युद्ध के बीच पलता बचपन, और मन में उगते मौन प्रश्न
युद्ध केवल रणभूमि में नहीं लड़ा जाता।
वह बच्चों की नींद में,
माताओं की आँखों में,
और भविष्य के सपनों में भी पलता है।
राजकुमार नील और राजकुमारी मीनाक्षी,
दोनों का बचपन तलवारों की छाया में बीता,
पर दोनों की आत्मा ने युद्ध को अलग-अलग रूप में महसूस किया।
राजकुमार नील - एक योद्धा, जो युद्ध से डरता था
पीतमगढ़ का महल पत्थरों से बना था,
पर उसकी दीवारों से अधिक कठोर था वहाँ का अनुशासन।
नील जब पाँच वर्ष का हुआ, तो उसे लकड़ी की तलवार थमा दी गई। सात वर्ष में घुड़सवारी।
दस वर्ष में शस्त्रविद्या।
महाराज देवव्रत का एक ही सिद्धांत था,
“राजा का पुत्र कमजोर नहीं हो सकता।”
नील ने कभी विरोध नहीं किया।
वह हर आदेश का पालन करता,
पर उसके भीतर एक चुप्पी सी रहती।
जब वह अभ्यास के बाद अपने हाथ धोता,
तो पानी के लाल होने से घबरा जाता।
उसे खून से नहीं, खून की आदत से डर लगता था।
रात को, जब किले की दीवारों के बाहर
घायल सैनिकों की कराह सुनाई देती,
नील चुपचाप खिड़की से झाँकता।
वह पूछना चाहता था,
“पिता जी, क्या युद्ध के अलावा कोई और रास्ता नहीं?”
पर वह प्रश्न कभी उसके होंठों तक नहीं आया।
महारानी शारदा देवी
नील को देखकर अक्सर ठहर जातीं।
वह जानती थीं, यह बालक तलवार चलाना सीख जाएगा,
पर उसका हृदय राजनीति के लिए बहुत कोमल है।
वह हर रात नील के सिर पर हाथ रखकर
धीरे से कहतीं, “भगवान, मेरे बेटे को राजा नहीं,
पहले इंसान बनाइए।”
पर देवताओं की भी अपनी योजनाएँ होती हैं।
रायगढ़ की राजकुमारी, प्रेम में पली एक आत्मा
रायगढ़ का महल पत्थरों से नहीं,
भावनाओं से बना था।
मीनाक्षी को कभी तलवार पकड़ने के लिए मजबूर नहीं किया गया। उसके कोमल हाथों में वीणा, फूल और किताबें दी गईं।
वह महल के पीछे बने छोटे से उद्यान में घंटों बैठी रहती।
पंछियों से बातें करती। नदी के बहाव को देखती।
जब युद्ध से घायल सैनिक रायगढ़ लाए जाते,
तो मीनाक्षी अपने छोटे-छोटे हाथों से उनके माथे पोंछती।
वह पूछती, “आप किससे लड़े?”
कोई जवाब नहीं देता। क्योंकि जवाब बहुत भारी होता था।
महाराज वीरसेन अपनी पुत्री से अत्यंत प्रेम करते थे।
पर युद्ध ने उन्हें अक्सर कठोर बना दिया था।
मीनाक्षी कई बार पूछती,
“पिताजी, क्या pi के लोग सच में इतने बुरे हैं?”
वीरसेन चुप हो जाते। उनके भीतर कहीं पुरानी मित्रता
आज भी साँस लेती थी।
पर वह सच कभी शब्दों में नहीं बदला।
एक ही जंगल, दो अलग सपने थे
पीतमगढ़ और रायगढ़ के बीच का जंगल
दोनों बच्चों के जीवन में अलग-अलग कारणों से आया।
नील वहाँ तलवार अभ्यास के बाद शांति खोजने जाता।
वह पेड़ों के बीच बैठकर अपनी थकी हुई आत्मा को सुनता।
मीनाक्षी वहाँ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढने जाती।
वह मानती थी, प्रकृति कभी झूठ नहीं बोलती।
वे दोनों एक ही धरती पर चलते थे, एक ही हवा में साँस लेते थे, पर एक-दूसरे से कोसों दूर थे।
एक दिन पीतमगढ़ और रायगढ़ के बीच भयंकर युद्ध हुआ। नील ने पहली बार अपने पिता को घायल सैनिकों के शवों के बीच खड़े देखा। देवव्रत की आँखों में जीत नहीं थी, बस थकान थी।
उसी दिन रायगढ़ में मीनाक्षी ने एक बच्चे को रोते देखा,
जिसके पिता युद्ध में मारे गए थे। उस रात दो अलग महलों में दो बच्चे नींद में काँपते रहे।
नील के मन में पहली बार यह विचार आया, “क्या मैं वही राजा बनूँगा जो युद्ध को ही उत्तर मानता है?”
मीनाक्षी ने पहली बार यह महसूस किया,
“प्रेम केवल गीतों में नहीं, बल्कि निर्णयों में भी होना चाहिए।”
दोनों को पता नहीं था कि उनके प्रश्नों का उत्तर
किसी ग्रंथ में नहीं, एक-दूसरे की आँखों में मिलेगा।
जंगल चुप था। नदी बहती रही। और नियति
अपने अगले अध्याय की तैयारी कर रही थी।
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