कारण सुर्खियां बटोर रही है।
Mark: कन्नड़ सिनेमा की एक नई क्रांति - विस्तृत समीक्षा
1. भूमिका और विषयवस्तु
कन्नड़ फिल्म जगत, जिसे हम 'सैंडलवुड' के नाम से जानते हैं, पिछले कुछ वर्षों से अपनी कहानी कहने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। फिल्म 'Mark' इसी बदलाव की अगली कड़ी है। यह फिल्म एक Action-Psychological Thriller है, जो केवल मारपीट और चेज़ सीक्वेंस पर आधारित नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क के उन गहरे कोनों को टटोलती है जहाँ डर, पछतावा और प्रतिशोध का वास होता है।
2. कहानी का सारांश (The Plot)
फिल्म की कहानी 'मार्क' नाम के एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका एक रहस्यमयी और अंधेरा अतीत है। वह शहर की भीड़भाड़ से दूर एक शांत जीवन जीने की कोशिश कर रहा है, लेकिन समाज और उसका पुराना जीवन उसे चैन से जीने नहीं देता।
कहानी में मोड़ तब आता है जब एक ऐसी घटना घटती है जो मार्क के पुराने घावों को फिर से हरा कर देती है। फिल्म का शीर्षक 'Mark' दो अर्थों को दर्शाता है: पहला, वह शारीरिक निशान जो मुख्य कलाकार के शरीर पर है, और दूसरा, वह मानसिक 'दाग' जो समाज एक अपराधी या एक टूटे हुए इंसान पर लगा देता है। पूरी फिल्म इस संघर्ष की यात्रा है कि क्या वह खुद को इन दागों से मुक्त कर पाएगा?
3. अभिनय का पक्ष (Performances)
- मुख्य कलाकार (The Lead): फिल्म के हीरो ने 'मार्क' के किरदार में जान फूंक दी है। उनकी परफॉरमेंस में एक ठहराव है। वे चिल्लाते कम हैं और अपनी आँखों से दर्द और क्रोध को अधिक व्यक्त करते हैं। फिल्म के फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए उनकी मेहनत साफ दिखती है।
- खलनायक (The Antagonist): इस फिल्म का विलेन कोई साधारण अपराधी नहीं है। वह एक 'मैनिपुलेटर' है। नायक और खलनायक के बीच का टकराव केवल शारीरिक नहीं, बल्कि वैचारिक और मानसिक है।
- सहायक पात्र: फिल्म के अन्य कलाकारों ने भी कहानी के तनाव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषकर मार्क की मां या करीबी दोस्त के रूप में दिखाए गए किरदारों ने फिल्म में भावनात्मक गहराई जोड़ी है।
4. निर्देशन और पटकथा (Direction and Screenplay)
निर्देशक ने फिल्म की गति (Pacing) पर बहुत सूक्ष्मता से काम किया है। फिल्म 'Slow-burn' शैली में शुरू होती है, जिससे दर्शक धीरे-धीरे किरदार की दुनिया में डूब जाते हैं। मध्यांतर (Interval) तक आते-आते फिल्म की गति तेज हो जाती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते यह एक हाई-ऑक्टेन थ्रिलर में बदल जाती है। स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह दर्शकों को अंदाज़ा लगाने पर मजबूर करता है कि अगला कदम क्या होगा।
5. तकनीकी उत्कृष्टता (Technical Brilliance)
- छायांकन (Cinematography): फिल्म के विजुअल्स बहुत ही 'मूडी' और 'डार्क' हैं। लाइट और शैडो का उपयोग मार्क की मानसिक स्थिति को दर्शाने के लिए किया गया है। बेंगलुरु के शहरी दृश्यों को जिस तरह से फिल्माया गया है, वह इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्मों के समकक्ष खड़ा करता है।
- संग्रह संगीत (BGM): फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक इसकी आत्मा है। बिना संवाद वाले दृश्यों में संगीत ही कहानी कहता है। सन्नाटे का उपयोग और फिर अचानक उठने वाला संगीत दिल की धड़कनें बढ़ा देता है।
- संपादन (Editing): फिल्म की लंबाई लगभग 150 मिनट है, लेकिन संपादन इतना चुस्त है कि कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होती।
6. फिल्म के गहरे अर्थ (Themes and Symbolism)
'Mark' केवल एक मनोरंजन मात्र नहीं है, यह कई गंभीर विषयों को छूती है:
* रेडेम्पशन (प्रायश्चित): क्या कोई व्यक्ति अपने पुराने पापों को धो सकता है?
* सामाजिक न्याय: क्या हमारा कानून वास्तव में न्याय करता है या यह केवल शक्तिशाली लोगों का हथियार है?
* अकेलापन: महानगरीय जीवन में एक व्यक्ति का अकेलापन उसे कैसे हिंसक बना सकता है।
7. कमियां (The Cons)
फिल्म में बहुत अधिक हिंसा दिखाई गई है, जो शायद हर वर्ग के दर्शकों (खासकर बच्चों और कमजोर दिल वालों) के लिए उपयुक्त न हो। कुछ दृश्यों में 'सिनेमैटिक लिबर्टी' ली गई है जो वास्तविकता से थोड़ी दूर लगती है, लेकिन एक थ्रिलर फिल्म के नाते इसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
8. अंतिम निष्कर्ष (The Verdict)
'Mark' एक ऐसी फिल्म है जिसे देखने के बाद आप उसे भूल नहीं पाएंगे। यह कन्नड़ सिनेमा के बढ़ते कद का प्रमाण है। यदि आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जिनमें गहराई हो, बेहतरीन अभिनय हो और जो आपको अंत तक बांधे रखे, तो यह फिल्म आपको बिल्कुल मिस नहीं करनी चाहिए।
रेटिंग: 4.5/5