Shrapit ek Prem Kahaani - 31 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 31

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 31

वर्शाली एकांश के बात को काटते हुए कहती है---

>" एकांश जी भूल सिर्फ आपसे नहीं मुझसे भी हुई है मैं भी आपको नहीं रोका। पता नही आपके साथ रहने के बाद मुझे मुझे क्या हो जाता है। इसीलिए एकांश जी अब मुझे जाना होगा। क्योंकी अगर मैं आपके साथ यहाँ रुकी तो वृंदा को पता चल जाएगा और मैं स्वयं को नहीं रोक पाउंगी इसिलिए अब मुझे जाना होगा। 


एकांश वर्शाली को जाने देना नहीं चाहता है। पर एकांश वर्शाली के बारे में सोचकर उसे करें जाने देता है। और वर्शाली वहां से गयाब हो जाती है। तभी वृंदा वॉशरूम से वापस आ जाती है। और चुपचाप बैठ जाती है। वृंदा सरमाते हुए अपनी बालों को संवारने लगती है। एकांश वृंदा से कहता है--

>" वृंदा वो मुझे माफ करना मैं बहक गया था इसीलिए मेैें तुम्हारी... 


एकांश के इतना कहने पर वृंदा अपना हाथ एकांश के होठ में रख देता है और कहता है--


>" तुम माफ़ी क्यों मांग रहे हो। मैंने भी तो तुम्हें रोका नहीं। 


वृंदा धीरे से एकांश से कहती है---

>" तुम्हारा छुना मुझे अच्छा लग रहा था एकांश। इसिलिए मैंने भी तुम्हें नही रोका । 


एकांश वृंदा की बात चुपचाप सुन रहा था। वृंदा कहती है--

>" अब ऐसे चुप ही रहेंगे क्या।

 तब एकांश वृंदा से कहता है--

>" अब चलें वर्ना रोमांटिक फिल्म है के कारण कहीं हम फिर से बहक ना जाए और कुछ कर ना बैठे । 

एकांश की बात सुनकर वृंदा मस्कुराते हुए कहती हैं--

>" वाह एकांश जो बात मुझे करनी चाहिए थी वो तुम कह रहे हो। तुम्हारे मुह से ऐसे बात सुनकर मुझे 
आश्चर्य हो रहा है पर अब मुझे लग रहा है के मेैं एक अच्छे इंसान में साथ आयीं हूं। वर्ना तुम्हारे जगह कोई और होता तो यहाँ से जाने के बजाए मेरे साथ वो सब करने के बारे में सौचता। 


इतना बोलकर दोनो वहां से निकल जाता है। रास्ते मे एकांश को फिर से वही लड़की दिखाई देती है जो एकांश को कुछ समय पहले दिखा था ।

वो लड़की एकांश की और बड़ी मासुमियत के साथ दैख रही थी । एकांश तुरंत अपना बाईक रोकता है और उतर कर देखने लगता है पर एकांश दैखता है के अब वहां पर कोई नही था ।

वृदां कहती है --

>" क्या बात है एकांश । तुम यहां क्यों रुक गए । ( मन ही मन सोचती है ) कही एकांश मेरे साथ वो सब करना तो नही चाहते । जगह तो अच्छी है पर थोड़ी डरावनी है ।


एकांश चुप था तो वृदां फिर से पूछती है ---

>" क्या हूआ एकांश ?


एकांश कहता है --

>" कुछ नही वो मुझे लगा के शायद यहां पर कोई था ।

इतना बोलकर दोनो वहां से चला जाता है ।


रात के 1 बज रहा था , एकांश अपने कमरे मे सो रहा था तभी एकांश को एक लड़की जो बहोत परेशान है कहती है --

>" एकांश , मेरे एकांश, मुझे बचालो , मुझे मुक्त कराओ । बहोत वर्ष से तड़प रही हूँ , मैं तो आपके लिए आयी थी । पर दैखिए अब मुझे क्या हो गया है , ना मैं आपसे मिल पा रही हूँ और ना आपके साथ हूँ । एक आप ही हो मेरे , जो मुझे मुक्त करा सकता है , आओ ना मेरे एकांश ।

एकांश सपने मे दैखता है के एक खुबसूरत लड़की जिसके चारो और आग ही आग है और वो वहां से निकलने की कोशिश कर रही है , पर निकल नही पा रही है । 


तभी एकांश का निंद खुल जाता है और वो उठकर बैठ जाता है , एकांश अपने कमरे के चारो और दैखता है पर वहां पर कोई नही था । एकांश को ये अजीब लग रहा था , वो मन ही मन सौचता है ---


>" रास्ते पर वो लड़की दिखाई देना और फिर अब सपने मे वही लड़की । क्या सच मे किसीको मेरी मदद की जरुरत है ?


