हॉस्पिटल में आईसीयू के बाहर की हवा भारी थी, जिसमें फिनाइल की तीखी गंध और वेंटिलेटर की 'बीप-बीप' करती डरावनी आवाज़ मिली हुई थी। सान्वी वर्मा के हाथ में पकड़ा हुआ वह बीस लाख का चेक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी आज़ादी का मृत्यु-प्रमाणपत्र था।
कांच के दरवाजे के उस पार, उसकी माँ, सुमित्रा, मौत से लड़ रही थीं। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था— 'एडवांस एक्यूट हार्ट फेलियर'। उनके दिल के वाल्व बदलने की ज़रुरत थी और फेफड़ों में पानी भर जाने से हालत नाजुक थी। अगर अगले दो घंटों में सर्जरी शुरू नहीं हुई, तो सान्वी अपनी दुनिया खो देगी।
सान्वी की आँखों में आंसू पूरी तरह से सूख चुके थे, बस उन आंखों में एक खालीपन ही बचा था। उसके दिमाग में पिछले पांच सालों का संघर्ष किसी फिल्म की तरह चल रहा था। उसके पिता, जो एक आदर्शवादी स्कूल टीचर, ने अपनी पूरी ज़िंदगी ईमानदारी में ही गुजारी थी। लेकिन ईमानदारी से तो पेट भरता है, हॉस्पिटल का बिल नहीं भरता। पिता के कैंसर के इलाज में उनकी पूरी जिंदगी के कमाई की सारी जमा-पूंजी, भविष्य निधि (PF) और यहाँ तक कि गांव की पुश्तैनी ज़मीन का वह छोटा सा टुकड़ा भी बिक गया था। उनके जाने के बाद, सान्वी और उसकी माँ अकेले रह गए थे।
रिश्तेदारों की बात करें, तो सान्वी ने बहुत पहले सबक सीख लिया था। उसके सगे चाचा ने पिता की मौत के तेरहवीं वाले दिन ही कह दिया था, "सान्वी, हमारे अपने खर्चे हैं, हम तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते।" ग़रीबी एक ऐसी बीमारी है जिससे अपने भी दूर भागते हैं, और डरते हैं कि कहीं उन्हें न लग जाए। और मां की जो पेंशन आती है वह पिता के ईलाज में लिए हुए कर्ज को देने में चला जाता है और जो बचता है वह अपने छोटी-मोटे खर्चों में चला जाता है तथा सान्वी एक छोटे पब्लिशिंग हाउस में प्रूफरीडर की नौकरी करती है, जहाँ की 15 हज़ार की तनख्वाह से बमुश्किल घर का किराया और माँ की दवाइयां आती है। आज 20 लाख की रकम उसके लिए हिमालय जैसी थी।
वह घबराते हुए कैश काउंटर की ओर बढ़ी। क्लर्क ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा—साधारण कुर्ती, उलझे बाल और सूजी हुई आँखें।
"मैडम, मैंने पहले ही कहा, यह पर्सनल चेक है। क्लीयरेंस में तीन दिन लगेंगे। हमें अभी कैश या आरटीजीएस (RTGS) चाहिए। अस्पताल धर्मशाल नहीं है।"
सान्वी ने कांपे होंठों से कहा, "सर, प्लीज... वह मेरी माँ हैं..."
तभी क्लर्क का लैंडलाइन फोन बजा। उसने झुंझलाते हुए फोन उठाया, लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा पीला पड़ गया। वह अपनी कुर्सी से लगभग खड़ा हो गया।
"जी... जी सर! ट्रस्टी महोदय? जी, आर्यन सर का ऑफिस? बिल्कुल सर... तुरंत!"
