Samarpan se Aange - 11 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | समर्पण से आंगे - 11

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समर्पण से आंगे - 11


‎भाग – 11

‎रात बहुत भारी थी।

‎ऐसी रात, जिसमें नींद आँखों से नहीं

‎सोचों से भाग जाती है।

‎सृष्टि खिड़की के पास बैठी थी।

‎बाहर अँधेरा था,

‎और भीतर सवाल।

‎बहिष्कार का संदेश

‎अब भी उसके फ़ोन पर चमक रहा था—

‎जैसे कोई चेतावनी नहीं,

‎फ़ैसला हो।

‎“अगर शादी नहीं,

‎तो समाज नहीं।”

‎यह वही भाषा थी

‎जिसने उसे पहले भी

‎खामोश किया था।

‎लेकिन इस बार

‎वह खामोश नहीं थी—

‎बस उलझी हुई थी।

‎उसे अपना पहला पति याद आया।

‎वह शादी,

‎जो उसने अपनी मर्ज़ी से नहीं,

‎परिवार की इज़्ज़त के नाम पर की थी।

‎“समझौता कर लो,”

‎सबने कहा था।

‎और उसने कर लिया।

‎उस दिन

‎उसने अपनी इच्छाएँ

‎अलमारी में बंद कर दी थीं।

‎और जब वह पति चला गया,

‎तो वही लोग बोले—

‎“किस्मत।”

‎सृष्टि ने पहली बार

‎किस्मत को दोष नहीं दिया।

‎दोष उसने

‎अपने डर को दिया।

‎सुबह अंकित आया।

‎उसने कुछ नहीं पूछा।

‎बस पास बैठ गया।

‎“मुझे जवाब चाहिए,”

‎उसने कहा नहीं।

‎यह बात

‎सृष्टि के दिल को

‎और भारी कर गई।

‎“अगर मैं ना कह दूँ,”

‎सृष्टि ने धीरे से कहा,

‎“तो क्या तुम टूट जाओगे?”

‎अंकित ने उसकी तरफ़ देखा।

‎“अगर तुम डर से हाँ कहो,”

‎वह बोला,

‎“तो मैं खुद टूट जाऊँगा।”

‎सृष्टि की आँखें भर आईं।

‎“मैं तुमसे प्यार करती हूँ,”

‎उसने कहा,

‎“लेकिन मैं खुद से भी

‎अब उतना ही प्यार करना चाहती हूँ।”

‎अंकित ने सिर हिलाया।

‎ और बोला

‎“यही जवाब है,”

‎लेकिन समाज

‎इस जवाब को नहीं समझता।

‎दोपहर तक

‎पंचायत बैठ गई।

‎फ़ैसला सुना दिया गया—

‎“अगर यह रिश्ता

‎शादी में नहीं बदलेगा,

‎तो दोनों को

‎इलाके से बाहर जाना होगा।”

‎सृष्टि वहाँ नहीं गई।

‎पहली बार

‎उसने अपनी जगह

‎खुद चुनी।

‎लेकिन अंकित गया।

‎सबके सामने

‎उसने साफ़ कहा—

‎“शादी होगी या नहीं,

‎यह उनका फैसला है।

‎और अगर इस फैसले की

‎सज़ा बहिष्कार है,

‎तो मैं भी वही चुनता हूँ।”

‎सन्नाटा छा गया।

‎किसी को उम्मीद नहीं थी

‎कि कोई लड़का

‎समाज के सामने

‎ऐसे खड़ा हो जाएगा।

‎शाम को

‎अंकित ने सृष्टि से पूछा—

‎“अब क्या?”

‎सृष्टि बहुत देर तक चुप रही।

‎फिर उसने कहा—

‎“अब मैं एक बात

‎खुद से कहना चाहती हूँ।”

‎वह आईने के सामने खड़ी हुई।

‎“मैं विधवा हूँ,”

‎उसने कहा,

‎“लेकिन अधूरी नहीं।”

‎“मैं प्यार करती हूँ,”

‎उसने कहा,

‎“लेकिन मजबूर नहीं।”

‎“अगर मैं शादी करूँगी,”

‎उसकी आवाज़ काँपी,

‎“तो डर से नहीं,

‎चुनाव से।”

‎उसने अंकित की तरफ़ देखा।

‎“आज मैं हाँ नहीं कह सकती,”

‎उसने सच कहा,

‎“लेकिन मैं ना भी नहीं कह रही।”

‎अंकित मुस्कुराया।

‎“यही काफी है,”

‎उसने कहा।

‎लेकिन कहानी

‎यहीं खत्म नहीं होती।

‎क्योंकि जब

‎एक औरत खुद से सच बोलती है,

‎तो दुनिया

‎उससे जवाब माँगती है।

‎ और कुछ सच 

‎वक़्त के साथ नहीं मिटते,

‎बस चुप हो जाते हैं।

‎सृष्टि के भीतर

‎एक ऐसा ही सच था—

‎जिसे उसने कभी

‎खुद से भी पूरा नहीं कहा था।

‎उस सुबह

‎डाकिया एक लिफ़ाफ़ा लाया।

‎गाँव की मुहर थी।

‎सृष्टि ने चिट्ठी ली ।

‎उसने लिफ़ाफ़ा खोला।

‎अंदर सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं था,

‎पूरा अतीत था।

‎उसका देवर—

‎पहली बार

‎उसका नाम लिखा था।

‎पत्र में लिखा था,

‎“भाभी,”

