Shrapit ek Prem Kahaani - 34 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 34

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 34

एकांश मन ही मन सोचता है-----


>" अच्छा तो वो लाल शिला ही रक्षा कवच है। 


कुछ दैर में सभी उस जगह पर पहुँच जाता है। सभी जल्दी जल्दी उतर कर उस पेड़ के पास जाता है जहां पर रक्षा कवच बनी है। सभी वहाँ जाकर देखता है। तो सभी हैरान रह जाता है। शक्ति शिला वही उसी जगह पर था। 


आलोक शक्ति शिला को देखकर कहता है---


>" अगर शिला यहीं है तो फिर कुंम्भन बाहर कैसे 
निकल सकता है।


 तभी एकांश कहता है----


>" आलोक क्यों ना हम सब तुम्हारे गांव तरफ जा कर 
देखे। वहाँ पर भी ऐसे ही शिला है ना। 


एकांश की बात सुनकर आलोक कहता है--- 


>" हां यार तू ठीक कह रहा है। चल जल्दी। 


सभी जल्दी से गाड़ी में बैठ जाता है और राजनगर की और रवाना हो जाता है। इधर दक्षराज सुंदरवन से बाहर आ जाता है और कार में बैठ जाता है। दक्षराज बहुतत घबराया हुआ था उसके माथे से पसीने की बूदें टपक रही थी। 


दक्षराज हांफते हूए गाड़ी मे निलु को ढुंढता है, पर निलु वहां पर नही था , तो दक्षराज हैरान हो जाता है। कार में नीलू नहीं था। दक्षराज नीलू को आवाज लगाता 
है। पर वहां कोई नहीं था। 


कार से उतर कर दक्षराज इधर उधरर देखने लगता है पर नीलू कहीं दिखाई नहीं देता। तभी दक्षराज की नजर वहाँ पर पड़े चप्पल पर जाती है। दक्षराज चप्पल के पास जाता है दैखकर कहता है---


>" ये तो नीलू के चप्पल है।


 दक्षराज कुछ कदम और आगे जाता है तो देखता है के वहा पर खून की कुछ बुंदे गिरी हुई थी। दक्षराज खून देख कर घबराता जाता है। दक्षराज को पहले लग रहा था कि उस भयानक आवाज के कारण नीलू डर से भाग गया होगा।

 पर खून देखना दक्षराज धबरा जाता है। दक्षराज घबराते हुए निलु को आवाज लगाता है। पर नीलू कहीं नहीं मिलता। दक्षराज कहता है---


>" कहीं कुम्भन ने नीलू को....! 


इतना बोलकर दक्षराज चूप हो जाता है। दक्षराज थकहार कर वहा से खुद गाड़ी चलाके अपने हवेली पहूँच जाता है और नीलू को बुलाने लगता है। पर निलु का कोई अता पता नहीं था। 


उधर आलोक और सभी राजनगर में दुसरे पैड़ के पास पहूँच जाता है। जहां पर दुसरा रक्षा कवच था। सभी गाड़ी से जल्दी - जल्दी उतर कर पेड़ के पास जाता है 
और वहा पँहुच कर सबकी आंखें फटी के फटी रह जाती है। सबने जो देखा उस बात का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था। 


उस पेड़ के पास मां का शिला गायब था। रक्षा कवच टूट चुका था। और वहा पर पैड़ के निचे जनवारो की कंकाल और दौ गांव वालो का कटा सर था। उन कटे सर में से एक उस लड़के का था जिसने मेला में आलोक को उन कंकालो को दिखाया था। 


ऐसा लग रहा था जैसे अभी - अभी किसीने दोनो के सर को काट कर रख दिया है। कटे सर से अभी भी खून निकल रहा था जो बिलकुल ताजा था। सभी कटे सर को देखकर डर जाता है और वहां से गाड़ी में आकार बैठ जाता है।

सभी डर से चुपचाप बैठे थे। इतना भयानक दृश्य देखकर सबके हाथ पैर कांप रहे थे। किसी के मुह से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे। 


तभी आलोक कहता है----


>" जिसका मुझे डर था वही हुआ। अखिर ये कवच किसीने तोड़ दी ? वो शिला कही गयाब हो गई। 


चतुर कहता है---


>" कुम्भन के अलावा और कौन करेगा। 


आलोक कहता है----

>" नहीं...! ये काम कुंम्भन का काम नहीं हो सकता क्योंकी कुंम्भन रक्षा कवच तक कभी पँहुच ही नहीं सकता है। क्योंकि अगर उसमे इसे तोड़ने की ताकत होती तो वो बहुत पहले ही इसे तोड़ चुका होता। इसिलिए ये काम कुम्भन का नहीं हो सकता। ये किसी और ने किया है।