फोन रखने के बाद क्लर्क के हाथ कांप रहे थे। उसने सान्वी को एक नई इज़्ज़त और डर के साथ देखा। लड़खड़ाते हुए जुबान से कहां "माफ़ कीजियेगा मैम। राठौर इंडस्ट्रीज से फोन था। आपकी माँ का ऑपरेशन 'प्रायोरिटी' पर होगा। डॉक्टर टीम तैयार हो रही है।"
सान्वी ने राहत की सांस ली, लेकिन दिल में एक बोझ था। पैसा नहीं, 'राठौर' नाम का खौफ बोल रहा था। उसने अपनी माँ की धड़कनों के बदले, अपनी साँसे गिरवी रख दी थीं।
दृश्य 2: चुनने का असली सच (The Logic)
दो घंटे बाद, शहर के सबसे महंगे होटल के प्रेसिडेंशियल सुइट में सान्वी खड़ी थी। उसके सामने नताशा खड़ी थी, जो आर्यन राठौर की सेक्रेटरी होने के साथ-साथ उसकी सबसे वफादार भी थी। नताशा ने सान्वी से कहा कि चलो बैठ कर बात करते हैं उनके सामने टेबल पर एक लीगल एग्रीमेंट रखा।
सान्वी ने हिचकिचाते हुए पूछा, "मिस्टर राठौर ने मुझे ही क्यों चुना? जहां इस शहर में हज़ारों लड़कियाँ हैं, अमीर, खूबसूरत... मैं तो उनके सामने तो कुछ भी नहीं हूँ।"
नताशा के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक होठों पर मुस्कान आई। सामने रखी टेबल पर उसने फाइल खोली।
"यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है, सान्वी। तुम 'कुछ भी नहीं' हो।"
सान्वी ने नताशा की ओर हैरानी से देखा। उसकी आँखों में ढेरों सवाल थे। कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर नताशा ने गहरी साँस ली और बात को विस्तार देते हुए फिर समझाना शुरू किया।
"आर्यन सर के दादा, स्वर्गीय भंवर सिंह राठौर, एक बेहद दूरदर्शी और थोड़े सनकी किस्म के इंसान थे। उन्होंने अपनी वसीयत में एक ऐसी शर्त डाल दी है, जिसने आर्यन सर के हाथ बाँध दिए हैं। आर्यन सर 'राठौर ग्रुप ऑफ कंपनीज' के चेयरमैन की गद्दी पर तभी तक बने रह सकते हैं, जब वह शादी कर लें। लेकिन शर्त यह है कि लड़की किसी भी रसूखदार, राजनैतिक या बड़े बिज़नेस घराने से नहीं होनी चाहिए।"
"पर ऐसा क्यों? यह तो उल्टा है! अमीर परिवार में शादी करने से तो ताकत बढ़ती है," सान्वी के मुँह से अनायास ही निकल गया।
नताशा ने पास में रखी मेज की ओर झुकते हुए अपनी आवाज़ को और भी धीमा और गंभीर स्वभाव कर लिया, जैसे वह कोई अत्यंत राजकीय रहस्य साझा कर रही हो।
"यही तो सबसे बड़ा पेंच फंस है सान्वी। दादा भंवर सिंह राठौर सिर्फ एक बिजनेसमैन नहीं, बल्कि उनकी नजर पारखी जौहरी की थी। उन्हें डर सता रहा था कि अगर आर्यन किसी बड़े कॉर्पोरेट राज घराने की लड़की से शादी करेगा, तो वह शादी महज एक रिश्ता नहीं, बल्कि 'होस्टाइल टेकओवर' का जरिया बन जाएगी। रसूखदार घराने की शादी के बहाने कंपनी के बोर्ड रूम में घुसपैठ करते, धीरे-धीरे 'राठौर ग्रुप' के शेयरों पर अपना नियंत्रण बढ़ाते और अंततः आर्यन पर कंपनी के विलय (Merger) का इतना दबाव बना देते कि उसे अपना साम्राज्य उनके हवाले करना पड़ता।"
सान्वी ने उलझन में पूछा, "लेकिन आर्यन सर अपनी कंपनी किसी और को क्यों देंगे?"
