शाम के ठीक 6 बज रहे थे। बाहर बारिश की हल्की बूंदें गिर रही थीं, वैसी ही जैसी किसी पुराने ज़ख्म पर नमक गिरता है। कैफे का दरवाज़ा खुला और एक लड़की अंदर आकर कोने वाली मेज पर बैठ गई। उसने अपने लंबे बालों को उंगलियों से संवारा—उसकी वो एक हरकत ऐसी थी जैसे रुकी हुई फिल्म
अचानक चलने लगी हो।
वह दीवारों पर लगी ड्राइंग्स को ऐसे देख रही थी जैसे उनमें कोई राज छुपा हो। फिर उसने आवाज़ दी, "वेटर!"
कार्तिक वहीं पास खड़ा था। वह ऑर्डर लेने बढ़ा, पर उस लड़की के चेहरे को देखते ही उसके कदम जम गए। कार्तिक ने उसे पहले कभी नहीं देखा था,
वह इस शहर के लिए, इस कैफे के लिए और कार्तिक की वीरान ज़िंदगी के लिए एकदम नई थी। उसे देखते हुए कार्तिक को ऐसा लगा जैसे वह किसी और ही दुनिया का हिस्सा है। वह उसे बस देखता रहा, अपना काम, अपनी औकात सब भूलकर।
लड़की ने बिना ऊपर देखे ठंडी आवाज़ में कहा, "एक कप कॉफी।"
कार्तिक की पलकें तक नहीं झपकीं। लड़की ने दोबारा, इस बार थोड़ी चिढ़कर कहा, "एक कप कॉफी!"
तभी किचन के सन्नाटे को चीरती हुई पापा की आवाज़ आई, "कार्तिक! अंदर आ!"
कार्तिक जैसे किसी सपने से झटके से बाहर आया। वह हड़बड़ाया और बोला, "जी... जी मैम, एक कप कॉफी।"
वह किचन में गया, धड़कता दिल लेकर कॉफी बनाई और वापस टेबल पर पहुँचा। कॉफी रखते वक्त उसकी नज़र लड़की की आँखों में धंस गई। वह आँखें हरी (Green) थीं—गहरी और रहस्यमयी। कार्तिक के अंदर कुछ टूटा, उसने धीरे से पूछा, "मैम, क्या आपकी आँखें बचपन से ही ऐसी हैं या... ये कोई लेंस है?"
लड़की ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर देखा, होंठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसे समझना मुश्किल था। उसने कार्तिक के सीने पर लगे नाम को पढ़ा और पूछा, "तुम्हारा नाम कार्तिक है?"
कार्तिक की आवाज़ फंस गई, "जी मैम।"
लड़की ने नज़र हटाई और कहा, "ठीक है, बाकी ऑर्डर भी ले आओ।"
कार्तिक मुड़ने ही वाला था कि सामने उसके बाप की नफरत भरी आँखें थीं। कार्तिक ने खुद को बचाने के लिए कहा, "सॉरी पापा, सो गया था इसलिए लेट हो गया।"
बाप ने सरेआम तमाचा जड़ा, लफ़्ज़ों का— "सो गया था या पीकर पड़ा था? दारू पीने वाले कुत्ते कभी नहीं सुधरते।"
कार्तिक की आँखों में आँसू नहीं आए, उसकी आँखें गुस्से से जलने लगीं। वह अपने बाप को उसी ज़हरीली नज़रों से देखने लगा। तभी छत से पानी की एक गंदी बूंद उसके कंधे पर गिरी और उसकी शर्ट पर फैल गई। पापा चिल्लाए, "छत क्यों नहीं ठीक करवाई अब तक? सारा दिन बस नशा और आवारागर्दी... कामचोर कहीं का!"
कार्तिक चुप रहा, पर उसके अंदर एक तूफ़ान उठ गया। उस टपकती छत और बाप की गालियों के बीच उसे अहसास हुआ कि— इस दुनिया में अगर आपकी जेब और हाथ खाली हैं, तो आपके अपने भी आपके सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं।
Ek cup coffee
अध्याय 2: अपमान और अंगारे
Next part ke liye ready ho please comment and like and support me 🙂💔 ye ek love you hai ya psychology book padhe mere sath you a