 एकांश पुछता है--


>" किसी और ने पर किसने..? वो भी ये जानते हुए के इसे यहां से हटाने पर कुम्भन आजाद हो जाएगा और वो सबके लिए कितना खतरनाक होगा। 


आलोक कहता है---


>" वही तो समझ में नहीं आ रहा है। आखिर ऐसा कौन हो सकता है , जिसको कुम्भन के आजाद होने मे फायदा होगा ।


 तभी वहाँ पर कुम्भन की भयानक आवाज आती है। जिसे सुनते हैं सबके होश उड़ जाता हैं वो आवाज और करीब से आने लगता है । सभी एक झाड़ी के पिछे जाकर छूप जाता है।


 तभी वहां कुम्भन अपने हाथ मे इंसान का कटा सर लेकर आता है और पेंड़ के निचे बैठकर कटे सर को मुह मे लगाकर खून पीने लगता है। ये सब दैखकर सब डर से कांप रहे थे। 


खून पीने के बाद कुंम्भन वहां से चला जाता है। दयाल जल्दी से गाड़ी स्टार्ट करता है और वहा से निकल जाता है। तभी एकांश का फोन रिंग होता है। जिसमे उसके पापा इंद्रजीत का फोन था। एकांश फोन रिसीव करता है---


>" हाँ पापा। 



उधर से इंद्रजीत कहता है---


>" बेटा कहा हो तुम ? 


एकांश कहता है---

>" बस घर ही आ रहा था पापा ।


 तभी इंद्रजीत कहता है---

>" बेटा सुनो हम सब यहां मेला आए है। तू भी यही 
आजा। 


मेला का नाम सुंकर एकांश घबरा जाता है। एकांश फोन में कहता है---


>" पापा आप मेला से निकलो जल्दी वहा मत जाओ। 

इंद्रजीस कुछ सुनपाता इससे पहले ही फोन कट चूका था।

 इंद्रजीत देखता है के उसका फोन स्विच ऑफ हो गया था। एकांश बार बार इंद्रजीत का फोन लगता है पर फोन स्विच ऑफ बताता है। एकांश संपूर्णा को फोन करता है। पर मेला में काफी आवाज होने के कारण संपूर्णा को फोन का रिंग सुनाई नहीं देता है। आलोक एकांश को परेशान देखकर पुछता है---


>" क्या हुआ यार ? बात क्या है।

 एकांश कहता है-- 


>" मेरे घर वाले सभी मेला मे है और रक्षा कवच टूटने से वो कुम्भन मेला में कहीं किसी को नुक्सान ना पँहूचा दे। यार मुझे मेला जाना होगा।

तभी दयाल का फोन रिंग होता है। जिसमे दक्षराज का फोन आ रहा था। दयाल फोन रिसीव करके घबराते हूए कहता है--


>" हां मालिक...! 


दयाल की घबराई आवाज को सुनकर दक्षराज कहता है --

>" क्या बात है दयाल , तुम इतने घबराए क्यो हो ?

दयाल सब बोलकर सुनाता है फिर उधर दक्षराज दयाल को फोन में सब बोलकर सुनाता है जिसे सुनकर दयाल कहता है---


>" क्या...? ठीक है मालिक में अभी आया। 


दयाल काफी परेशान हो जाता है। आलोक कहता है---

>" क्या हुआ काका , कोई परेसानी है , घर में सब ठीक है ना ? 


दयाल कहता है---

>" हां सब ठीक है। पर आलोक बाबा एक जरुरी काम है जिसके लिए मुझे हवेली जाना मिलेगा। 


आलोक कहता है़---

>" अच्छा ठीक है। आप मुझे और मेरे दोस्तों को चौक पर छोड़ दिजिये। वहाँ हम सब बाइक से मेला चले जाएंगे और एकांश के परिवार को घर लेकर आएंगे। 


दयाल कहता है---

>" ठीक है। 

इतना बोलकर दयाल गाड़ी गांव के चौक पर जाकर सबको उतार देता है। और सभी बाइक लेकर मेला की और जाने लगता है। 


एकांश और आलोक एक साथ एक बाइक पर और दुसरे बाइक पर चतुर। कुछ दूर जाने के बाद रास्ते पर एकांश को वर्शाली नजर आती है। जो एकांश को रुकने का इशारा कर रही थी। 


जिसे देखकर एकांश रुक जाता है। वर्शाली को देखकर एकांश कहता है--

>" वर्शाली तुम यहां ?

To be continue....499