नताशा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई। "पावर के खेल में कभी-कभी राजा को भी झुकना पड़ता है सान्वी। अगर आर्यन का ससुर कोई बड़ा टाइकून होता, तो वह मार्केट में आर्यन की साख गिराकर या उसके प्रतिद्वंदियों से हाथ मिलाकर उसे चारों तरफ से घेर लेता। तब आर्यन के पास अपनी कंपनी बचाने का केवल एक ही रास्ता बचता—विलय। दादाजी नहीं चाहते थे कि आर्यन कभी भी ऐसी लाचार स्थिति में आए। वे चाहते थे कि कंपनी की बागडोर पूरी तरह राठौर परिवार के हाथों में सुरक्षित रहे।"
वह थोड़ा रुकी और फिर आगे बोली, "वह चाहते थे कि आर्यन के जीवन में कोई ऐसी लड़की आए जो उसे जमीन से जोड़े रखे, न कि उसे कॉर्पोरेट राजनीति में उलझाए। उन्हें एक ऐसी लड़की चाहिए थी जिसका बैकग्राउंड पूरी तरह 'क्लीन' हो, जिसका कोई पूर्व प्रेमी (Ex-boyfriend) न हो जो बाद में ब्लैकमेल करके कंपनी की साख को नुकसान पहुँचा सके। और सबसे ज़रूरी बात—वे चाहते थे कि लड़की किसी साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से हो, ताकि वह आर्यन के साम्राज्य को चुनौती देने के बजाय उसकी गरिमा का सम्मान करे और उसके अनुशासन में रहे।"
नताशा ने सान्वी की आँखों में झाँका, जैसे वह उसकी आत्मा की गहराई और उसकी विवशता को नाप रही हो। उसकी आवाज़ अब किसी ठंडी, धारदार छुरी जैसी थी।
"तुम हमारे लिए 'परफेक्ट' कैंडिडेट हो, सान्वी। वजह? तुम्हारे पिता की वह सूखी हुई ईमानदारी, जो विरासत में तुम्हें 'बेदाग चरित्र' तो दे गई, पर बैंक बैलेंस नहीं। और रही बात तुम्हारी माँ की..." नताशा रुकी, उसके चेहरे पर एक फीकी, पेशेवर सहानुभूति उभरी, "उनकी बीमारी ने तुम्हें उस किनारे पर ला खड़ा किया है जहाँ आत्मसम्मान और ज़िंदगी में से किसी एक को चुनना तुम्हारी मजबूरी है। हमें एक ऐसी लड़की चाहिए थी जो हमारे इशारों पर मुड़े, और तुम्हारी हालात हमें इसकी पूरी गारंटी देते हैं।"
नताशा ने सान्वी के हाथ पर पकड़े चेक की रसीद की ओर इशारा किया, "इसे शादी मत समझना, यह एक 'बिजनेस ट्रांजैक्शन' है। बीस लाख रुपए और तुम्हारी माँ की साँसें—बदले में एक साल का वह अभिनय जिसे दुनिया 'शादी' कहेगी।"
सान्वी को लगा जैसे कमरे की सारी ऑक्सीजन अचानक खत्म हो गई हो। सान्वी को सांस भी लेना मुश्किल लग रहा था नताशा के हर शब्द ने उसके स्वाभिमान को तीर की भांति उसके दिल को लहूलुहान कर दिया हो। आज उसे अहसास हुआ किट उसकी सादगी और उसकी गरीबी को एक 'प्रोडक्ट' की तरह खरीदा जा रहा था। वह वहाँ एक जीवनसाथी बनने नहीं आई थी, उसे तो महज़ एक 'सुरक्षित निवेश' और एक 'मूक कठपुतली' की तरह चुना गया था।
दृश्य 3: अग्नि की गवाह
रजिस्ट्रार ऑफिस के वीआईपी रूम में सान्वी लाल रंग की भारी बनारसी साड़ी में सजी-धजी खड़ी थी। ज्वैलरी अपनी चमक पूरे रूम में बिखेर रहा था लेकिन सान्वी की आंखों में जो अंधेरा था उसको नहीं छिपा पा रही थी।
