AsurVidya in Hindi Horror Stories by OLD KING books and stories PDF | असुरविद्या

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असुरविद्या


अध्याय एक: अपराधी

मुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर की एक तंग गली के आखिरी छोर पर स्थित उस जर्जर इमारत का कमरा नंबर सत्रह, किसी जिंदा कब्र जैसा लग रहा था. घडी की सुइयां नौ: तिरेपन पर रेंग रही थीं, मानो विहान के दर्द को और लंबा खींचना चाहती हों.
विहान फर्श पर पडा था. उसका बायां पैर एक अजीब कोण पर मुडा हुआ था, जो दो महीने पहले लगी चोटों की गवाही दे रहा था. वह आज भी लंगडा कर चलता था. उसकी पसलियों का दर्द हर सांस के साथ उसे याद दिलाता था कि वह' गोल्ड मेडलिस्ट विहान' से' मुजरिम विहान' कैसे बना.
सब कुछ उस दिन शुरू हुआ था जब उसने Collage के सबसे ताकतवर शख्स, आर्यन ढिल्लों के अहंकार को चुनौती दी थी. आर्यन, जो शहर के एक रसूखदार मंत्री का इकलौता बेटा था, विहान की काबिलियत से चिढता था. आर्यन ने अपनी सत्ता का इस्तेमाल कर विहान पर छेडखानी का झूठा केस दर्ज करवाया. जिस लडकी (नेहा) को विहान अपना दोस्त समझता था, उसने चंद रुपयों और डर के खातिर विहान के खिलाफ गवाही दे दी. उसकी Girlfriend रिया, जिसने साथ जीने- मरने की कसमें खाई थीं, उसने एक पल में रिश्ता तोड लिया—" विहान, एक अपराधी के साथ मैं अपना भविष्य खराब नहीं कर सकती.
Collage से उसे धक्के मारकर निकाल दिया गया. लेकिन आर्यन का मन इतने से नहीं भरा. उसने सडक पर गुंडे भेजकर विहान को तब तक पिटवाया जब तक उसके हाथ- पैर की हड्डियाँ नहीं चटक गईं. दो महीने अस्पताल के बिस्तर पर मौत से लडकर वह लौटा था, लेकिन उसके अंदर का विहान मर चुका था.
तभी उसके टूटे हुए मोबाइल की स्क्रीन चमकी—' छोटी बहन' का Call था.
विहान ने कांपते हाथों से फोन उठाया और चेहरे पर एक दर्दनाक मुस्कान ओढ ली.
हेलो, भैया! आप कैसे हो? माँ पूछ रही थी कि इस बार दिवाली पर घर आओगे न? उसकी छोटी बहन की आवाज में उत्साह था.
विहान की आँखों से एक आंसू टपक कर फर्श की धूल में मिल गया. उसने अपना गला साफ किया, हाँ गुडिया. मैं. मैं बहुत अच्छा हूँ. यहाँ बहुत काम है. बहुत बडा project मिला है. मैं जल्दी ही तुम लोगों के लिए कुछ पैसे भेजूँगा.
तभी फोन माँ ने ले लिया, बेटा, हमें पैसों की जरूरत नहीं है. तेरे पिता की किराने की दुकान ठीक चल रही है. तू शहर में अकेला है, अपना ख्याल रख. तेरी दादी रोज तेरी तस्वीर को चूमती है.
विहान का सीना फट रहा था. उसके पास कल के खाने के पैसे नहीं थे, शरीर जख्मों से भरा था, और वह अपनी माँ से झूठ बोल रहा था. ठीक है माँ, दादी को मेरा प्रणाम कहना. मुझे. मुझे एक Meeting में जाना है.
फोन काटते ही विहान फूट- फूट कर रो पडा.

