शहर की उस विशाल कचरा पट्टी के मुहाने पर सड़ांध का साम्राज्य था। हवा में एक ऐसी भारी गंध घुली रहती थी, जो नए आदमी का गला घोंट दे, लेकिन वहाँ रहने वालों के लिए वह हवा ही उनकी सांसों का आधार थी। सूरज की पहली किरण जब कचरे के पहाड़ों पर गिरती, तो कांच के टुकड़े और प्लास्टिक की थैलियां किसी बेशकीमती खजाने की तरह चमकने लगती थीं।
"ओए कालू! हाथ तेज़ चला, वरना आज फिर भूखा सोएगा," एक कर्कश आवाज गूँजी।
यह झबरू था, जिसकी उम्र तो चालीस के पार थी, लेकिन चेहरे पर झुर्रियों और कालिख ने उसे साठ का बना दिया था। कालू, एक बारह साल का लड़का, जिसके बाल धूल से जटा बन चुके थे, एक फटे हुए बोरे को कंधे पर लादे कचरे के ढेर में हाथ मार रहा था।
उसके हाथ किसी मशीन की तरह चल रहे थे,
प्लास्टिक की बोतलें एक तरफ, लोहा दूसरी तरफ।
"चाचा, आज अखबार ज्यादा मिले हैं," कालू ने अपनी फटी हुई कमीज़ की आस्तीन से माथे का पसीना पोंछते हुए कहा। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो उस गंदगी के ढेर में मेल नहीं खाती थी।
झबरू ने बीड़ी का एक गहरा कश खींचा और धुआं छोड़ते हुए बोला, "अखबार का क्या करेगा रे? दो पैसे ज्यादा मिलेंगे, बस। पेट अखबार नहीं, रोटी मांगता है।"
कालू मुस्कुरा दिया। वह झबरू को कैसे समझाता कि उन अखबारों के बीच दबे हुए फटे-पुराने पन्ने उसके लिए रोटी से ज्यादा कीमती थे।
वह उन पन्नों को सहेजकर अपने बोरे के एक गुप्त कोने में रख लेता था।
शाम ढलने को थी। कचरा पट्टी के पास ही एक छोटी सी चाय की दुकान थी, जहाँ शहर के कुछ 'बाबू' लोग कभी-कभी रुकते थे। आज वहां एक नया चेहरा था—अविनाश। अविनाश एक एनजीओ चलाता था और शहर के इस हिस्से को 'साफ' करने के सपने देखता था।
"बेटा, इधर आओ," अविनाश ने कालू को आवाज दी।
कालू ठिठक गया। उसे आदत थी कि लोग उसे देखते ही नाक सिकोड़ लेते थे या पत्थर मार कर भगा देते थे। वह दबे पांव अविनाश के पास गया।
"तुम्हारा नाम क्या है?" अविनाश ने नरमी से पूछा।
"कालू," उसने संक्षिप्त जवाब दिया।
"ये बोरे में क्या है? सिर्फ कचरा?"
कालू ने हिचकिचाते हुए बोरा खोला। बोरे के ऊपर तो बोतलें और डिब्बे थे, लेकिन नीचे करीने से रखे हुए फटे हुए पन्ने थे। अविनाश ने एक पन्ना उठाया। वह गणित की किसी पुरानी किताब का पन्ना था।
"तुम ये पढ़ते हो?" अविनाश की आंखों में हैरानी थी।
"कोशिश करता हूँ साहब। पर कुछ शब्द समझ नहीं आते," कालू ने बड़ी मासूमियत से कहा।
तभी वहां बिजली की तरह झबरू आ धमका। "साहब, इसे क्यों बिगाड़ रहे हो? ये कचरा चुनने वाला है, कलेक्टर नहीं बनेगा। चलो रे कालू, सेठ बाट देख रहा होगा।"
झबरू का लहजा कड़वा था। उसके अंदर एक लाचारी थी जो गुस्से बनकर निकलती थी। उसने अपनी पूरी जिंदगी इसी कचरे में गुजार दी थी और वह नहीं चाहता था कि कालू कोई ऐसा सपना देखे जो बाद में उसे तोड़ दे।
"झबरू चाचा, रुकिए तो सही। अगर यह पढ़ना चाहता है, तो इसमें बुराई क्या है?" अविनाश ने हस्तक्षेप किया।
झबरू ने एक फीकी हंसी हंसी, जिसमें कटाक्ष कूट-कूट कर भरा था। "साहब, आप जैसे लोग साल में एक बार आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। इस लड़के की भूख का हिसाब कौन रखेगा? पढ़ाई से पेट नहीं भरता, साहब। पेट भरता है इस सड़े हुए प्लास्टिक से जिसे बेचकर हमें दो वक्त की रोटी मिलती है।"
