Manzile - 4 in Hindi Love Stories by Muskurahat books and stories PDF | मंजिल - पथक और राही - 4

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मंजिल - पथक और राही - 4

अक्सर कहानी का आगे चैप्टर जानने के लिए, कहानी के पन्नो को पलट के देखना चाहिए कोई नया इंटरस्टिंग चैप्टर सामने होता है , जिंदगी की कहानी भी कुछ इस तरह से ही होती है, नए मोड़ नए किस्सो भरी कहानी, अगर कहानी में कुछ ऐसा हो जाता है जिसे के दुख तो पन्ना पलट के आगे की कहानी पढ़ना, और जिंदगी में भी कुछ इसी तरह से होता जिदंगी के कुछ दिन ऐसे होते है जहां हमे ऐसा लगता है के, जिंदगी खत्म हो जाए तो अच्छा, पर दूसरा दिन जिंदगी का एक नया दिन होता है, जिनसे शायद ही जिंदगी का आने वाला कल एक बहुत ही खुशी भरा हो, जैसे पन्ना पलट देने से कहानी का पता चलता है, उसी तरह से जिंदगी का अगला दिन नई उम्मीद ला सकता है, इसी उम्मीद का अगला भाग

                        चौथा भाग
सब हैरान हो गए के कुछ देर पहले राही, का नाम लेकर पूरे घर में ढूंढ रहा था अचानक ऐसा क्या हो गया? के वो इसे तैयार हो कर आया है.. 

आखिर उस खत को ले जाने के बाद ही ऐसा हुआ है, आखिर क्या था उस खत में, राही ने क्या लिखा था उसमें....
राही आखिर कहां गई?

कौनसी बात थी जो पथक का मन तो नाच रहा था पर दिल अभी भी राही को हो ढूंढ रहा था, फिर वो ऐसा क्यों कर रहा था?

बर्थडे पार्टी खत्म हो चुकी थी, पथक ने सबको पार्टी में आने के लिए और पार्टी का हिस्सा बनने के लिए शुक्रिया किया, सबका खाना हो चुका था, धीरे–धीरे सब लोग पथक को पार्टी में बुलाने के लिए थैंक्स कह कर और उसको बर्थडे विश करके पार्टी से जाने लगे थे, धीरे–धीरे पूरा घर शांत हो गया, सब अपने अपने घर चले गए, आहना, दित्या और हीया भी अपने घर लौट के लिए निकल रहे थे, तभी पथक ने उन्हें रोक लिया...

पथक: आहना, रात बहुत हो चुकी है, तुम तीनो यही पर रुक जाओ सुबह चले जाना
आहना : पर पथक राही को अच्छा नही लगेगा!

पथक: अगर मैने अभी तुम लोगो को यहां से जाने को कहा तो ये राही को अच्छा नहीं लगेगा, तुम तो राही को जानती हो, उसको पहेचानती हो,

आहना: हां, जानती उसे, ठीक है हम गेस्ट रूम में चले जाते है,
आहना, दित्या, और हीया तीनो गेस्ट रूम में चले जाते है...
और पथक अपने कमरे में चले जाता है,
फ्रेश होने के बाद वो आहना, हीया और दित्या को देखने जाता है,
उन्हें सुकून से सोता देख उसको सुकून मिलता है,
और वो वापस अपने कमरे मैं चला जाता है,

वो गहरी सोच में चला जाता है राही के बिना उसकी आंखों से जैसे निंद ही उड़ गई,
वो बस राही के बारे में ही सोच रहा था, और राही का खत अपने गले से लगा के उसकी ख्यालों में डूब गया, वो राही के बारे में सोच के उसे डर भी लग रहा था, 
आखिर किस बात का डर,?
क्या था जो पथक को डरा रहा था और राही का तो अभी तक कुछ पता नहीं चला तो पथक क्यू ऐसे ही हाथ पर हाथ धरे बैठा था, और वो खत उस खत में क्या था???बस इन्ही बातो को आगे बढ़ाते कहानी अगले भाग में 
                                       To be continued.......