अगली सुबह, भूख की तडप जब बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो विहान ने कमरे के कोने में रखी अपनी Collage की किताबों के आखिरी ढेर को देखा. वह अपना मोबाइल नहीं बेच सकता था, क्योंकि परिवार से बात करने का वही एक जरिया था. भारी मन से उसने अपनी यादों और मेहनत को एक बैग में भरा और लंगडाता हुआ पास के एक भंगार (रद्दी) वाले की दुकान पर पहुँचा.
भाई, ये सब ले लो. कुछ पैसे मिल जाते तो. विहान की आवाज में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई अपना स्वाभिमान बेच रहा हो.
भंगार वाला तौलने के लिए आगे बढा, तभी विहान की नजर रद्दी के उस विशाल ढेर के बीच दबी एक चीज पर पडी. वह एक बेहद पुरानी और अजीब सी किताब थी. उसका कवर काले चमडे जैसा था, लेकिन उस पर उभरे हुए निशान किसी प्राचीन कलाकृति की तरह थे. विहान को ऐसा महसूस हुआ जैसे भीड भरी सडक पर कोई उसे नाम लेकर पुकार रहा हो.
एक गहरी जिज्ञासा और अनचाहे खिंचाव के चलते विहान ने झुककर उस किताब को उठाया. उसके हाथ में एक हल्की सी झनझनाहट हुई. किताब के पन्नों पर लिखी भाषा और अक्षर उसकी समझ से परे थे, लेकिन फिर भी उसे लगा जैसे वह इन अक्षरों को जानता है. उसे उस किताब में एक' अपनेपन' का अहसास हुआ, जैसे वह किताब भी समाज की ठुकराई हुई हो और विहान के इंतजार में वहां पडी हो.
विहान ने उत्सुकता से पूछा, भाई, ये. ये किसकी किताब है? इसमें क्या लिखा है?
भंगार वाला लापरवाही से बोला, अरे भाई, मुझे क्या पता? यहाँ रोज हजारों किताबें आती हैं. मेरे लिए तो रद्दी बस रद्दी है.
विहान का मन उस किताब को वहीं छोडने का नहीं हुआ. उसके अंदर एक गहरी इच्छा जगी कि वह इसे अपने साथ ले जाए.
देखो भाई, भंगार वाले ने अपनी तराजू नीचे रखी, तुम्हारी इन बारह किताबों के हिसाब से तो सौ रुपये ही बनते हैं, लेकिन चलो. मैं तुम्हें एक सौ बीस रुपये दे सकता हूँ.
विहान ने कहा ठीक हैं जो देना हैं दे दे.