कालू चुपचाप खड़ा रहा। उसके मन में एक द्वंद्व च
ल रहा था। एक तरफ झबरू की कड़वी सच्चाई थी, और दूसरी तरफ वह अधूरा पढ़ा हुआ गणित का सवाल, जो उसे पूरी रात सोने नहीं देता था।
रात को झोपड़पट्टी में सन्नाटा था, सिवाय मच्छरों की भिनभिनाहट के। कालू ने एक मोमबत्ती का छोटा सा टुकड़ा जलाया। उसने बोरे से वो पन्ने निकाले।
"चाचा, क्या सच में हम कभी इस कचरे से बाहर नहीं निकल पाएंगे?" कालू ने अचानक पूछा।
झबरू, जो लेटा हुआ था, करवट बदलकर बोला, "बाहर? बाहर की दुनिया हमारे लिए नहीं है कालू। वहां लोग परफ्यूम लगाकर चलते हैं ताकि हमारी बदबू उन तक न पहुंचे। सो जा, सुबह चार बजे उठना है।"
कालू ने मोमबत्ती बुझा दी, लेकिन उसकी आंखों की चमक अभी बाकी थी। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह सिर्फ कचरा नहीं चुनेगा, वह उस कचरे के बीच से अपना भविष्य चुनेगा।
अगले दिन, कालू ने कुछ अलग किया। वह कचरा बीनने के साथ-साथ उन दुकानों के बाहर खड़ा होने लगा जहाँ बच्चे स्कूल जाते थे। वह उन्हें दूर से देखता—उनके साफ कपड़े, उनकी किताबें, उनकी बातचीत।
"ए भिखारी! पीछे हट, रास्ता छोड़," एक रईस बाप ने अपने बेटे को कार में बिठाते हुए चिल्लाकर कहा।
कालू को गुस्सा नहीं आया, बल्कि एक अजीब सी बेबसी महसूस हुई।
उसने अपने गंदे हाथों को देखा। उसे महसूस हुआ कि समाज उसे इंसान नहीं, बल्कि उसी कचरे का एक हिस्सा मानता है जिसे हर सुबह साफ कर दिया जाना चाहिए।
वह वापस कचरा पट्टी लौटा। आज उसका मन काम में नहीं लग रहा था। उसने देखा कि झबरू एक जगह बैठा किसी बात पर रो रहा था।
"क्या हुआ चाचा?" कालू ने घबराकर पूछा।
"सेठ ने पैसे काट लिए कालू। कहता है कि प्लास्टिक गीला है। अब बता, आज क्या खाएंगे?" झबरू की आवाज में वह कठोरता गायब थी, वहां सिर्फ लाचारी थी।
कालू ने अपनी जेब में हाथ डाला। वहां कुछ सिक्के थे जो उसने अखबार बेचकर बचाए थे। "ये लीजिए चाचा।"
झबरू ने उन सिक्कों को देखा और फिर कालू को। "तूने ये कहाँ से लाए?"
"मैंने वो किताबें और अखबार कबाड़ी को नहीं दिए थे, बल्कि एक रद्दी वाले को अलग से बेचे थे। उसने थोड़े ज्यादा पैसे दिए," कालू ने झूठ बोला। असल में उसने अपनी दो वक्त की चाय छोड़कर वो पैसे जमा किए थे।
झबरू की आँखों में आंसू आ गए। उसने कालू को गले लगा लिया। "तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा रे कालू... पर कैसे, ये मुझे नहीं पता।"
उसी वक्त अविनाश फिर वहां आया। उसके हाथ में एक पुराना थैला था। "कालू, ये तुम्हारे लिए है।"
थैले में कुछ नई कॉपियां, पेंसिलें और एक पुरानी लेकिन साफ कमीज़ थी। "कल से तुम शाम को मेरे सेंटर पर आओगे। वहां और भी बच्चे आते हैं।"
कालू ने झबरू की तरफ देखा। झबरू ने इस बार मना नहीं किया। उसने सिर्फ इतना कहा, "जा बेटा, देख ले अगर किस्मत का कचरा साफ हो जाए तो।"
शुरुआत आसान नहीं थी। सेंटर पर दूसरे बच्चे कालू से दूर बैठते थे क्योंकि उसके शरीर से अब भी वही कचरे वाली गंध आती थी। लेकिन कालू को फर्क नहीं पड़ता था। वह घंटों तक अक्षरों को ऐसे निहारता जैसे कोई प्यासा पानी को देखता है।
एक दिन अविनाश ने एक परीक्षा रखी। जो जीतेगा, उसे शहर के एक बड़े स्कूल में वजीफा (स्कॉलरशिप) मिलेगा।
