गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा कच्चा घर था, जहाँ मीरा अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती थी। घर में न ज़्यादा सामान था, न सुख सुविधा, पर एक चीज़ भरपूर थी—संवेदनशीलता। मीरा रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले उठ जाती थी, माँ के पैरों में तेल लगाती और फिर पास के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने चली जाया करती थी । तनख़्वाह बहत ज्यादा नहीं थी कम ही थी, पर आत्मसम्मान बहुत बड़ा था उसका ।
मीरा के पिता का देहांत बहुत साल पहले ही हो चुका था। उस दिन के बाद से मीरा ने कभी अपने आँसुओं को खुलकर गिरने नहीं दिया। वह मानती थी और जानती कि अगर वह टूट गई, तो उसकी माँ का सहारा कौन बनेगा। माँ अक्सर कहा करतीक्षथी, “बेटी, ज़िंदगी बोझ नहीं होती, प्रसाद होती है।” मीरा मुस्कुरा दीया करती, पर भीतर भीतर कहीं कुछ भारी-सा बना रहता।
एक दिन स्कूल से लौटते समय मीरा ने देखा कि गाँव के मंदिर के पास एक नन्ही बच्ची बैठ कर रो रही है। कपड़े फटे हुए थे, आँखों में डर भरा हुआ था। मीरा उस बच्ची को अपने साथ घर ले आई। पता चला की बच्ची का नाम गुड़िया है और वह मेले में अपने मां से बिछुड़ गई थी। मीरा ने बिना सोचे-समझे उसे खाना खिलाया, कपड़े दिए और अपने माँ के पास सुला दिया।
रात भर मीरा सो नहीं पाई। बार बार मन में सवाल उठ रहा था—अगर गुड़िया को कोई लेने न आया तो फिर क्या होगा ? सुबह होते-होते गाँव में घोषणा हुई उस बच्ची की गुमशुदगी की। दोपहर तक एक औरत बदहवास-सी दौड़ती हुई आई मीरा और गुड़िया के पास। गुड़िया उसे देखते ही कह कर लिपट गई। वह माँ थी—गरीब, थकी हुई, बेबस पर आँखों में अपनी बच्ची को पाने की चमक।
औरत ने मीरा के पैरों में गिरकर कहा, “बेटी, तू भगवान है।” मीरा ने उसे उठाया और बोली, “नहीं, मैं भी किसी मां की बेटी हूँ।” उस पल अनायास ही मीरा की आँखें भर आईं। उसे पहली बार ऐसा लगा कि उसके भीतर का दर्द किसी और के दर्द से जुड़कर बहुत हल्का हो गया है।
उसी शाम माँ ने मीरा को प्यार से अपने पास बुलाया और बिठाया और कहा, “देखा, बेटी? जो जलता है, वही रोशनी देता है। तू भी बिल्कुल उसी दीये की तरह है।” मीरा चुप रही, पर मन में बहुत कुछ बदल चुका था। उसे समझ आ गया था कि उसका जीवन सिर्फ़ संघर्ष के लिए नहीं है, सेवा के लिए भी है।
कुछ दिनों बाद मीरा ने गाँव के बच्चों के लिए शाम की निःशुल्क कक्षा शुरू कर दी। कोई उसे पागल कहता था तो कोई महान कहता था। पर मीरा जानती थी—वह बस अपने दर्द को बाँट रही है, ताकि किसी और का दर्द हमेशा हमेशा के लिए कुछ कम हो सके।
आज भी उस कच्चे घर में ज़्यादा कुछ नहीं बदला था, पर एक बात बदल गई है। अब वहाँ सिर्फ़ एक नहीं, कई दीये जलने लगे हैं—उम्मीद, करुणा , प्रेम और दया के। और उन्हीं उम्मीद, करुणा, प्रेम और दया रूपी दीयों से मीरा के घर के साथ साथ उसके गांव हर घर जगमगाता रहे ।
रचयिता: कल्पना महाराना✍️