Shrapit ek Prem Kahaani - 30 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 30

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 30

एकांश को वर्शाली की याद आती है। वो सौच रहा होता है---

" कास में यह वर्षाली को ला पता तो चल जाता के 
चलचित्र क्या होता है। एकांश इतना सौच ही रहा था कि तभी उसे वहां अपनी राइट साइड की सीट पर जो खाली थी वहां पर किसी लड़की के होने का एहसास होता है।

एकांश धीरे से अपनी राइट साइड में देखता है तो वो हैरान हो जाता है। तो वहां और कोई नहीं बल्की वर्शाली थी। एकांश वर्षाली को देखकर एकदम हैरान रह जाता है। वर्शाली एकांश को देख कर हल्की मुस्कान देती है। एकांश वर्शाली को देख कर घबरा जाता है के कहीं वृंदा वर्शाली को ना देख ले। 


एकांश ये सौच रहा था की वर्शाली को कैसै पता चला के मेैं यहां हूँ । एकांश के एक तरफ वृंदा थी तो दुसरी तरफ वर्शाली । वर्शाली एकांश में कान में धीरे से कहती है----


>" क्या सोच रहे हैं एकांश जी के मैं के यहां कैसी आई।


 वर्शाली एक मुस्कान देकर कहती है। आपने मुझे दिल से याद किया और मैं आ गई। अब बोलिए आपने मुझे इतने लोगो के बिच क्यों याद किया ?


 इतना बोलकर वर्शाली एकांश का एक हाथ पकड़ लेती है। एकांश वर्शाली से कुछ नहीं कह पाता क्योंकी वहा वृंदा थी। तब एकांश वर्शाली के कान में धीरे से कहता है----


>" इसे ही मुवी मतलब चलचित्र कहते है'। मैं तुम्हें इसे ही देखने के लिए बोल रहा था। 

वर्षाली कहती है--

>" पर आप तो कह रहे के समय आने पर ले जाउंगा पर आपने तो किसी और को लेकर आ गए। 


एकांश चुप हो जाता है और वर्शाली कहती है --

>" इसे देखने के लिए इतने सारे लोग बैठे है एकांश जी ।


इतना बोलकर सभी मुवी देखने लगते हैं। कुछ दैर बाद मुवी में एक अंतरंग दृश्य सुरु हो जाता है। जिसे दैखकर वृंदा और वर्शाली सरमाने लगती है ये दृश्य कफी देर तक चलता है।


 ये अंतर दृश्य इतनी कामातुर थी के जिसे देखते देखते वर्शाली और वृंदा दोनो ही काम से उत्तेजित हो जाती है और दोनो वह एकांश को सहलाने लगती है। वृंदा अंतरंग दृश्य को देख कर एकांश का हाथ पकड़ लेती है तो दुसरी और वर्शाली एकांश के कान में कहती है---

>" एकांश जी क्या ऐसे कामसुख करने वाले दृश्य को 
चलचित्र कहते हैं और आप मुझे ये सब दिखाना चाहते हैं।


 वर्शाली की बात का एकांश कोई जवाब नहीं देता है। दोनो के छुने से एकांश भी उत्तेजित होने लगता है। पर उसे ये समझ में नहीं आता के वो किस के साथ क्या करे। पर दोनो ने एकांश के बदन को छुना सुरु कर दिया था औौर एकांश अपने सब्र से बहार जा चुका था। 


वृंदा और वर्शाली भीं एकांश की भावनाओं को भांप लेती है जिससे वृंदा और वर्शाली दोनो ही कामुक होने लगती है और एकांश को सहलाने लगती है। वृंदा और वर्शाली दोनो ने ही एकांश के हाथ को अपने कमर पर के बीच मे रख देती है।

 एकांश दोनो के कमर को छुकर सहमजाता है । वृंदा और वर्शाली दोनो ही गरम गरम सांसे छोड़ने लगी थी दोनो की सांस बहुत तेज हो चुकी थी। एकांश का दौनो हाथ अब धीरे-धीरे वृंदा के वक्ष की और बढ़ता है एकांश का हाथ अब वृंदा के वक्ष के उपर था जिसे वृंदा उत्तेजना से एकांश के हाथ को अपने वक्ष पर फेरने लगती है।