कालू की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसके पास न कोचिंग थी, न ही घर पर पढ़ने का माहौल। उसके पास सिर्फ वो फटे हुए पन्ने थे और एक अटूट जिद।
परीक्षा का दिन आया। कालू ने वही पुरानी कमीज़ पहनी जो अविनाश ने दी थी। वह सेंटर पहुंचा। सवाल कठिन थे, पर कालू के लिए वे उस कचरे के ढेर से कहीं ज्यादा आसान थे जहाँ उसे हर रोज अपनी जिंदगी ढूंढनी पड़ती थी।
नतीजे आने वाले थे। पूरी झोपड़पट्टी में चर्चा थी। कुछ लोग मजाक उड़ा रहे थे— "देखो, कचरा उठाने वाला अब बाबू बनेगा।"
लेकिन झबरू आज शांत था। वह पहली बार अपनी बीड़ी छोड़कर सेंटर के बाहर खड़ा इंतजार कर रहा था।
अविनाश बाहर आया। उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी। उसने भीड़ को चीरते हुए कालू को अपने पास बुलाया।
"दोस्तों, इस परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक लाने वाला छात्र है... कालू!"
चारों तरफ सन्नाटा छा गया। झबरू की आँखों से बहते आंसू उसकी गंदी गालों पर लकीरें बना रहे थे। कालू वहीं जम गया। उसे लगा जैसे उसने आज कचरे के उस पहाड़ को लांघ लिया है जिसे पार करने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। कालू के पास अब एक मौका था, पर उसके सामने एक बड़ी चुनौती थी। स्कूल की फीस तो वजीफे से हो जाती, पर झबरू चाचा का क्या होता? अगर कालू स्कूल जाता, तो कचरा कौन उठाता? घर का चूल्हा कैसे जलता?
"मैं नहीं जा सकता साहब," कालू ने अचानक कहा।
अविनाश चौंक गया। "क्यों कालू? यह तुम्हारा सपना है।"
"चाचा अकेले पड़ जाएंगे। और अगर मैं नहीं कमाऊंगा, तो हम भूखे मर जाएंगे। पढ़ाई पेट नहीं भरती साहब, झबरू चाचा ने सही कहा था।" कालू की आवाज में एक ऐसी परिपक्वता थी जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा थी।
तभी झबरू आगे आया। उसने कालू के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आवाज में अब कोई कड़वाहट नहीं थी।
"तू जाएगा कालू। तू पढ़ेगा। मैं दिन में दो बार कचरा उठाऊंगा, दो शिफ्ट काम करूंगा, पर तुझे उस बड़े स्कूल में भेजूंगा। मैंने अपनी जिंदगी इस बदबू में गुजार दी, पर मैं नहीं चाहता कि तू भी इसी में दफन हो जाए। तू मेरा 'कचरे का सोना' है बेटा।"
पूरा माहौल भावुक हो गया। समाज के जिस हिस्से को लोग देखना भी पसंद नहीं करते थे, वहां आज एक नई उम्मीद की किरण फूटी थी।
कालू ने स्कूल जाना शुरू किया। वह सुबह जल्दी उठकर झबरू की मदद करता और फिर भागकर स्कूल जाता। उसकी मेहनत रंग लाई। कुछ साल बाद, कालू ने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि उसी कचरा पट्टी के पास एक छोटा सा स्कूल और रीसाइक्लिंग यूनिट खोली।
आज कालू को लोग 'कालू' नहीं, बल्कि 'मिस्टर कल्याण' कहते हैं। वह अब भी उस कचरा पट्टी पर जाता है, पर कचरा उठाने नहीं, बल्कि वहां छिपे हुए दूसरे 'सोने' के टुकड़ों को ढूंढने और उन्हें तराशने के लिए।
झबरू अब काम नहीं करता। वह स्कूल के गेट पर बैठता है और हर उस बच्चे को मुस्काराकर देखता है जो हाथ में किताब लिए अंदर जाता है।
यह कहानी उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो समझते हैं कि गरीबी इंसान की काबिलियत को मार देती है। सच तो यह है कि जो आग कचरे के ढेर में जलती है, वही अक्सर सबसे ज्यादा रोशनी देती है।