कोटद्वार, उत्तराखंड की गोद में बसा एक शांत और हरियाली से भरा कस्बा है। यहाँ पहाड़ों से उतरती ठंडी हवाएँ, खो और सुखरो नदियों की कलकल करती धाराएँ और साल व शीशम के घने जंगल हर किसी का मन मोह लेते हैं। कोटद्वार के आसपास फैले इन जंगलों में अनेक वन्य जीव रहते थे। इन्हीं जंगलों में एक मादा भालू रहती थी, जिसका नाम था भोली। नाम की तरह भोली दिखने वाली यह भालू अपने बच्चे के लिए बेहद सतर्क और साहसी थी।
भोली का एक नन्हा-सा शावक था — गोलू। गोलू बहुत ही चंचल, मासूम और जिज्ञासु था। उसे हर नई गंध, हर आवाज़ और हर चमकती चीज़ अपनी ओर खींच लेती थी। वह कभी तितलियों के पीछे दौड़ता, तो कभी पेड़ों पर चढ़ने की कोशिश करता। भोली उसे बार-बार समझाती,
“गोलू, मुझसे दूर मत जाना। जंगल सुंदर है, लेकिन खतरे भी यहीं रहते हैं।”
एक दिन कोटद्वार के पास स्थित प्रसिद्ध सिद्धबली मंदिर में विशेष भंडारे की तैयारी चल रही थी। दूर-दूर से श्रद्धालु आए हुए थे। मंदिर परिसर में बड़े-बड़े कढ़ाहों में पूरी और हलवा बन रहा था। घी और सूजी की खुशबू हवा के साथ जंगल तक फैल गई।
गोलू ने हवा में सूंघते हुए कहा,
“माँ, ये कैसी मीठी खुशबू है?”
भोली ने सतर्क होकर जवाब दिया,
“ये इंसानों का खाना है। वहाँ जाना ठीक नहीं, गोलू।”
लेकिन गोलू तो बच्चा था। उसकी जिज्ञासा डर से कहीं बड़ी थी। उसी दिन जंगल के एक हिस्से में रास्ता साफ करने और शोरगुल की वजह से माहौल बिगड़ गया। भोली थोड़ी देर के लिए सतर्क होकर इधर-उधर देखने लगी, और उसी क्षण गोलू खुशबू का पीछा करते हुए झाड़ियों में आगे बढ़ गया।
जब भोली ने पलटकर देखा, गोलू उसके पास नहीं था।
“गोलू!”
भोली की घबराई हुई आवाज़ पूरे जंगल में गूंज उठी। वह हर झाड़ी, हर पेड़ और हर पगडंडी पर उसे ढूंढने लगी। दिन ढल गया, रात हो गई, लेकिन गोलू कहीं नहीं मिला। माँ का दिल डर और बेचैनी से भर गया।
उधर गोलू भटकते-भटकते जंगल से निकलकर सिद्धबली मंदिर के पास पहुँच गया। वहाँ उसने पहली बार इतने सारे इंसान, आवाज़ें और रोशनी देखी। डर के मारे वह मंदिर के पीछे लगे पेड़ों और झाड़ियों में छिप गया। पूरी और हलवे की खुशबू अब और तेज़ लग रही थी, लेकिन गोलू डर के कारण बाहर नहीं आया। उसी समय मंदिर परिसर में घूम रहा एक लड़का, गल्गू, उसकी हरकतों पर ध्यान दे बैठा। गल्गू समझ गया कि यह कोई साधारण जानवर नहीं, बल्कि जंगल से बिछड़ा हुआ भालू का बच्चा है।
गल्गू कोटद्वार का रहने वाला एक समझदार और संवेदनशील लड़का था। वह अक्सर अपने दादाजी के साथ सिद्धबली मंदिर आता था। उसके दादाजी उसे बताया करते थे कि जंगल और जानवर भी उतने ही ज़रूरी हैं, जितने इंसान। गल्गू ने बिना शोर मचाए गोलू को देखा और उसकी डरी हुई आँखों से सब समझ गया।
उसने धीरे से दादाजी से कहा,
“दादा, ये भालू का बच्चा है। इसकी माँ जरूर आसपास ढूंढ रही होगी।”
उधर जंगल में भोली की हालत खराब थी। भूख-प्यास की उसे सुध नहीं थी। वह कभी इंसानी बस्ती की ओर बढ़ती, तो कभी डर के मारे वापस जंगल में लौट आती। उसे बस अपने गोलू की चिंता थी।
अगली सुबह गल्गू ने एक समझदारी भरी योजना बनाई। उसे याद था कि जानवर अपनी माँ की आवाज़ पहचान लेते हैं। उसने गोलू को शांत रखा और धीरे-धीरे उससे हल्की आवाज़ निकलवाने की कोशिश की। गोलू ने भी माँ को याद कर धीमी-सी आवाज़ निकाली।
वही आवाज़ हवा के साथ जंगल की ओर गई।
भोली के कान तुरंत खड़े हो गए।
“ये… ये तो मेरे गोलू की आवाज़ है!”
वह बिना देर किए आवाज़ का पीछा करते हुए सिद्धबली मंदिर की ओर दौड़ी। लोगों में हलचल मच गई, कुछ डर गए, लेकिन गल्गू ने सबको रोकते हुए कहा,
“डरिए मत, वो अपने बच्चे को लेने आई है।”
भोली मंदिर के पीछे झाड़ियों तक पहुँची। जैसे ही गोलू ने अपनी माँ को देखा, वह खुशी से दौड़कर उससे लिपट गया। भोली ने अपने पंजों में गोलू को कसकर भर लिया। उस पल में न डर था, न शोर — सिर्फ़ माँ और बच्चे का अटूट प्रेम था।
गल्गू के चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी। वन विभाग की मदद से भोली और गोलू को सुरक्षित जंगल के अंदर, इंसानी बस्ती से दूर छोड़ दिया गया।
जाते समय भोली ने एक पल के लिए गल्गू की ओर देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता साफ झलक रही थी। गल्गू को लगा, जैसे भोली उसे धन्यवाद कह रही हो।
उस दिन सिद्धबली मंदिर का भंडारा और भी खास लग रहा था। पूरी और हलवा खाते हुए गल्गू ने सोचा,
“अगर इंसान थोड़ी समझदारी और दया दिखाएँ, तो जंगल और शहर दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।”
आज भी कोटद्वार में जब सिद्धबली मंदिर के आसपास जंगल की ओर से भालू की आवाज़ सुनाई देती है, तो लोग मुस्कुरा कर कहते हैं,
“लगता है भोली और गोलू होंगे।”
और गल्गू आज भी प्रकृति और जानवरों की रक्षा करना अपना कर्तव्य मानता है, क्योंकि उसने सीख लिया था कि सच्ची समझदारी वही है, जिसमें दया, साहस और जिम्मेदारी तीनों हों।