 दुसरे दिन सुबह का समय था। राजनगर में आलोक अपने कमरे में सो रहा था। दक्षराज दयाल से आलोक के बारे में पुछता है---


>" दयाल आलोक उठा के नहीं ?


 दयाल कहता है----


>" नहीं मलिक अभी तक आलोक बाबा नहीं उठे हैं। 
आप कहो तो मैं उन्हे उठा दूं। 


दक्षराज दयाल को मना करता है और कहता है---


>" नहीं दयाल तुम रहने दो मेैं जा कर उससे उठाता हूं। और कल मैने तुमसे वो रक्षा कवच को दैखने के लिए भेजा था तुमने बताया नही उसके बारे में । 


दयाल अपनी नजरे निचे करके कहता है----


>" वो मालिक कल मेला मे दैर हो गया था ।

दक्षराज दयाल से गुस्सा होकर कहता है ---


>" वाह मेला जरुरी है या गांव की रक्षा , अगर रक्षा कवच रहा तो बहुत मेले आएगें पर अगर वही नही रहा तो ? 


दयाल कहता है--- 


>" माफ कर दिजिये मालीक मैं आज ही वहां से होकर 
आऊगां।  


इतना बोलकर दक्षराज अपने जगह से उठता है के तभी आलोक अपने मुह में ब्रश लिए वहां पर आता है। आलोक दक्षराज को देखकर वहीं रुक जाता है। दक्षराज आलोक को देखकर कहता है---


>" बेटा कल अगर तुम घर पर रहते तो अच्छा होता। 
क्योंकी कुछ गांव वाले हवेली में आए थे और तुम तो जानते हो के मेरी तबियत अच्छी नहीं है इसिलिए मैंने उनसे कहा दिया के तुम कल उनसे मिलने जाओगे। 


आलोक हैरानी से पुछता है---


>" गांव वाले आए पर क्यों पड़े पापा और मैं उनसे मिलकर क्या करू?

 दक्षराज कहता है---


>" तुम भूल गए क्या बेटा के गांव में मेला लगा है और ये मेला दौ दिन और चलेंगी इसिलिए गांव वाले यहांं आए थे क्योंकी हर साल मेला का उदघाट्न मेैं करता हूं पर इस बार मेरी तबियत ठीक नहीं है इसिलिए मैने पहले ही उन तक ये बात पँहूचा दिया था। पर कल उन्होन आकार बताया के कुछ दिन से गांव के जानवर गयाब हो रहे हैं और सबसे गंभीर बात ये है के मेला के दुसरे दिन ही उन सभी गयाब हुए जनवारो के कंकाल मेला में एक जग इक्कठा मिला ।। इसिलिए मैने कहा के आलोक आएगा तो मैं मेला में भेज दूंगा और बेटा अब दैर मत करो और गांव वालो से जकार मिल आओ क्योंकी वो लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे।


 आलोक हां में अपना सर हिलाता है और वहाँ से दयाल के साथ चला जाता है। गाड़ी में बेठकर आलोक चतुर और एकांश को फोन करता है और सारी बात बताता है और उन्हे गांव के चौक पर बुलाता है। पर गुना को ना देख कर आलोक चतुर से पुछता है---

>" ये गुना कहा है।

 चतुर कहता है---

>" वो तो मेला में है क्योंकि हम दोनो ने उधर एक 
फास्टफूड का दुकान लगाया है। वो वही पर है।

Note :- Thank you RADHEYSHYAM PATHAK JI .  UPENDRA  PASWAN aapne mere sabhi episode par comment or review dete ho . or bhi baki sabhi ko bahot bahot dhanyavaad jo mere story ko pyar dete hai.

To be continue......456