विहान ने एक सौ बीस रुपये हाथ में लिए और उस पुरानी किताब को सीने से सटा लिया. वह नहीं जानता था कि वह अपनी Collage की डिग्री के बदले अपनी नियति खरीद रहा है.
जाते- जाते उसने भंगार वाले से कहा, मैं इसे बस पढने के लिए ले जा रहा हूँ. जब अगली बार कुछ और बेचने आऊँगा, तो इसके पैसे काट लेना.
भंगार वाले ने हाथ हिलाकर उसे जाने का इशारा किया. विहान उस किताब और थोडे से खाने का सामान लेकर अपने अंधेरे कमरे की ओर चल दिया.
विहान ने रास्ते से खरीदे हुए कुछ समोसे और पानी की एक बोतल अपनी मेज पर रखी. भूख तो बहुत थी, लेकिन उसका मन उस रहस्यमयी किताब पर अटका था. सीढियां चढते वक्त उसके टूटे हुए पैर में जो टीस उठी थी, वह अब एक चुभन भरी लहर में बदल चुकी थी.
कमरा नंबर सत्रह की जर्जर छत से लटकता हुआ पीला बल्ब टिमटिमा रहा था. विहान ने मेज के पास बैठकर उस काली किताब को अपनी ओर खींचा. उसके कवर पर बनी आकृतियां अब और भी साफ दिख रही थीं—वे किसी खोपडी या जानवर की नहीं, बल्कि' असुरों' के प्राचीन प्रतीकों जैसी थीं.
उसने पन्ने पलटे. अंदर का हर पन्ना किसी पुराने ताड के पत्ते (Palm leaf) जैसा सख्त और खुरदरा था. उस पर गहरे लाल और सुनहरे रंग से ऐसी लिपि लिखी थी जो न तो संस्कृत थी और न ही पाली. वह' असुरलिपि' थी—अत्यंत जटिल और शक्तिशाली.
क्या है यह? किसी तांत्रिक की किताब है या महज एक पुरानी रद्दी? उसने खुद से पूछा.
काफी देर तक वह उन अजीबोगरीब चित्रों और मंत्रों को समझने की कोशिश करता रहा. उन पन्नों में अजीब सी आकृतियां बनी थीं—कहीं धुआं उठता हुआ दिखाया गया था, तो कहीं इंसानी शरीर के भीतर आग जलती हुई. देखते- देखते विहान की आँखों में भारीपन आने लगा. थकान और कमजोरी की वजह से उसे चक्कर सा महसूस हुआ.
वह पानी पीने के लिए अपनी पुरानी लकडी की कुर्सी से उठा. जैसे ही उसने अपने कमजोर और टेढे पैर पर वजन डाला, उसकी हड्डी में एक तेज कडकडाहट हुई.
आह!
दर्द के एक झटके ने उसे पूरी तरह असंतुलित कर दिया. विहान फर्श पर गिर पडा. गिरते समय उसका पैर मेज के कोने से टकराया, जिससे उसके घुटने के पास का पुराना, आधा भरा हुआ घाव फिर से फट गया.
खून की एक मोटी धार फूट पडी. विहान दर्द से कराहते हुए फर्श पर लोट रहा था, तभी उसकी कोहनी मेज से टकराई और वह काली किताब सीधे विहान के लहूलुहान पैर के पास गिर गई.
छप!
ताजा, गर्म खून की कुछ बूंदें सीधे उस किताब के पन्नों पर जा गिरीं.
अगले ही पल, कमरे का तापमान शून्य से नीचे गिर गया. विहान की साँसें जमने लगीं. जो खून किताब के पन्नों पर गिरा था, वह सोखने के बजाय पन्नों पर रेंगने लगा. जैसे वह खून नहीं, बल्कि कोई जीवित कीडा हो. वह खून उन जटिल अक्षरों के बीच बहने लगा, मानो उन्हें नया जीवन दे रहा हो.
अचानक, किताब के भीतर से एक गहरी, भारी गूँज उठी—जैसे पाताल की गहराई से कोई दानव अंगडाई ले रहा हो.
असुरविद्या. जागृतम्!
विहान की फटी आँखों के सामने, उस किताब से काला धुंआ उठने लगा. यह साधारण धुआं नहीं था, इसमें प्राचीन काल की गंध थी—राख, चन्दन और सडे हुए मांस का एक खौफनाक मिश्रण.
हिंदू पुराणों में जिक्र आता है कि असुर केवल राक्षस नहीं थे, वे महान ज्ञान और' माया' (Illusion) के स्वामी थे. शुक्राचार्य की मृत- संजीवनी से लेकर मायावी युद्धों तक, उनका ज्ञान देवताओं को भी हिला देता था. वही' मायावी शक्ति' आज विहान के उस छोटे से कमरे में कैद टूटने का इंतजार कर रही थी.
किताब के पन्ने किसी तूफान की तरह फडफडाने लगे. हवा इतनी तेज हो गई कि कमरे का एकमात्र बल्ब धमाके के साथ फूट गया. घोर अंधेरे में, उस किताब से एक रक्तिम (खूनी लाल) रोशनी फूट पडी.
विहान ने महसूस किया कि उसके घाव का खून अब रुक नहीं रहा था, बल्कि किताब उसे चुंबक की तरह खींच रही थी. वह चिल्लाना चाहता था, लेकिन उसका गला सूख चुका था. तभी उस काली धुंध के बीच से एक प्राचीन गर्जना सुनाई दी:
सदियों की प्यास. आज एक टूटे हुए' अंश' के रक्त ने बुझाई है. बोल नश्वर, तू प्रतिशोध चाहता है या प्रलय?
विहान का शरीर कांप रहा था, लेकिन जब' प्रतिशोध' शब्द उसके कानों में पडा, तो डर की जगह उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.