samarpan se aange - 6 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | समर्पण से आंगे - 6

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समर्पण से आंगे - 6


‎भाग – 6
‎सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी,
‎लेकिन घर के अंदर एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था।
‎अंकित सामने खड़ा था।
‎सृष्टि उसके पीछे—थोड़ी दूरी पर,
‎जैसे हर कदम सोच-समझकर रख रही हो।
‎माँ कुर्सी पर बैठी थीं।
‎उनकी आँखों में आज डर कम और थकान ज़्यादा थी।
‎उन्होंने सृष्टि से कहा।
‎“आ जाओ,”
‎सृष्टि ने कदम बढ़ाए।
‎हाथ काँप रहे थे,
‎आँखें झुकी हुई थीं।
‎यह वही घर था
‎जहाँ से उसका भविष्य तय होने वाला था—
‎बिना उसकी मर्ज़ी के भी।
‎माँ ने उसे ध्यान से देखा।
‎“तुम्हारा नाम?”
‎“सृष्टि।”
‎“उम्र?”
‎“सत्ताइस।”
‎माँ ने गहरी साँस ली।
‎इतनी कम उम्र…
‎इतना बड़ा बोझ।
‎उन्होंने दोबारा कहा।
‎“बैठो,”
‎सृष्टि बैठ गई,
‎लेकिन दिल खड़ा ही रहा।
‎कुछ पल तक कोई नहीं बोला।
‎फिर माँ ने वह सवाल पूछा
‎जिससे सृष्टि सबसे ज़्यादा डरती थी—
‎“तुम मेरे बेटे से क्या रिश्ता चाहती हो?”
‎सृष्टि ने सिर उठा लिया।
‎पहली बार उसकी आँखों में डर से ज़्यादा सच था।
‎“कोई रिश्ता नहीं,”
‎वह साफ़ बोली,
‎“मैं बस…
‎ज़िंदा रहना चाहती हूँ।
‎सम्मान के साथ।”
‎कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
‎माँ ने अंकित की तरफ़ देखा।
‎उन्होंने पूछा।“और तू?”
‎अंकित ने बिना रुके कहा—
‎“मैं उसका सहारा बनना चाहता हूँ।
‎जैसे पापा के बाद
‎मैं आपका बना।”
‎माँ की आँखें भर आईं।
‎उन्होंने धीरे से कहा।
‎“लेकिन समाज?”
‎अंकित चुप रहा।
‎तभी बाहर से आवाज़ें आने लगीं।
‎गली में लोग जमा हो रहे थे।
‎“आज फैसला होगा…”
‎“बहुत हो गया…”
‎“इज़्ज़त का सवाल है…”
‎सृष्टि डर  गई।
‎वह उठते हुए बोली,
‎“मैं चली जाती हूँ,”
‎“अब भी वक़्त है।”
‎माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
‎सृष्टि चौंक गई।
‎“नहीं,”
‎माँ ने दृढ़ आवाज़ में कहा,
‎“आज कोई नहीं जाएगा।”
‎यह पहली बार था
‎जब माँ की आवाज़ में डर नहीं,
‎फ़ैसला था।
‎वे बाहर निकलीं।
‎अंकित और सृष्टि पीछे-पीछे।
‎आँगन में
‎गाँव के कुछ लोग,
‎मंदिर समिति के सदस्य,
‎और पड़ोसी खड़े थे।
‎एक आदमी आगे आया,
‎“बहन जी,”
‎“हम समझाने आए हैं।
‎आपके बेटे की वजह से
‎पूरा माहौल खराब हो रहा है।”
‎माँ ने उसकी आँखों में देखा।
‎उन्होंने पूछा,
‎“माहौल?”
‎“या आपकी सोच?”
‎लोग चुप हो गए।
‎माँ बोलीं,
‎“एक सवाल है मेरा,”
‎“अगर यह लड़का किसी कुंवारी लड़की के साथ खड़ा होता,
‎तो क्या आप यहाँ आते?”
‎कोई जवाब नहीं।
‎ मां ने कहा 
‎“तो फिर समस्या उसकी विधवा होना है,”
‎“या उसका औरत होना?”
‎भीड़ असहज हो गई।
‎किसी ने कहा।
‎  मां जी 
‎“समाज के नियम होते हैं,”
‎माँ बोलीं,
‎“समाज इंसानों से बनता है,”
‎“और इंसान अगर पत्थर दिल हो जाए,
‎तो नियम भी ज़ालिम हो जाते हैं।”
‎सृष्टि की आँखों से आँसू बहने लगे।
‎उसे पहली बार लगा—
‎कोई उसके लिए लड़ रहा है,
‎बिना बदले में कुछ माँगे।
‎माँ ने सृष्टि की तरफ़ इशारा किया,
‎“यह औरत,”
‎“कोई गुनहगार नहीं है।
‎अगर उसका अकेलापन आपको खटकता है,
‎तो यह आपकी कमजोरी है, उसकी नहीं।”
‎भीड़ में खुसर-पुसर हुई।
‎कुछ लोग पीछे हटने लगे।
‎लेकिन हर लड़ाई इतनी आसानी से खत्म नहीं होती।
‎एक आदमी चिल्लाया—
‎“तो क्या आप इस रिश्ते को मंज़ूरी देती हैं?”
‎माँ कुछ पल चुप रहीं।
‎फिर उन्होंने कहा—
‎“मैं किसी रिश्ते की नहीं,
‎इंसानियत की मंज़ूरी देती हूँ।”
‎यह जवाब
‎न हाँ था,
‎न ना—
‎लेकिन समाज के लिए
‎सबसे खतरनाक था।
‎उस दिन कोई फैसला नहीं हुआ।
‎लेकिन एक बात तय हो गई—
‎अब यह कहानी
‎छुपकर नहीं चलेगी।
‎शाम को सृष्टि अकेली बैठी थी।
‎अंकित पास आया।
‎“डर लग रहा है?”
‎उसने पूछा।
‎सृष्टि ने सिर हिलाया।
‎“लेकिन आज,”
‎वह बोली,
‎“मैं पहली बार टूटी नहीं।”
‎अंकित मुस्कुराया।
‎“क्योंकि आज तुम अकेली नहीं थीं।”
‎माँ दूर से उन्हें देख रही थीं।
‎उनके मन में एक ही सवाल था—
‎क्या वह समाज से लड़ पाएँगी?
‎या फिर
‎यह लड़ाई उनके बेटे को उनसे छीन लेगी?
‎क्योंकि हर सही फैसला
‎सबसे भारी कीमत माँगता है।
‎भाग–7 में कहानी और गहरी होगी, जहाँ
‎समाज का दबाव
‎कानून, बदनामी और बहिष्कार का रूप लेगा।
‎इस भाग में सामने आएगा—
‎सृष्टि पर लगाया जाने वाला झूठा आरोप
‎अंकित की नौकरी पर मंडराता खतरा
‎और माँ का वह सबसे कठिन फैसला
‎क्या वह अपने बेटे की ज़िंदगी बचाने के लिए
‎सृष्टि को दूर जाने को कहेंगी?
‎   जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।
             ‎BY ..............Vikram Kori..