‎“अब बहुत दिन हो गए।

‎कुछ बातें

‎अब कहनी ज़रूरी हैं।”

‎सृष्टि का दिल

‎तेज़ धड़कने लगा।

‎वह बैठ गई।

‎पत्र आगे पढ़ते हुए

‎उसकी आँखों के सामने

‎पुराने दृश्य लौट आए।

‎पहली शादी के कुछ महीने बाद

‎पति का अचानक बदल जाना।

‎बात-बात पर गुस्सा।

‎चुप्पी।

‎और फिर वह रात—

‎जिस रात

‎वह रोती रही थी,

‎और किसी ने

‎सुना नहीं था।

‎पत्र में लिखा था—

‎“आपको लगता है

‎आप अकेली थीं,

‎लेकिन आप अकेली नहीं थीं।

‎आपके साथ जो हुआ,

‎वह सिर्फ़ किस्मत नहीं थी।”

‎सृष्टि का हाथ

‎काग़ज़ से फिसल गया।

‎उस रात

‎उसके पति की मौत

‎एक दुर्घटना बताई गई थी।

‎लेकिन दुर्घटना से पहले

‎बहुत कुछ

‎टूटा था।

‎सृष्टि ने

‎पहली बार

‎उस सच को नाम दिया—

‎डर।

‎उसके पति की मौत के बाद

‎उस पर चुप रहने का दबाव डाला गया था।

‎“बातें बढ़ेंगी,”

‎सास ने कहा था।

‎“अब जो हुआ,

‎भूल जाओ।”

‎और वह भूल गई—

‎कम से कम

‎दिखावे के लिए।

‎पत्र में आख़िर में लिखा था—

‎“मैं चुप था।

‎क्योंकि मैं डरता था।

‎लेकिन अब नहीं।

‎अगर आप चाहें,

‎तो सच सामने आ सकता है।”

‎सृष्टि ने

‎पत्र मोड़ दिया।

‎उसकी साँसें

‎काबू में नहीं थीं।

‎अंकित आया।

‎उसने सृष्टि को

‎ऐसा टूटा हुआ

‎पहले कभी नहीं देखा था।

‎“क्या हुआ?”

‎उसने पूछा।

‎सृष्टि ने

‎कुछ नहीं कहा।

‎बस पत्र

‎उसके हाथ में रख दिया।

‎अंकित ने पढ़ा।

‎उसकी आँखें

‎कठोर हो गईं।

‎“यह सिर्फ़ तुम्हारा अतीत नहीं है,”

‎उसने कहा,

‎“यह तुम्हारी आवाज़ है।”

‎“और अगर मैंने बोला,”

‎सृष्टि ने काँपती आवाज़ में कहा,

‎“तो फिर सब कुछ फिर से खुलेगा।

‎लोग सवाल पूछेंगे।

‎दर्द लौट आएगा।”

‎“और अगर नहीं बोली,”

‎अंकित ने शांत स्वर में कहा,

‎“तो डर हमेशा साथ रहेगा।”

‎सृष्टि समझ गई—

‎यह सिर्फ़ शादी का फैसला नहीं था।

‎यह

‎अपने अतीत को

‎स्वीकार करने का समय था।

‎उस रात

‎उसने पहली बार

‎अपनी डायरी खोली।

‎लिखा—

‎“मैं दोषी नहीं हूँ।”

‎यह वाक्य

‎उसने कई बार लिखा।

‎जब तक

‎उसकी उँगलियाँ थक नहीं गईं।

‎सुबह

‎उसने एक फैसला कर लिया।

‎वह गाँव जाएगी।

‎सच का सामना करेगी।

‎डर के साथ नहीं—

‎हक़ के साथ।

‎अंकित ने उसका हाथ थाम लिया।

‎“मैं साथ हूँ,”

‎उसने कहा।

‎सृष्टि ने सिर हिलाया।

‎वह जानती थी—

‎यह सफ़र

‎वापसी का नहीं होगा।

‎यह

‎खुद को

‎पूरी तरह अपनाने का सफ़र होगा।

‎लेकिन सवाल

‎अब भी बाकी था—

‎क्या सच सामने आने के बाद

‎वह समाज,

‎जो अब शादी का दबाव बना रहा है,

‎उसे स्वीकार करेगा—

‎या फिर

‎उसकी आज़ादी

‎और महँगी पड़ेगी?

‎भाग–12 में कहानी उस मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ

‎सृष्टि को सिर्फ़ समाज नहीं,

‎अपने अतीत से भी सामना करना होगा।

‎इस भाग में सामने आएगा—

‎पहली शादी से जुड़ा एक अधूरा सच

‎सृष्टि का सबसे गहरा डर

‎और वह स्थिति

‎जहाँ शादी का फैसला

‎भावनात्मक नहीं,

‎मानसिक आज़ादी का प्रतीक बनेगा।

‎  आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।

           ‎BY....................Vikram kori.      .