 वर्शाली भी काम से उत्तेजीत हो जाती है और एकांश के वक्ष को छुने लगती है वर्शाली के छुने एकांश का बदन उत्तेजीत हो जाता है और एकांश अपना एक हाथ वर्षाली के वक्ष को सहलाने लगता है जिससे वर्शाली बेकाबु हो जाती है और एकांश के कान में कहती है ----


>" एकांश जी ये आप क्या कर रहे हो , मुझे कुछ कुछ हो रहा है पर एकांश जी यहां नहीं ।

 तभी इंटरवाल हो जाता है और वहा पर थिएटर में लाईट्स ऑन हो जाति है। एकांश अपना दोनो हाथ वर्शाली और वृंदा के वक्ष से हटा लेता है। तीनो बिना एक दुसरे को देखे चुप चाप बैठे रहते है। 

पर एकांश को डर था के रोशनी आने के कारण से वृंदा कहीं वर्शाली को ना देख ले। तबी वृंदा अपनी सीट से उठ जाती है और एकांश से कहती है---

>" एकांश तुम यही रुको में वॉश रूम से आती हूं। 


वृंदा इतना बोलकर वहा से वॉशरूम चली जाती है। एकांश को हैरानी होता है--


>" के वृंदा ने वर्शाली को नहीं देखी।


एकांश जब अपने राइट साइड में देखता है तो वो हैरान रह जाता है। वहां पर वर्षाली नहीं थी। एकांश सौच में पड़ जाता है के वर्षाली ऐसे अचानक कहां गायब हो गई।


 तभी एकांश के कान में वर्शाली की आवाज आती है---

>" आप किसे ढुंढ रहे हो एकांश जी ?


 एकांश देखता है के वहां पर वर्शाली बैठी थी। एकांश ये सब देख एकर हैरान हो जाता है। एकांश कुछ कहता है उससे पहले वर्शाली पुछती है---


>" ये वही स्त्री है ना एकांश जी जो उस रात को आपके साथ थी।


 एकांश हां में अपना सर हिलाता है। वर्शाली एकांश से फिर पुछती है--

>" एकांश जी क्या आप इस स्त्री से प्रेम करते हो। 

एकांश कहता है--

>" ऐसी कोई बात नहीं है वर्शाली। ये मेरी दोस्त है। 


वर्शाली कहती है---


>" आपने ही तो कहा था के एक स्त्री और पुरुष कभी 
मित्र नहीं बन सकते। तो इसका अर्थ ये हुआ ना के आपकी प्रेमिका है।


 एकांश कहता है--- 

>" ऐसा नहीं है। वृंदा मुझे अच्छी लगती है पर.... 


एकांश इतना बोलकर चुप हो जाता है। वर्शाली कहती है---

>" पर क्या एकांश जी । क्या आपको कोई और स्त्री अच्छी लगती है। 


एकांश वर्शाली के आंखों में दैखकर कहता है---

>" तुम भी मुझे बहुत अच्छी लगती हो वर्शाली । 


एकांश से इतना सुनकर वर्शाली सरमाने लगती है और कहती है--

>" एकांश जी क्या यही चलचित्र है ?


 एकांश कहता है---

>" हां वर्शाली इसे ही चलचित्र कहते हैं। वर्शाली कहती है---

>" इस तरह दृश्य को आप चलचित्र कहते हो। अगर मैं कुछ दैर और यहां रुकी तो पता नहीं है इस चलचित्र के कारण मैं आपके साथ क्या कर बैठूं और मेै तो आपके हाथ को भी नहीं रोक पाई । 


एकांश सरमाने लगता है और अपनी नजर झुका के वर्शाली से कहता है--

>" वो वर्शाली मुझे भी पता नही क्या हो गया था ....

वर्शाली एकांश के बात को काटते हुए कहती है---

>" एकांश जी भूल सिर्फ आपसे नहीं मुझसे भी हुई है मैं भी आपको नहीं रोका। पता नही आपके साथ रहने के बाद मुझे मुझे क्या हो जाता है। इसीलिए एकांश जी अब मुझे जाना होगा। क्योंकी अगर मैं आपके साथ यहाँ रुकी तो वृंदा को पता चल जाएगा और मैं स्वयं को नहीं रोक पाउंगी इसिलिए अब मुझे जाना होगा।

To be continue.....444