तभी अचानक दरवाजा खुला और आर्यन राठौर ने रूम में प्रवेश किया। काले रंग की शेरवानी में वह किसी ग्रीक देवता जैसा सुंदर लग रहा था,
लेकिन उसका आभामंडल किसी बर्फ के पत्थर जैसा ठंडा था। उसने सान्वी की तरफ एक बार भी मुड़कर नहीं देखा, उसने अपने हाथों में पहने महंगी घड़ी की तरफ देखा। दोनों जाकर पंडित जी के पास हवन कुंड के सामने जाकर पास में बैठ गए।
तभी आर्यन राठौर ने बोला"पंडित जी, जरा जल्दी कीजिये। मेरी मीटिंग का टाइम हो रहा है।"सान्वी के दिल में ऐसा लगा कि जैसे कोई तीर आ कर लग गया हो। यह उसकी शादी थी, यह वही शादी थी जिसका कभी उसने सपना देखा था आज ऐहसास हो रहा था कि सपने और हकीकत में जमीन आसमान का अंतर होता है और उसके 'पति' के लिए यह सिर्फ एक बिजनेस मीटिंग के बीच का ब्रेक था।
तभी हवन कुंड की अग्नि जल उठी। पंडित जी ने हवन कुंड के सामने मंत्रोच्चारण शुरू किया।
कुछ समय बाद पंडित जी ने मंत्र उच्चारण को रुकते हुए कहा की"वर-वधु फेरों के लिए खड़े हों।"
सान्वी जब उठी, तो भारी साड़ी और मानसिक तनाव के कारण ध्यान न देने से उसका पैर मुड़ गया। वह गिरने ही वाली थी कि एक लोहे जैसी मजबूत हाथ ने उसे पकड़ कर उसकी कलाई थाम ली।
सान्वी ने अपनी नजर घूम कर ऊपर देखा। आर्यन की गहरी भूरी आँखें उसे ही घूर रही थीं। वह महसूस कर सकती थी कि उस स्पर्श में कोई अपनापन या चिंता नहीं थी, सिर्फ अधिकार था।
उसने सान्वी को सीधा किया और उसके कान के पास झुककर बहुत धीमे लेकिन सख्त लहजे में कहा,
"संभलकर, सान्वी। राठौर खानदान की बहुऐ ऐसे नहीं गिरा करतीं हैं। मैंने रकम देखकर तुम्हारी ज़िम्मेदारी खरीदी है, तो अब अपने पैरों पर खड़ा रहना भी सीखना होगा। मुझे कमजोर चीज़ें बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं।"
ऐसे शब्द किसी पिघले हुए शीशे की तरह सान्वी के कानों में उतरे।
तभी सात फेरे पूरे हुए। हर एक फेरा सान्वी को उसकी पिछली ज़िंदगी से बहुत दूर और इस सोने के पिंजरे के बहुत करीब ले जा रहा था। जब आर्यन ने उसकी मांग में सिन्दूर भरा, तो सान्वी ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वह लाल रंग उसे सुहाग की निशानी नहीं, बल्कि उसके जीवन के सौदे की मुहर लग रहा था जिस पर उसने ना चाहते हुए भी हस्ताक्षर किए थे।
"विवाह संपन्न हुआ," पंडित जी ने घोषणा की। विवाह संपन्न होने के बाद जब बाहर निकाल कर देखा कि बाहर
मूसलाधार बारिश हो रही थी। इस मूसलाधार बारिश में जब सान्वी 'राठौर मेंशन' के विशाल और डरावने गेट के सामने जाकर खड़ी हुई, तो उसे एहसास हुआ कि उसने अपनी माँ की जान तो बचा ली, लेकिन अपनी आत्मा को इस 'अग्नि की गवाह' में जला दिया है।
दरवाजा खुला, और अंधेरे ने उसका स्वागत किया।